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Monday, March 14, 2022

पंजाब में चला ‘आम आदमी’ का झाड़ू , बही बदलाव की बयार

 

 

पंजाब में चला आम आदमीका झाड़ू , बही बदलाव की बयार

-लोगों ने कॉमेडियन भगवंत सिंह मान को लिया गंभीरता से

-मान ने कहा अब पंजाब गांवों-मोहल्लों से चलेगा, महलों-हवेलियों से नहीं

 

केजरीवाल-भगवंत मान की जोड़ी पर पूरा भरोसा जताते हुए पंजाब के आम आदमी ने विधान सभा चुनाव 2022’ में आम आदमी पार्टी(आप) को 92 सीटों के ऐतिहासिक बहुमत के साथ एक अप्रत्याशित जीत दिलवाई है।


1966 में हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद 56 साल के इतिहास में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीत कर आज तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की है। पंजाब में अन्तर्कलह की मारी कांग्रेस मात्र 18 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। पंजाब के पारंपरिक राजनैतिक दल शिरोमणि अकाली दल को पंजाब क ी  जनता ने पूरी तरह  नकारते हुए अकाली-बसपा के बेमेल गठबंधन को केवल 4 सीटें ही दी। वहीं पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल(संयुक्त)की चुृनावी खिचड़ी ने भी केवल 2 सीटों पर सिमट कर, पंजाब में अपना जनाधार पूरी तरह खो दिया।

1992 में आतंकवाद के दौर में कांग्रेस ने पंजाब में 87 सीटें जीतकर सबसे बड़ी जीत का रिकार्ड दर्ज किया था, मगर उस समय शिरामणि अकाली दल ने चुनावों का बहिष्कार किया था। उसके बाद 1997 में अकाली भाजपा गठबंधन ने मिलक र 97 सीटें जीती थी। अकाली दल को 75 व भाजपा को 18 सीटों पर जीत मिली थी।

इस बार यानी 2022 में कुल वोट प्रतिशत की बात करें तो इसमें भी आम आदमी पार्टी ने 44 प्रतिशत वोट हासिल कर सबको चौंका दिया है। दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस को इस बाद 23 प्रतिशत और अकाली बसपा गठबंधन को 18.4 प्रतिशत वोट मिले हैं। यदि कुल वोट प्रतिशत की बात करें तो पंजाब में इस बार 2017 के मुकाबले लगभग 5 प्रतिशत मतदान कम हुआ। 2017 में जहां 77.20 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया वहीं 2022 में 71.95 प्रतिशत लोगों ने मतदान में भाग लिया।

इस बार पंजाब में आम आदमी पार्टी की सुनामी का अंदाजा इसी बात बात से लगाया जा सकता है कि 1920 में स्थापित हुई पार्टी शिरोमणि अकाली दल केवल 3 सीटें जीत कर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। शिरोमणि अकाली दल के भीष्म पितामह 94 वर्षीय प्रकाश सिंह बादल भी इस बार अपनी साख नहीं बचा पाए और लंबी से शायद अपना आखिरी चुनाव हार गए। आम आदमी पार्टी के गुरमीत सिंह खुड्डिया ने अकाली सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल को 66313 मतों के भारी अंतर से शिकस्त दी। अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भी जलालाबाद विधानसभा क्षेत्र से अपनी सीट नहीं बचा पाए। सुखबीर बादल को आम आदमी पार्टी के लॉ गे्रजुएट जगदीप कंबोज गोल्डी ने 30930 वोटों से हराया। भगवंत मान ने संगरूर जिले की धुरी विधान सभा सीट से कांग्रेस के दलबीर सिंह गोल्डी को 58206 रिकार्ड वोटों से हराया।

 

 

विभिन्न क्षेत्रों में पार्टियों को सीटें (कुल सीटें-117)

मालवा कुल सीटें     69

आम आदमी पार्टी       66

कांग्रेस                02

शिअद                01

 

