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Friday, August 26, 2022

गुलाम कांग्रेस से आजाद

‘आजाद’ ने राहुल गांधी के सिर फोड़ा कांग्रेस की बदहाली का ठीकरा

गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस छोड़ दी है। कांग्रेस के लिए यह झटका नहीं बल्कि बबंडर की आहट है क्योंकि गुलाम नबी आजाद का पार्टी से जाने के मतलब यह भी है कि कांग्रेस का एक दिग्गज स्तंभ अब भरभरा कर गिर गया है। वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने का असर जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस के खेमों में देखने को मिल रहा है।


वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने आखिरकार कांग्रेस को टाटा बाय-बाय कर ही दिया। हालांकि यह कयास काफी समय से लगाया जा रहा था। अब जब गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया है। ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि अब कांग्रेस का और कितना नुकसान होगा।

कांग्रेस को पास से समझने वाले कहते हैं कि गुलाम नबी आजाद का कांग्रेस से जाना तो फिर भी ठीक है, लेकिन अगर आजाद कांग्रेस छोड़कर किसी और दल या पार्टी में चले गए तब कांग्रेस का क्या होगा। यानी साफ तौर पर जब से आजाद राज्य सभा से रिटायर हुए और प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा उनकी तारीफ हुई। उसके बाद से ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि कभी भी गुलाम अब कांग्रेस से आजाद हो जाएंगे।

गुलाम नबी आजाद ने दिल्ली में कांग्रेस छोड़ी उधर जम्मू कश्मीर से उनके इस्तीफे के साथ ही उनके समर्थक कांग्रेसी नेताओं के इस्तीफों की बाढ़ आ गयी। एक के बाद एक कई इस्तीफे कांग्रेस के दफ्तर पहुंचने लगे।

गुलाम नबी आजाद ने सभी पदो से दिया इस्तीफा  

26 अगस्त कांग्रेस के लिए काला शुक्रवार बनकर आया। इसदिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी के सभी पदों और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसे उन्होंने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेज दिया। 5 पन्नों के इस्तीफे में उन्होंने लिखा- दुर्भाग्य से पार्टी में जब राहुल गांधी की एंट्री हुई और जनवरी 2013 में जब आपने उनको पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया, तब उन्होंने पार्टी के सलाहकार तंत्र को पूरी तरह से तबाह कर दिया।

आजाद यहीं नहीं रुके, कहा- राहुल की एंट्री के बाद सभी सीनियर और अनुभवी नेताओं को साइडलाइन कर दिया गया और गैरअनुभवी चापलूसों का नया ग्रुप खड़ा हो गया और यही पार्टी को चलाने लगा।

 

दो घंटे में कैंपेन कमेटी अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था

आजाद कई दिनों से हाईकमान के फैसलों से नाराज थे। इसी महीने 16 अगस्त को कांग्रेस ने आजाद को जम्मू-कश्मीर प्रदेश कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाया था, लेकिन आजाद ने अध्यक्ष बनाए जाने के 2 घंटे बाद ही पद से इस्तीफा दे दिया था। आजाद ने कहा था कि ये मेरा डिमोशन है।

73 साल के आजाद अपनी सियासत के आखिरी पड़ाव पर फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालना चाह रहे थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी बजाय 47 साल के विकार रसूल वानी को ये जिम्मेदारी दे दी। वानी गुलाम नबी आजाद के बेहद करीबी हैं। वे बानिहाल से विधायक रह चुके हैं। आजाद को यह फैसला पसंद नहीं आया। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व आजाद के करीबी नेताओं को तोड़ रहा है और आजाद इससे खफा हैं।

कांग्रेस हाईकमान से पहले भी खटपट हुई, मामला सुलझ गया

यह पहली बार नहीं है, जब गुलाम नबी आजाद 10 जनपथ यानी सोनिय गांधी के गुड लिस्ट से बाहर हैं। 2008 में जम्मू-कश्मीर मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी उनका कांग्रेस हाईकमान से खटपट हुई थी। हालांकि, 2009 में आध्र प्रदेश कांग्रेस में विवाद के बाद हाईकमान ने आजाद को समस्या सुलझाने की जिम्मेदारी दी। इसके बाद फिर वे गुड लिस्ट में शामिल हुए और केंद्र में मंत्री बने। सूत्रों के मुताबिक, इस बार कांग्रेस हाईकमान से उनका समझौता नहीं हो पाया, इस वजह से उन्होंने इस्तीफा ही दे दिया।

जी-23 ग्रुप का हिस्सा थे गुलाम नबी आजाद

गुलाम नबी आजाद पार्टी से अलग उस जी 23 समूह का भी हिस्सा थे, जो पार्टी में कई बड़े बदलावों की पैरवी करता है। उन तमाम गतिविधियों के बीच इस इस्तीफे ने गुलाम नबी आजाद और उनके कांग्रेस के साथ रिश्तों पर सवाल खड़ा कर दिया है। केंद्र ने इसी साल गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया है।