माझा  कुल सीटें      25

आम आदमी पार्टी     16

कांग्रेस               07

शिअद                01

भाजपा              01

 

दोआबा कुल सीटें     23 

आम आदमी पार्टी     10

कांग्रेस              09

शिअद             01

बसपा             01

भाजपा            01

आजाद            01

 

 

अपनी कॉमेडी वीडियो में कहा था यदि ज्यादा नहीं पढ़ सका तो चुनाव लडक़र विधायक, मंत्री बन जाउंगा

कॉमेडियन से राजनेता बने भगवंत मान ने अपने एक पुराने कॉमेडी वीडिया में कहा था कि यदि मैं पढ़ लिख गया तो इंजीनियर डाक्टर बनूंगा और यदि ज्यादा नहीं पढ़ सका तो चुनाव लडक़र विधायक मंत्री तो बन ही जाउंगा। भगवंत मान की यही बात सच हुई। उन्होंने अपनी पढ़ाई बी-काम फस्र्ट इयर के बाद छोडक़र ही पहले कॉमेडी और उसके बाद राजनीति में हाथ आजमाए।

 

भगवंत मान का जन्म 17 अक्तूबर 1973 को पंजाब के  संगरूर जिले के संतोजत गांव में एक स्कूल टीचर महिंदर सिंह के घर हुआ। भगवंत मान की मां हरपाल कौर का कहना है कि वो बचपन से ही अपनी कामेडी से सभी को खूब हंसाता था। 1992 में मान ने संगरूर के शहीद उधम सिंह गवर्नमेंट कालेज में बी.कॉम में दाखिला लिया मगर बीच में ही पढ़ाई छोड़ कॉमेडी को ही अपना कैरियर बना लिया। भगवंत मान ने एक के बाद एक कॉमेडी की 35 एलबम रिलीज की। भगवंत मान अपने प्रत्येक कॉमेडी एलबम में कोई ना कोई गंभीर संदेश अवश्य देते रहे। चाहे वे सरकारी विभागों या राजनीति में भ्रष्टाचार हो समाज में फैली कुरीतियां हों या फिर युवाओं में बेरोजगारी या फिर नशे का मुद्दा हो। उनकी कॉमेडी एलबम कुल्फी गर्मा गरमऔर मिठियां मिर्चां  ने  भगवंत मान को रातों रात स्टार बना दिया। इसके अलावा मान ने कई हिंदी पंजाबी फिल्मों टीवी पर चलने वाले कॉमेडी शोज में भी अपनी प्रतिभा से सभी को प्रभावित किया। मान ने एक स्टैंडअप कामेडियन और राजनेताओं जोक्स व कटाक्ष से अपनी एक अलग पहचान बनाई। राजनेताओं पर कटाक्ष करते करते भगवंत मान ने 1992 पंजाब के पूर्व मंत्री व प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल द्वारा अकाली दल से अलग होकर बनाई गई पंजाब पीपल्स पार्टी(पीपीपी)से अपना  राजनैतिक कैरियर शुरु किया।

उन्होंने 2012 में विधान सभा चुनाव भी लड़ा मगर हार गए। 2014 में भगवंत मान आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए और अकाली दल के नेता सुखदेव सिंह ढींढसा के विरुद्ध संगरूर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और मान सुखदेव सिंह ढींढसा को 2 लाख से अधिक मतों से हराकर पहली बार सांसद बने। 2017 में मान ने सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ जलालाबाद से विधानसभा का चुनाव भी लड़ा मगर उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 2019 में भगवंत मान ने एक बाद फिर से संगरूर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और अपने प्रतिद्वंद्वी  कांग्रेस के केवल सिंह ढिल्लों को एक लाख से अधिक मतों से हराया। कॉमेडी और लिखने के साथ साथ भगवंत मान को स्पोर्ट्स का भी बहुत शौक है। वह वालीबाल के भी खिलाड़ी रहे हैं। इसके साथ ही उन्हें एनबीए, हॉकी, फुटबाल और क्रिकेट के मैच देखने का भी बहुत शौक है।