आजाद की राज्यसभा से विदाई पर भावुक हुए थे PM मोदी

गुलाम नबी आजाद की राज्यसभा से विदाई के वक्त अपने भाषण में PM मोदी ने उन्हें दोस्त बताया था।

गुलाम नबी आजाद की राज्यसभा से विदाई के वक्त अपने भाषण में PM मोदी ने उन्हें दोस्त बताया था।

आजाद का राज्यसभा का कार्यकाल 15 फरवरी 2021 को पूरा हो गया था। उसके बाद उन्हें उम्मीद थी कि किसी दूसरे राज्य से उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा। आजाद का कार्यकाल खत्म होने वाले दिन उन्हें विदाई देते हुए PM नरेंद्र मोदी भावुक हो गए थे। 2021 में मोदी सरकार ने गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण सम्मान दिया था। कांग्रेस के कई नेताओं को यह पंसद नहीं आया। नेताओं ने सुझाव दिया था कि आजाद को यह सम्मान नहीं लेना चाहिए।

बता दें कि कुछ दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने पार्टी की राज्य इकाई की संचालन समिति के अध्यक्ष पद से रविवार को इस्तीफा दे दिया था। इस पर उन्होंने कहा था कि जी -23 समूह पार्टी को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है और पार्टी हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में एकजुट होकर उतरेगी। उन्होंने ‘‘निरंतर बाहर रखे जाने एवं अपमान'' का हवाला देते हुए पार्टी की संचालन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। जी-23 उन असंतुष्ट वरिष्ठ नेताओं का एक समूह है जिसने संगठन में आमूल-चूल फेरबदल की मांग की है। शर्मा भी इस समूह का हिस्सा हैं।

भड़की कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद के DNA पर उठा दिया सवाल, कहा- धोखेबाजी का कैरेक्टर

जयराम रमेश ने कहा कि गुलाम नबी आजाद का डीएनए मोदीफाइड हो गया है। उन्होंने कहा कि एक ऐसे शख्स को जिसे कांग्रेस की लीडरशिप ने इतना सम्मान दिया, उसने बेहद निजी और घटिया हमले करके विश्वासघात किया है।

गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से अपने 51 साल पुराने रिश्ते को तोड़ दिया है और अब नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है। उनके इस फैसले से कांग्रेस के नेता भड़क गए हैं। इस बीच वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने उनके डीएनए पर ही सवाल उठा दिया है। मीडिया से बात करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि गुलाम नबी आजाद का डीएनए मोदीफाइड हो गया है। उन्होंने कहा कि एक ऐसे शख्स को जिसे कांग्रेस की लीडरशिप ने इतना सम्मान दिया, उसने बेहद निजी और घटिया हमले करके विश्वासघात किया है। उन्होंने कहा कि आजाद के इस रवैये से उनका असली कैरेक्टर सामने आ गया है।

राहुल के गार्ड-पीए लेते हैं फैसले, जाते-जाते आजाद ने निकाली भड़ास

कांग्रेस के एक अन्य नेता संदीप दीक्षित ने भी गुलाम नबी आजाद के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुझे इसमें विश्वासघात की बू आ रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी में रहना जरूरी था। जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस इस वक्त महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ रही है और ऐसे वक्त में गुलाम नबी आजाद का पार्टी से अलग हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। जयराम रमेश बोले, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है कि ऐसे वक्त में यह हुआ है, जब सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस पार्टी भाजपा से मुद्दों पर लड़ रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी और ध्रुवीकरण के खिलाफ मुकाबला कर रहे हैं।'

यही नहीं पवन खेड़ा ने तो गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे को राज्यसभा की सीट से भी जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इस बार गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा नहीं भेजा। शायद इसी वजह से उनका पार्टी से इस्तीफा आया है। पवन खेड़ा ने कहा कि जब से उनकी राज्यसभा सीट चली गई थी, वह बेचैन हो गए थे। इससे पता चल जाता है कि वह बिना पद के एक सेकेंड के लिए भी नहीं रह सकते।

गुलाम नबी आजाद ने राहुल पर अटैक कर छोड़ी है कांग्रेस

बता दें कि गुलाम नबी आजाद ने आज ही 5 पन्नों का लंबा खत सोनिया गांधी को लिखकर कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने इस पत्र में राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उनके राजनीति में आने के बाद से ही कांग्रेस की वह व्यवस्था समाप्त हो गई, जिसमें सबकी सहमति और समन्वय से काम किया जाता था।

गुलाम नबी आजाद का राजनीति का सफरनामा

अटकलों के बीच दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने आज कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। वह गांधी परिवार के बेहद करीबी नेताओं में से एक माने जाते रहे हैं। लेकिन समय के साथ कांग्रेस में बदलावों के बाद वह पार्टी में जी-23 के मुख्य नेता के रूप में उभरे। राजनीति में उनके अनुभव और कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर सहित देश के करीब सभी राज्यों में उनकी सक्रियता रही है। मार्च 2022 में गुलाम नबी आजाद को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्म भूषण मिला।

1973 में गुलाम नबी आजाद ने भलस्वा में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के सचिव के रूप में राजनीति की शुरुआत की थी। इसके बाद उनकी सक्रियता और शैली को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें युवा कांग्रेस का अध्यक्ष चुना। उन्होंने महाराष्ट्र में वाशिम निर्वाचन क्षेत्र से 1980 में पहला संसदीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 1982 में उन्हें केंद्रीय मंत्री के रूप में कैबिनेट में शामिल किया गया। डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली दूसरी यूपीए सरकार में, आजाद ने भारत के स्वास्थ्य मंत्री का पदभार संभाला। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का विस्तार किया। साथ ही झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले शहरी गरीबों की सेवा के लिए एक राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन भी शुरू किया।

आजाद के जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में 21 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। इसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी।

गुलाम नबी आजाद का अब तक का सियासी सफर

2008 भद्रवाह से जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए फिर से निर्वाचित हुए। दया कृष्ण को 29,936 मतों के अंतर से हराया।

2009: चौथे कार्यकाल के लिए राज्यसभा के लिए चुना गया और बाद में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया।

2014: राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे।

2015: वह पांचवीं बार राज्यसभा के लिए फिर से चुने गए।


एक के बाद एक क्यों कांग्रेसी छोड़ रहे हैं कांग्रेस

कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने शुक्रवार को पार्टी छोड़ दी। आजाद ने सोनिया गांधी को पांच पेज का इस्तीफा भेजा है। इसमें उन्होंने कई आरोप लगाए हैं। आजाद ने लिखा है कि कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। राहुल गांधी अनुभवहीन लोगों से घिरे हुए हैं। यह भी लिखा है कि अब कांग्रेस में न तो इच्छा शक्ति बची है और न ही काबिलियत। 

इसके पहले 16 अगस्त को गुलाम नबी आजाद को जम्मू-कश्मीर कांग्रेस की कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन आजाद ने अध्यक्ष बनाए जाने के 2 घंटे बाद ही पद से इस्तीफा दे दिया था। आजाद से दो दिन पहले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने भी पार्टी छोड़ी है।

पिछले दो साल के रिकॉर्ड देखें तो इनमें कई नेताओं के नाम शामिल हो चुके हैं। फिर वह ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या जितिन प्रसाद, कपिल सिब्बल और हार्दिक पटेल। एक के बाद एक कई दिग्गज नेता कांग्रेस का दामन छोड़ दूसरी पार्टियों में शामिल हो चुके हैं। कई ऐसे भी हैं, जो पार्टी के बड़े पदों पर नहीं बैठना चाहते हैं। इनमें आनंद शर्मा जैसे दिग्गज नेता शामिल हैं। आनंद शर्मा ने पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव संचालन समिति (स्टीयरिंग कमेटी) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। 

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? क्यों कोई बड़ा नेता पार्टी के बड़े पदों को नहीं संभालना चाहता है? आइए इसके कारण जानते हैं...

इस्तीफा देने वाले ज्यादातर नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व पर उठाए सवाल

कांग्रेस छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व और खासतौर पर राहुल गांधी पर सवाल खड़े किए हैं। गुलाम नबी आजाद ने अपने इस्तीफा में लिखा है कि कांग्रेस में अब कुछ भी ठीक नहीं है। राहुल गांधी के आसपास अनुभवविहीन लोग हैं। पार्टी में अब न तो इच्छा शक्ति बची है और न ही काबिलियत। लगातार पार्टी में वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया जा रहा है।

इसके दो दिन पहले पार्टी से इस्तीफा देने वाले जयवीर शेरगिल ने भी कुछ इसी तरह के सवाल उठाए थे। शेरगिल ने लिखा था, 'मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि निर्णय लेना अब जनता और देश के हितों के लिए नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के स्वार्थी हितों से प्रभावित है, जो चाटुकारिता में लिप्त हैं और लगातार जमीनी हकीकत की अनदेखी कर रहे हैं।'

जितिन प्रसाद, हार्दिक पटेल, ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत कई नेताओं ने भी इस्तीफा देते हुए राहुल गांधी पर ही सवाल खड़े किए थे। सभी ने अपने इस्तीफा में लिखा था कि राहुल गांधी कांग्रेस नेताओं को मिलने का समय नहीं देते हैं। वह कार्यकर्ताओं और नेताओं की बात नहीं सुनते हैं। 

Monday, January 3, 2022

यूपी चुनाव 2022 : पूर्वांचल में क्यों फोकस कर रही है बीजेपी?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वांचल को लेकर हैं गंभीर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और जेवर एयरपोर्ट से पहले पूर्वांचल को मिली विकास की सौगात

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश को लगातार विकास की सौगात तो दे ही रहे हैं साथ ही योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी लगातार कर रहे हैं।