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पहली हरी कलम बेरोजगारी दूर करने के लिए चलाएंगे

अपनी पार्टी की इस ऐतिहासिक जीत के बाद भगवंत सिंह मान ने लोगों को देश-विदेश में बसे सभी पंजाबियों का धन्यवाद किया और कहा कि आपने अपनी जिम्मेदारी बेहद बखूबी के साथ निभाई है, अब जिम्मेदारी निभाने की बारी हमारी है। मान ने लोगों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि हमारी नीयत अच्छी है, इसीलिए पंजाब के लोगों ने हम पर भरोसा किया है। मुझपर यकीन रखें, एक महीने में बदलाव दिखने लगेगा। अब आपको सरकारी दफ्तरों में बाबुओं के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। अब सरकारी बाबू आपके गांवों व मोहल्लों के चक्कर लगाएंगे और आपके घर पहुंचकर आपका काम करेंगे।

 

मान ने कहा कि मुझे सबसे ज्यादा फिक्र बेरोजगारी की है। बेरोजगार युवक मजबूर होकर नशे में डूब रहे हैं और विदेश जा रहे हैं। महंगी उच्च शिक्षा और रोजगार के अभाव के  कारण पंजाब का पैसा और प्रतिभा का पलायन हुआ है। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद हम पहले दिन ही अपनी हरी कलम बेरोजगारी दूर करने के लिए चलाएंगे। हम युवाओं के हाथ से टीका छीनकर टिफिन पकड़ाएंगे और उन्हें पंजाब में ही शिक्षा व रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराएंगे। मान ने कहा कि कांग्रेस-अकाली सरकार में पंजाब मोती महल, सिसवां फार्म हाउस और बड़ी-बड़ी हवेलियों से चला करता था। अब पंजाब की सरकार गांवों और मोहल्लों से चलेगी। हम पंजाब के सभी पौने तीन करोड़ लोगों की भलाई के लिए काम करेंगे और पंजाब को फिर से पंजाब बनाएंगे।

 

मान ने कहा कि अब पंजाब के सरकारी दफ्तरों में मुख्यमंत्री और नेताओं की तस्वीर नहीं लगेगी। सरकारी दफ्तरों में अब शहीद-ए-आजम भगत सिंह और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगेगी। भगत सिंह ने अपनी जान कुर्बान कर हमें आजादी दिलाई और आजादी मिलने के बाद बाबा साहब ने देश का संविधान लिख कर हमें स्वतंत्रता व समानता का अधिकार दिलाया। हमारा कर्तव्य है कि हम उनके मान को बढ़ाएं और उनके सपनों को साकार करें।

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पहली बार लुढक़े इतने बड़े बड़े दिग्गज

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 अपने चौंकाने वाले परिणामों, नए नए रिकार्डों व भारी उलट फेर के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा। यह तो चुनाव से पहले ही तय हो चुका था कि पंजाब की जनता ने पंजाब की दोनों रवायती पार्टियों को बदलने का मन बना लिया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के पक्ष में बदलाव की बयार पहले ही चलनी शुरु हो चुकी थी। आम आदमी पार्टी और इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल, पंजाब प्रभारी राघव चड्ढा ने चुनावों से काफी पहले ही पंजाब में आम आदमी पार्टी के हक में हवा बनानी शुरु कर दी थी और आम आदमी पार्टी ने इस काम में अपने जनसंपर्क अभियान के तहत आम आदमी से डोर टू डोर मिलने के कार्यक्रम भी चुनावों तक निरंतर जारी रख कांग्रेस व अकालियों को काफी पीछे छोड़ दिया था। इस बार पंजाब की जनता ने केवल बदलाव के मद्देनजर कांग्रेस और अकाली दल के बड़े बड़े दिगगजों को धूल चटा दी। इनमें 5 बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल, पूर्व उप मुख्यमंत्री व अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल, बड़े अकाली नेता और पूर्व मंत्री बिक्रमजीत मजीठिया, पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, कांग्रेस के पूर्व उप मुख्यमंत्री ओपी सोनी, पूर्व मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, पूर्व मंत्री रजिया सुल्तान तथा पूर्व मंत्री आदेश प्रताप कैरों प्रमुख नाम हैं।