देखने में ऐसा लग रहा है जैसे पीएम नरेन्द्र मोदी ने ही उत्तर प्रदेश की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में थाम ली है। वहीं, देखने में ये भी आ रहा है कि पीएम का ज्यादा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित है। इसी फेहरिस्त में मोदी ने सिद्धार्थनगर और वारणसी को विकास की सौगात से भी नवाजा है।

जी हां, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे–वैसे राजनीतिक दलों ने अपने सियासी अभियान तेज कर दिए हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने यूपी चुनाव की कमान संभाल ली है। प्रधानमंत्री का अब पूरा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित हो चला है।

अगर अक्टूबर की ही बात की जाए, अक्टूबर में ही प्रधानमंत्री ने पूर्वांचल क्षेत्र का दो बार दौरा किया है। साथ ही क्षेत्र के विकास के लिए सौगात भी दी हैं। प्रधानमंत्री ने केन्द्र व राज्य सरकार की यहां उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की यहां के लोगों से अपील की है।


9 मेडिकल कॉलेज की सौगात

पीएम नरेन्द्र मोदी ने सिद्धार्थनगर से उत्तर प्रदेश को एक साथ 9 मेडिकल की सौगात दी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी चिकित्सा महाविद्यालय का लोकार्पण करने के साथ 2239 करोड़ रुपये की लागत से देवरिया, एटा, फतेहपुर, हरदोई, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर के नवनिर्मित मेडिकल कॉलेजों के राज्य स्वशासी मेजिकल कालेजों का वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

यूपी के लिए पूर्वांचल की जीत जरूरी

देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है तो यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है। इसी फॉर्मूले से लगातार दो लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली बीजेपी मिशन-2022 के लिए पूर्वांचल में पैठ बनाने की कोशिश में है। इसी के मद्देनजर पीएम मोदी का फिलहाल पूरा फोकस पूर्वांचल पर है। पीएम मोदी एक तरफ पूर्वांचल को मेडिकल कॉलेजों की सौगात दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल के विकास के लिए योजना भी तैयार करवाकर पूर्वांचल के लोगों को सौंपने की बात कह रहे हैं।

दरअसल, किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड के बाद से पश्चिम यूपी, तराई बेल्ट और अवध के इलाके में सरकार के खिलाफ माहौल गर्म है। वहीं, पूर्वांचल अभी भी बीजेपी का गढ़ माना जाता है। जिसकी सबसे बड़ी वजह पीएम नरेन्द्र मोदी का वाराणसी से सांसद होना है और गोरखपुर से सीएम योगी का होना है।

पूर्वांचल में राजभर ने बढ़ाई चुनौती

हालांकि, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर औऱ सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हाथ मिलाने के बाद बीजेपी के सामने अपने दुर्ग पूर्वांचल को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इतना ही नहीं बीजेपी को लोकसभा औऱ जिला पंचायत अध्यक्ष के  चुनाव में पूर्वांचल इलाके में ही झटका लगा था। इसीलिए बीजेपी लगातार पूर्वांचल के सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है।

यूपी में चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल में करीब 6 जनसभा रखी हैं। इन चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार की उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की लोगों से अपील करेंगे। इसकी शुरुआत करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर को भगवान बुद्ध की धरती कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का भी शुभारंभ किया और चुनावी जनसभाओं का एक तरह से आगाज भी कर दिया।

कुशीनगर में एयरपोर्ट के साथ-साथ पीएम मोदी 478.74 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की भी सौगात दी है। 116.21 करोड़ से तैयार 11 परियोजनाओं का लोकार्पण और 362.53 की लागत से मेडिकल कॉलेज सहित तीन परियोजनाओं का तोहफा पीएम मोदी ने पूर्वांचल को दिया है। इसके अलावा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर के खाद कारखाना मैदान में जनसभा भी अक्टूबर में ही की गयी। इस जनसभा के बाद खाद कारखाना व गोरखपुर एम्स का लोकार्पण भी किया जाना है।

 

बीजेपी का सियासी समीकरण

पूर्वांचल में बीजेपी ने अपने समीकरण को मजबूत बनाए रखने के लिए जातीय आधारित पार्टियों के साथ भी गठबंधन कर रखा है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ बीजेपी मिलकर इसबार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। बीजेपी के इन दोनों ही दलों का सियासी आधार पूर्वांचल के जिलों में है। अनुप्रिया पटेल की कुर्मी वोटों पर पकड़ है तो संजय निषाद का मल्लाह समुदाय पर। इसके अलावा बीजेपी की नजर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी पर भी है। जिनके साथ गठबंधन फिर से किये जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस तरह बीजेपी पूर्वांचल के सियासी रण को बीजेपी मजबूती के साथ जीतने की रणनीति तैयार कर रही है।

यूपी की 33 फीसदी सीटें पूर्वांचल में हैं

पूर्वांचल की जंग फतह करने के बाद ही यूपी की सत्ता पर कोई पार्टी काबिज हो सकती है। क्योंकि सूबे की 33 फीसदी सीटें इसी इलाके की हैं। यूपी के 28 जिले पूर्वांचल में आते हैं। जिनमें कुल 164 विधानसभा सीटें हैं। 2017 के चुनाव में पूर्वांचल की 164 सीटों में से बीजेपी ने 115 सीट पर कब्जा जमाया था। जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस ने 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थी। हालांकि पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। वह एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में एक का साथ छोड़कर दूसरे का साथ पकड़ता रहा है। यही वजह है कि बीजेपी 2022 के चुनाव में अपने गढ़ को मजबूत करने में जुट गई है।

मोदी का मिशन पूर्वांचल

पीएम मोदी ने अपने चुनावी अभियान के लिए एक बार फिर पूर्वांचल की धरती को ही चुना। इसके पहले पीएम ने 2014 – 2019 के लोकसभा और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत पूर्वांचल से ही की थी। मिशन – 2022 का आगाज भी पूर्वांचल में कुशीनगर को इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सौगात से किया गया और सिद्धार्थनगर और काशी का दौरा कर चुनावी माहौल बनाया गया।

बहरहाल, पीएम मोदी और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब पूरी तरह से चुनावी मोड में हैं। और राजनीति के जानकारों की माने तो बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसी भी हाल में अपने हाथ से छूटने नहीं देना चाहती। साथ ही बीजेपी को इस बात का भी अंदाजा है कि इसबार का उत्तर प्रदेश का चुनाव उतना भी आसान नहीं होगा और जीत का आंकड़ा भी शायद वो नहीं होगा जो पिछली विधानसभा चुनाव के समय में था। वहीं, सच ये भी है कि उत्तर प्रदेश में इस बार बीजेपी के साथ बसपा, सपा और कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी भी सत्ता में आने का सपना संजोय बैठी हैं और जोड़ तोड़ की राजनीति के साथ-साथ हर एक वो हथकंडा अपना रही हैं जिससे उन्हें उत्तर प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा सीटें मिल जाए। 

बॉक्स...एक

मुस्लिम वोटों के लए उलेमाओं की शरण में सपा, अबु आजमी से अखिलेश यादव तक सक्रिय

मुस्लिम वोटों के दम पर ही मुलायम सिंह यादव तीन बार और अखिलेश यादव एक बार उत्तर प्रदेश में सत्ता की कमान संभाल चुके हैं। अब 2022 के यूपी चुनाव में मुसलमानों को सपा अपने साथ मजबूती से जोड़ने के लिए उलेमाओं का सहारा लेने की कवायद में जुट गयी है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में मुसलमानों की भूमिका अहम मानी जाती है। यह बात समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बेहतर भला कौन समझ सकता है।

मुस्लिम उलेमाओं से मिलकर वोटर्स को साधने की कोशिश में सपा प्रमुख

सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस ईद-मिलादुन्नबी के मौके पर लखनऊ के ऐशबाग ईदगाह पहुंचे। यहां उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद राशीद फरंगी महली से मिलकर मोहम्मद साहब के जन्मदिन की बधाई दी। वहीं, सपा के मुस्लिम नेता व विधायक अबु आसिम आजमी ने भी लखनऊ में मुस्लिमों के धार्मिक संगठन सुन्नी मजलिस-ए-अमल के अध्यक्ष मौलान वली फारूकी सहित तमाम उलेमाओं के साथ मुलाकात औऱ बैठक की। इस बैठक की फोटो भी आजमी ने खुद अपने सोशल मीडिया पर शेयर की थी।

 

मुस्लिमों के बीच ओवैसी की सक्रियता

उत्तर प्रदेश में इस बार के चुनाव में बीजेपी के हार्ड हिन्दुत्व के सामने अखिलेश यादव खुलकर मुस्लिम कार्ड खेलने से अभी तक बच रहे थे। लेकिन, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में बढ़ती सक्रियता और कांग्रेस की मुस्लिम वोटों पर नजर को देखते हुए सपा के सामने अपने कोर वोट बैंक को साधे रखने की चुनौती है। ऐसे में अखिलेश यादव के बाद सपा नेता अबु आसिम आजमी की सूबे के उलेमाओं के साथ हुई मुलाकात को 2022 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, ओवैसी ने सूबे की 100 सीटों पर कैंडिडेट उतारने का ऐलान किया है। पिछले 8 महीनों से ओवैसी यूपी का लगातार दौरा कर रहे हैं और उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाके की सीटों को टारगेट किया है। ओवैसी मुस्लिम लीडरशिप को स्थापित करने और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सबसे बड़ा सियासी हथियार बना रहे हैं। मुस्लिम युवाओं के बीच ओवैसी का सियासी ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है तो कांग्रेस भी मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में लाने के तमाम जतन कर रही है। उलेमाओं से लेकर मस्जिदों तक सहारा ले रही है।

 