 

इनमें सबसे दिलचस्प बात तो यह रही कि लगभग तीस साल बाद इस बार 16वीं विधान सभा में बादल परिवार का कोई भी सदस्य विधानसभा में नहीं जा पाएगा, क्योंकि स्वयं प्रकाश सिंह बादल, उनके पुत्र सुखबीर बादल, सुखबीर बादल के साले बिक्रमजीत मजीठिया, प्रकाश सिंह बादल के दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों, प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल भी इस बार चुनाव हार गए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्रियों की बात करें तो इस बार के चुनावों में पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री(अब पंजाब लोक कांगे्रस) के कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला शहरी से, कांग्रेस की पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल लैहरा से, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भदौड़ व श्री चमकौर साहिब से चुनाव हार चुके हैं।

मुख्यमंत्री चन्नी सहित पंजाब के वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल बठिंडा से, ओपी सोनी अमृतसर सेंट्रल से, राजकुमार वेरका अमृतसर वेस्ट से, विजय इंदर सिंगला संगरूर से, भारत भूषण आशु लुधियाना वेस्ट से, रजिया सुल्ताना मलेर क ोटला से, पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के पौत्र गुरकीरत कोटली खन्ना से चुनाव हार गए हैं।

 

पंजाब के पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा डेरा बाबा नानक, पूर्व ओलंपियन परगट सिंह जालंधर कैंट, अरूणा चौधरी दीनानगर, तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा फतेहगढ़ चूडिय़ां, राणा गुरजीत सिंह, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग गिदड़बाहा, सुखविंदर सरकारिया राजा सांसी सहित कुल आठ मंत्री तथा पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष व राज्य सभा सांसद पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा कादियां, से जीत दर्ज कर कांग्रेस की कुछ साख बचाने में सफल हुए।

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पंजाब की पैड वूमेन के नाम से मशहूर जीवन ज्योत कौर ने सिद्धू और मजीठिया को दी मात

आम आदमी पार्टी की एक आम वालंटियर तथा लंबे समय से समाज सेवा से जुड़ी जीवन ज्योत कौर ने पंजाब के दो सबसे ताकतवर नेताओं को मात देकर इतिहास रच दिया है। जीवन ज्योत कौर ने अमृतसर ईस्ट से पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू व माझा के बादशाह कहे जाने वाले पंजाब के पूर्व मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को हरा कर सबको चौंका दिया। कानून में स्नातक जीवन ज्योत कौर को लोग पंजाब की पैड वूमैन के तौर पर भी जानते हैं। उन्होंने गांवों में महिलाओं को हाइजिन सैनेटरी पैड उपलब्ध करवाने और रियूजेबल सैनेटरी नैपकिन प्रोमोट करने में बहुत काम किया है। पंजाब की जेलों में बंद महिलाओं को भी जीवन ज्योत सैनेटरी पैड उपलब्ध करवाने ाक काम करती रही हैं। वह महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलवाने और महिला सशक्तिकरण के लिए निरंतर काम कर रही हैं। चुनाव से पहले सभी नवजोत सिंह सिद्धू और बिक्रमजीत मजीठिया के बीच क ड़ा मुकाबला मान रहे थे और सभी ने जीवन ज्योत को बहुत हल्के में लिया था। परंतु जीवन ज्योत ने इन दोनो महारथियों को पटखनी देकर सिद्ध कर दिया कि कितना भी बड़ा नेता हो, जनता जिसका साथ देती है उसे कोई नहीं हरा सकता।

अमृतसर ईस्ट से जीवन ज्योत कौर को 39520, नवजोत सिंह सिद्धू को 32807 तथा बिक्रमजीत मजीठिया को 25112 वोट मिले। 