आजम की जगह आजमी मुस्लिम चेहरा

वही, सपा के कद्दावर मुस्लिम चेहरा व रामपुर से सांसद आजम खान के जेल में बंद होने के चलते पार्टी के पास कोई दूसरा बड़ा नेता नहीं है। ऐसे में अखिलेश यादव ने महाराष्ट्र के मुंबई से विधायक अबु आसिम आजमी को यूपी के लिए मुसलमानों को साधे रखने का जिम्मा सौंपा है। आजमी सूबे में अलग-अलग जिलों का दौरा करके मुस्लिमों को सपा से जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने सुन्नी मुजलिस-ए-अमल के अध्यक्ष मौलाना वली फारूकी के साथ बैठक की है।

 

यूपी में 20 फीसदी मुस्लिम वोटर अहम

उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। सूबे की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम अपना असर रखते हैं। इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है। 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान 30 फीसदी से ज्यादा है। सूबे की करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं जबकि करीब 107 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं। इनमें ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश की है।

 

क्या मुस्लिमों की पहली पसंद बनेगी सपा

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बाच सपा की अच्छी पैठ मानी जाती है। सूबे में 20 फीसदी मुस्लिम औऱ 10 फीसदी यादव वोटरों के सहारे सपा के एम-वाई समीकरण के दम पर मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव यूपी की सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं।

1990 का अयोध्या गोलीकांड औऱ उसके बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस के चलते सूबे में जो माहौल बदला उसमें मुस्लिम वोटों का सबसे ज्यादा फायदा मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा को मिला। इसी मुस्लिम वोटों के दम पर मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक सूबे के मुख्यमंत्री बने।

 


यूपी के सियासी माहौल में अखिलेश यादव मुस्लिम और यादव वोटों को अपना कोर वोटबैंक मानकर चल रहे हैं। 2022 में सत्ता में वापसी के लिए मुस्लिम-यादव वोटबैंक में अन्य ओबीसी के वोटों के कुछ हिस्से को जोड़ने की कोशिश में अखिलेश यादव जुटे हैं। बीजेपी के पास सत्ता होने के चलते जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें अभी तक मुस्लिम के बीच सपा सबसे पहली पंसद मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस से लेकर बसा और मुस्लिम पार्टियां यादव मुस्लिम समीकरण को तोड़ने की कवायद में जुटी है। इसीलिए सपा भी मुस्लिमों के बीच अपनी पैठ कायम रखने के लिए उलेमाओं का सहारा ले रही है।

UP Election 2022: '22 के रण' से '24 की पिच' की तैयारी कर रही है भाजपा, काशी विश्वनाथ, जेवर पूर्वांचल से क्या सधेगा निशाना

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणभेरी अभी तक बजी नहीं है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में बीजेपी पूरे चुनावी मोड में है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार उत्तर प्रदेश में रैली, उद्घाटन, शिलान्यास और योजनाओं की सौगात दे रहे हैं। वहीं, पूर्वांचल में खाद कारखाना, मेडिकल कॉलेज और तकरीबन 3000 करोड़ की योजनाओं की घोषणा करने के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में जेवर एयरपोर्ट, फिल्मसिटी की सौगात सैंपी।


अब प्रधानमंत्री ने काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के पहले चरण के पूरे होने के बाद उद्घाटन किया है। जिसके बाद यह साफ देखने को मिल रहा है कि बीजेपी अब उत्तर प्रदेश को लेकर पूरे चुनावी मोड में है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर काफी गंभीर हैं।

वहीं, अब जिन परियोजनाओं का हो रहा शिलान्यास, उनका 2024 से पहले उद्घाटन होगा। केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं में तेजी दिखेगी।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि चुनाव तो 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का है लेकिन इसके बहाने भाजपा 2024 की पिच भी तैयार कर रही है। इस पिच पर विकास का उछाल होगा तो आस्था के नाम पर स्विंग भी खूब पड़ेंगी। इसके लिए टीम भाजपा ने अपनी एक कोर कमेटी का गठन भी कर दिया है। जो अभी से 2024 में चुनावी रोड मैप तैयार करने लगा है। इस कमेटी के सदस्यों का काम उन योजनाओं पर नजर रखने के साथ उनको 2024 चुनाव से पहले तक पूरा करवाने का भी है जिनका प्रधानमंत्री शिलान्यास कर रहे हैं या राज्य और केंद्र सरकारें जिन बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने वाली हैं। 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों का माहौल बनाने की शुरुआत तो भारतीय जनता पार्टी ने विकास के मॉडल के साथ की है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर से बने चुनावी माहौल से अब तक उत्तर प्रदेश में जितने दौरे किए हैं वह सभी विकास के नाम पर शुरू हुए प्रोजेक्ट के उद्घाटन और शिलान्यास से ही हुए हैं। इसमें कुछ प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ तो कुछ का उद्घाटन भी किया गया। 