 

13 विजयी महिलाओं में से 10 पहली चुनाव लड़ी

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में 13 महिलाओं ने अपनी ताकत का अहसास करवाते हुए चुनावों में जीत दर्ज की है। इनमें आम आदमी पार्टी की नरिंदर कौर भरज संगरूर से, जीवन ज्योत कौर अमृतसर ईस्ट से, राजिंदरपाल कौर लुधियाना साउथ से, प्रोफेसर बलजिंदर कौर तलवंडी साबो से, डा.अमनदीप कौर मोगा से, सर्वजीत कौर मनूके जगरांव से, इंदरजीत कौर मान नकोदर से, संतोष कुमारी कटारिया बलाचौर से, नीना मित्तल राजपुरा से, अनमोल गगन मान खरड़ से, डा.बलजीत कौर मलोट से विजयी हुई हैं। कांग्रेस की अरुणा चौधरी दीनानगर से तथा शिरोमणि अकाली दल की गुनीव कौर मजीठिया मजीठा से चुनाव जीती हैं।

 

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Wednesday, September 29, 2021

चरणजीत चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस ने किए एक तीर से कई शिकार !!

पंजाब में सियासी तूफान

-कैप्टन के बिना आसान नहीं है कांग्रेस की राह

पंजाब के इतिहास में चरणजीत सिंह चन्नी का नाम पहले अनुसूचित जाति के मुख्यमंत्री के रूप में लिखा जाएगा। इससे पहले 60 के दशक में बिहार में भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने थे। बिहार में दलित मुख्यमंत्री बनने के बाद भी दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया और आज भी बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े, अति पिछड़े हाशिये पर ही है। अब पंजाब में चरणजीत सिंह सिंह चन्नी को लेकर देश की सियासत में दलित नेतृत्व को लेकर बहस छिड़ी है। पंजाब की राजनीति में चरणजीत सिंह चन्नी को लेकर सियासी लोग ये कयास भी लगा रहे हैं कि मौजूदा पंजाब के सीएम सिर्फ कांग्रेस के लिए एक मोहरा हैं। 


कांग्रेस पार्टी ने एक अनुसूचित जाति का मुख्यमंत्री बना कर एक तीर से कई शिकार कर दिए हैं। अपना कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले ही कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बनी अनिश्चितता की स्थिति में कांग्रेस आला कमान ने सबसे पहले पंजाब में एक नये प्रयोग के रूप में पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व  पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ को एक हिंदू नेता के रूप में मुख्यमंत्री बनाना चाहा, उसके बाद एक और जाट सिख नेता व कैप्टन सरकार के कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के नाम पर चर्चा चली। मगर जब इन दोनों ही नेताओं के नाम पर आम सहमति ना बनी तो राहुल गांधी और आलाकमान ने तीन बार के विधायक और कैप्टन सरकार के ही दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले  एक मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी(58) को मुख्यमंत्री बना कर सबको चौंका दिया।


कांग्रेस आलाकमान का यह एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक था जिससे न केवल पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सहित उनके सभी समर्थक विधायकों व पूर्व मंत्रियों को भी चन्नी के नाम पर अपनी सहमति प्रकट करनी पड़ी बल्कि विपक्षी दलों को कांग्रेस के इस दलित कार्ड के सामने पंजाब में दलित वोटरों के लिए तैयार किया गया एक मुद्दा खोना पड़ा। 


इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा चुनाव से पहले एक जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा और पंजाब के बड़े हिंदू नेता ओम प्रकाश सोनी को भी डिप्टी सीएम बनाकर विरोधियों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।


कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के इस निर्णय से  पंजाब के 32 प्रतिशत दलित समाज को उनका मुख्यमंत्री देकर आने वाले चुनाव में अकाली बसपा और भाजपा के किसी दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने के मुद्दे पर भी सेंधमारी कर दी है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा और अकाली दल दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने की केवल घोषणाएं ही करते हैं और कांग्रेस ने तो राज्य को पहला दलित मुख्यमंत्री देकर यह सिद्ध कर दिखाया है कि वे कितने बड़े दलित हितैषी हैं। 


पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिद्धू ने भी उनके  अपने चहेते चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कैप्टन अमरिंदर सिंह को एक करारी शिकस्त दी। वैसे भी चन्नी ने सिद्धू के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में एक अहम भूमिका निभाई है।


बीजेपी और आम आदमी पार्टी भी राज्य में हिंदू मतदाताओं को अपना वोट बैंक मानकर अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है। ऐसे में चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस ने राज्य में ओपी सोनी जैसे पांच बार विधायक रहे बड़े कद के हिंदू चेहरे को उप  मुख्यमंत्री का पद देकर विपक्षी दलों के हिंदू वोटरों को रिझाने के बड़े मुद्दे  को भी हथिया लिया है। यानी एक दलित चेहरे चन्नी को मुख्यमंत्री, जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा को उप मुख्यमंत्री व ओपी सोनी जैसे बड़े हिंदू नेता को उप मुख्यमंत्री पद देकर राज्य के सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश की है।


चन्नी के सामने हैं चुनौतियां बहुत हैं


कांग्रेस आलाकमान एक दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बना कर पंजाब में बेशक इसे अपना एक मास्टर स्ट्रोक मान रही है मगर विधान सभा चुनावों से पहले  कांग्रेस और चन्नी के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता को दरकिनार कर सिद्धू के साथ मिलकर चलने से चन्नी पंजाब कांग्रेस में होने वाली बगावत को रोक पाएंगे? इसके अलावा जैसा कि पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत ने चन्नी के नाम की घोषणा होते ही यह ऐलान कर दिया कि आने वाला चुनाव पंजाब कांग्रेस नवजोत सिद्धू के नेतृत्व में ही लड़ेगी। उनके ऐसा कहते ही पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने इसका जबरदस्त विरोध करते हुए कहा कि इससे मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी की छवि पर असर नहीं पड़ेगा। इसका यह संदेश तो लोगों के बीच नहीं जाएगा कि चन्नी केवल 6 महीने के लिए ही एक पार्टटाईम मुख्यमंत्री बनाए गए हैं, उसके बाद तो सिद्धू ही मुख्यमंत्री होंगे।


इसके अलावा कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो है कि राज्य में चुनावों में केवल छह महीने का वक्त बचा है ऐसे में चन्नी इतने कम समय में क्या कुछ कर पाएंगे और लोगों की अपेक्षाओं पर कैसे खरे उतर पाएंगे?  इसके साथ ही चरणजीत चन्नी और उनकी सरकार को पिछले पांच साल में कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए कामों और जनता से किए गए वायदों को पूरा करने के बारे में भी जनता को जवाब देना पड़ेगा जो कि इतना आसान नहीं होगा।   


कैप्टन के बिना बहुत कठिन है डगर चुनावों की

चरणजीत चन्नी के लिए कैप्टन समर्थित बागी विधायकों को संभालने के साथ-साथ चुनावों में अकाली भाजपा और आम आदमी पार्टी  जैसे प्रमुख विपक्षी दल का सामना कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता के बिना करना है। अमरिंदर सिंह पहले ही कह चुके हैं कि यदि सिद्धू पंजाब के सीएम बनते हैं तो वे उसका जम कर विरोध करेंगे। सिद्धू को कैप्टन पहले ही इमरान खान और बाजवा समर्थक और राष्ट्र विरोधी तक कह चुके हैं। इसका सीधा सीधा नुकसान सिद्धू और कांग्रेस को आने वाले चुनावों में होगा। यानी कांग्रेस को भाजपा, अकाली, आम आदमी पार्टी  के साथ साथ कैप्टन का भी सामना करना पड़ेगा, जो कि इतना आसान नहीं होगा। किसान आंदोलन के कारण कांग्रेस की जो स्थिति पंजाब में मजबूत हुई थी अब वो सिद्धू कैप्टन के झगड़े के कारण बिखरी नजर आ रही है। 