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जिन प्रोजेक्ट का उद्घाटन हुआ उसका निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनाव में फायदा मिलेगा। वह कहते हैं कि जिन प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ है उनमें ज्यादातर का उद्घाटन 2024 से पहले हो जाएगा। ऐसे में एक बात तो बिल्कुल साफ है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में विकास के नाम पर रखी गई आधारशिलाओं से 2024 का चुनाव भी सधेगा। 




कमेटी के हर सदस्य की जिम्मेदारियां तय

भाजपा केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पार्टी ने अपने तमाम राजनैतिक और आस्था के मुद्दों के साथ विकास को ही तरजीह दी है। भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जिन प्रोजेक्ट का शिलान्यास प्रधानमंत्री मोदी ने किया है उसकी गति पर नजर रखने के लिए पार्टी ने एक कोर कमेटी का गठन भी किया है। इस कोर कमेटी में केंद्रीय मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों के साथ-साथ राज्य स्तर के पार्टी पदाधिकारी भी शामिल हैं। 

सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी की एक और कमेटी इन प्रोजेक्ट को न सिर्फ मॉनिटर करेगी बल्कि इस पर लगातार नजर भी रखेगी। कोर कमेटी से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि जो प्रोजेक्ट 2024 तक शुरू होने हैं उनको और तेज गति देने के लिए कमेटी संबंधित मंत्रालय और अधिकारियों के संपर्क में भी रहेगी, ताकि किसी भी तरीके की कोई लापरवाही न हो। ऐसे सभी सदस्यों के पास किसी न किसी तरीके की जिम्मेदारियां हैं जो समय-समय पर पार्टी आलाकमान को अपना फीडबैक भी देती रहेंगी।

2024 में होने वाले लोकसभा के चुनावों से पहले कई अहम प्रोजेक्ट सिरे चढ़ चुके होंगे या चढ़ने वाले होंगे। बनाई गई कोर कमेटी के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा। इसे लोकसभा या विधानसभा के चुनावों से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यह जब पूरे होंगे तो निश्चित तौर पर किसी न किसी चुनाव के दौरान उद्घाटन और शिलान्यास होते रहेंगे। हालांकि सूत्रों का कहना है कि जिस तरीके से बीते कुछ महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया है वह 2024 से पहले सिरे चढ़ने शुरू हो जाएंगे। 

हर प्रोजेक्ट की टाइम लाइन तय 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेवर एयरपोर्ट का शिलान्यास किया था। इस एयरपोर्ट का रनवे 2023 में शुरू होना है। इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 दिसंबर को गंगा एक्सप्रेस वे का शिलान्यास कर दिया। इस प्रोजेक्ट को भी 2024 से पहले शुरू कर दिया जाएगा। इसके अलावा बुंदेलखंड में बनने वाले बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का भी अगले महीने लोकार्पण किया जाएगा और 2024 से पहले एक बड़े फेज को न सिर्फ शुरू किया जाएगा बल्कि कनेक्टिंग एक्सप्रेस वे से जोड़ भी दिया जाएगा। 

उत्तर प्रदेश में ही अगले 3 साल में कई और डोमेस्टिक एयरपोर्ट न सिर्फ बनाए जाएंगे बल्कि उनको भी शुरू करने की योजना है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मेट्रो को शुरू किया जाना है जिसकी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक 2024 से पहले कई बड़े शहरों में मेट्रो की शुरुआत हो जाएगी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को भी पूरी तरह से शुरू कर दिया जाएगा। अगले 3 सालों के भीतर उत्तर प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल भी इसी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में बननी शुरू हो जाएगी। 

सूत्रों के मुताबिक सिर्फ यही नहीं बल्कि पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के बाद केंद्र सरकार की योजना है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश से बिहार होते हुए पूरे नॉर्थ ईस्ट को एक बड़े एक्सप्रेस से कनेक्ट किया जाए। इसके अलावा तय योजना के मुताबिक 2023 में ही राम मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी विकास और आस्था के इस पूरे मॉडल के साथ 2024 की पिच अभी से तैयार करने लगी है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वांचल को लेकर हैं गंभीर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और जेवर एयरपोर्ट से पहले पूर्वांचल को मिली विकास की सौगात

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश को लगातार विकास की सौगात तो दे ही रहे हैं साथ ही योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी लगातार कर रहे हैं।

देखने में ऐसा लग रहा है जैसे पीएम नरेन्द्र मोदी ने ही उत्तर प्रदेश की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में थाम ली है। वहीं, देखने में ये भी आ रहा है कि पीएम का ज्यादा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित है। इसी फेहरिस्त में मोदी ने सिद्धार्थनगर और वारणसी को विकास की सौगात से भी नवाजा है।

जी हां, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे–वैसे राजनीतिक दलों ने अपने सियासी अभियान तेज कर दिए हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने यूपी चुनाव की कमान संभाल ली है। प्रधानमंत्री का अब पूरा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित हो चला है।