 

अब कैप्टन के सामने क्या है रास्ता

पिछले 54 साल से राजनीति में रहे पंजाब कांग्रेस के बड़े नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनावों से पहले यूं दरकिनार करना कांग्रेस के लिए काफी नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। कांग्रेस ने सिद्धू के रूप में अमरिंदर सिंह का विकल्प चुना है जो कि उनके लिए एक जुए से कम नहीं है। क्योंकि कैप्टन शुरू से ही सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर विरोध कर रहे हैं। कैप्टन ने तो सिद्धू के इमरान खान और जनरल बाजवा के साथ संबंधों को लेकर सिद्धू को देश की सुरक्षा के लिए खतरा तक कह डाला। अब यदि कांग्रेस आगामी चुनावों में सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करती है तो कैप्टन जैसे कद्दावर नेता की बात का कुछ तो असर पंजाब की जनता पर होगा। कैप्टन  की नाराजगी का खामियाजा तो कांग्रेस को भुगतना ही पड़ेगा।


हालांकि अभी तो कैप्टन कांग्रेस में ही हैं और उन्होंने कांग्रेस और विधायक से अपना इस्तीफा नहीं दिया है। मगर उनका चुनावों में सिद्धू के साथ मिलकर चुनावों में जाना लगभग असंभव लगता है। वैसे भी कैप्टन पहले ही कांग्रेस आलाकमान को कह चुके हैं कि उन्हें बहुत अपमानित किया गया, इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी त्याग दिया। अब सवाल यह है कि यदि कैप्टन कांग्रेस के लिए प्रचार नहीं करते और कांग्रेस की ओर से चुनाव नहीं लड़ते तो उनका राजनैतिक भविष्य क्या होगा। कैप्टन पहले ही स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि वे एक सैनिक हैं और अंत तक लड़ते रहेंगे। यह लड़ाई सिद्धू ने शुरु की है और वे इसे जीत कर ही दम लेंगे। यानी संकेत स्पष्ट है कि वे सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकने में पूरी ताकत लगा देंगे। 



अब यदि कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकना है तो उन्हें किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में जाना होगा। कैप्टन का कद पंजाब में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में इतना बड़ा है कि चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या आम आदमी जैसा पंजाब का प्रमुख विपक्षी दल, कोई भी पंजाब के महाराजा  कैप्टन अमरिंदर सिंह के स्वागत में पलक बिछाए तैयार है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद कैप्टन ने इस बात से कभी भी इंकार नहीं किया कि वे किसी अन्य पार्टी में जा सकते हैं। इस सवाल पर उन्होंने केवल इतना ही कहा कि वे अपने समर्थकों, शुभचिंतकों और साथियों से सलाह मशवरे के बाद ही कोई फैसला करेंगे। यानी उनका किसी भी अन्य राजनैतिक दल में जाने की संभावानाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा सीधा खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।


कौन  हैं चरणजीत सिंह चन्नी

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मोहाली जिले की खरड़ तहसील के गांव के रहने वाले हैं, इनका जन्म एक बेहद साधारण दलित परिवार में हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए व लॉ कर चुके चरणजीत चन्नी का राजनीतिक सफर 1993 में खरड़ नगर परिषद के पार्षद के रूप में हुआ। वे पंजाब के श्री चमकौर साहिब विधानसभा से तीन बार विधायक रहे। 2015 से 2016 तक उन्हें अकाली भाजपा सरकार के दौरान विपक्षी दल का नेता भी नियुक्त किया गया। मार्च 2017 में उन्हें कैप्टन सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर टेक्निकल एजुकेशन व इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग मंत्री बनाया गया। चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब विश्वविद्यालय से   पीएचडी भी कर रहे हैं। चरणजीत चन्नी की पत्नी डॉ..कमलजीत कौर खरड़ में ही एसएमओ के पद पर तैनात हैं।