अगर अक्टूबर की ही बात की जाए, अक्टूबर में ही प्रधानमंत्री ने पूर्वांचल क्षेत्र का दो बार दौरा किया है। साथ ही क्षेत्र के विकास के लिए सौगात भी दी हैं। प्रधानमंत्री ने केन्द्र व राज्य सरकार की यहां उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की यहां के लोगों से अपील की है।

 


9 मेडिकल कॉलेज की सौगात

पीएम नरेन्द्र मोदी ने सिद्धार्थनगर से उत्तर प्रदेश को एक साथ 9 मेडिकल की सौगात दी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी चिकित्सा महाविद्यालय का लोकार्पण करने के साथ 2239 करोड़ रुपये की लागत से देवरिया, एटा, फतेहपुर, हरदोई, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर के नवनिर्मित मेडिकल कॉलेजों के राज्य स्वशासी मेजिकल कालेजों का वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

यूपी के लिए पूर्वांचल की जीत जरूरी

देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है तो यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है। इसी फॉर्मूले से लगातार दो लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली बीजेपी मिशन-2022 के लिए पूर्वांचल में पैठ बनाने की कोशिश में है। इसी के मद्देनजर पीएम मोदी का फिलहाल पूरा फोकस पूर्वांचल पर है। पीएम मोदी एक तरफ पूर्वांचल को मेडिकल कॉलेजों की सौगात दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल के विकास के लिए योजना भी तैयार करवाकर पूर्वांचल के लोगों को सौंपने की बात कह रहे हैं।

दरअसल, किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड के बाद से पश्चिम यूपी, तराई बेल्ट और अवध के इलाके में सरकार के खिलाफ माहौल गर्म है। वहीं, पूर्वांचल अभी भी बीजेपी का गढ़ माना जाता है। जिसकी सबसे बड़ी वजह पीएम नरेन्द्र मोदी का वाराणसी से सांसद होना है और गोरखपुर से सीएम योगी का होना है।

पूर्वांचल में राजभर ने बढ़ाई चुनौती

हालांकि, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर औऱ सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हाथ मिलाने के बाद बीजेपी के सामने अपने दुर्ग पूर्वांचल को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इतना ही नहीं बीजेपी को लोकसभा औऱ जिला पंचायत अध्यक्ष के  चुनाव में पूर्वांचल इलाके में ही झटका लगा था। इसीलिए बीजेपी लगातार पूर्वांचल के सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है।

यूपी में चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल में करीब 6 जनसभा रखी हैं। इन चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार की उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की लोगों से अपील करेंगे। इसकी शुरुआत करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर को भगवान बुद्ध की धरती कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का भी शुभारंभ किया और चुनावी जनसभाओं का एक तरह से आगाज भी कर दिया।

कुशीनगर में एयरपोर्ट के साथ-साथ पीएम मोदी 478.74 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की भी सौगात दी है। 116.21 करोड़ से तैयार 11 परियोजनाओं का लोकार्पण और 362.53 की लागत से मेडिकल कॉलेज सहित तीन परियोजनाओं का तोहफा पीएम मोदी ने पूर्वांचल को दिया है। इसके अलावा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर के खाद कारखाना मैदान में जनसभा भी अक्टूबर में ही की गयी। इस जनसभा के बाद खाद कारखाना व गोरखपुर एम्स का लोकार्पण भी किया जाना है।

बीजेपी का सियासी समीकरण

पूर्वांचल में बीजेपी ने अपने समीकरण को मजबूत बनाए रखने के लिए जातीय आधारित पार्टियों के साथ भी गठबंधन कर रखा है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ बीजेपी मिलकर इसबार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। बीजेपी के इन दोनों ही दलों का सियासी आधार पूर्वांचल के जिलों में है। अनुप्रिया पटेल की कुर्मी वोटों पर पकड़ है तो संजय निषाद का मल्लाह समुदाय पर। इसके अलावा बीजेपी की नजर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी पर भी है। जिनके साथ गठबंधन फिर से किये जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस तरह बीजेपी पूर्वांचल के सियासी रण को बीजेपी मजबूती के साथ जीतने की रणनीति तैयार कर रही है।

यूपी की 33 फीसदी सीटें पूर्वांचल में हैं

पूर्वांचल की जंग फतह करने के बाद ही यूपी की सत्ता पर कोई पार्टी काबिज हो सकती है। क्योंकि सूबे की 33 फीसदी सीटें इसी इलाके की हैं। यूपी के 28 जिले पूर्वांचल में आते हैं। जिनमें कुल 164 विधानसभा सीटें हैं। 2017 के चुनाव में पूर्वांचल की 164 सीटों में से बीजेपी ने 115 सीट पर कब्जा जमाया था। जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस ने 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थी। हालांकि पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। वह एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में एक का साथ छोड़कर दूसरे का साथ पकड़ता रहा है। यही वजह है कि बीजेपी 2022 के चुनाव में अपने गढ़ को मजबूत करने में जुट गई है।