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Monday, January 3, 2022

यूपी चुनाव 2022 : पूर्वांचल में क्यों फोकस कर रही है बीजेपी?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वांचल को लेकर हैं गंभीर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और जेवर एयरपोर्ट से पहले पूर्वांचल को मिली विकास की सौगात

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश को लगातार विकास की सौगात तो दे ही रहे हैं साथ ही योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी लगातार कर रहे हैं।



देखने में ऐसा लग रहा है जैसे पीएम नरेन्द्र मोदी ने ही उत्तर प्रदेश की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में थाम ली है। वहीं, देखने में ये भी आ रहा है कि पीएम का ज्यादा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित है। इसी फेहरिस्त में मोदी ने सिद्धार्थनगर और वारणसी को विकास की सौगात से भी नवाजा है।

जी हां, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसेवैसे राजनीतिक दलों ने अपने सियासी अभियान तेज कर दिए हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने यूपी चुनाव की कमान संभाल ली है। प्रधानमंत्री का अब पूरा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित हो चला है।

अगर अक्टूबर की ही बात की जाए, अक्टूबर में ही प्रधानमंत्री ने पूर्वांचल क्षेत्र का दो बार दौरा किया है। साथ ही क्षेत्र के विकास के लिए सौगात भी दी हैं। प्रधानमंत्री ने केन्द्र व राज्य सरकार की यहां उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की यहां के लोगों से अपील की है।


9 मेडिकल कॉलेज की सौगात

पीएम नरेन्द्र मोदी ने सिद्धार्थनगर से उत्तर प्रदेश को एक साथ 9 मेडिकल की सौगात दी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी चिकित्सा महाविद्यालय का लोकार्पण करने के साथ 2239 करोड़ रुपये की लागत से देवरिया, एटा, फतेहपुर, हरदोई, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर के नवनिर्मित मेडिकल कॉलेजों के राज्य स्वशासी मेजिकल कालेजों का वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

यूपी के लिए पूर्वांचल की जीत जरूरी

देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है तो यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है। इसी फॉर्मूले से लगातार दो लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली बीजेपी मिशन-2022 के लिए पूर्वांचल में पैठ बनाने की कोशिश में है। इसी के मद्देनजर पीएम मोदी का फिलहाल पूरा फोकस पूर्वांचल पर है। पीएम मोदी एक तरफ पूर्वांचल को मेडिकल कॉलेजों की सौगात दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल के विकास के लिए योजना भी तैयार करवाकर पूर्वांचल के लोगों को सौंपने की बात कह रहे हैं।

दरअसल, किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड के बाद से पश्चिम यूपी, तराई बेल्ट और अवध के इलाके में सरकार के खिलाफ माहौल गर्म है। वहीं, पूर्वांचल अभी भी बीजेपी का गढ़ माना जाता है। जिसकी सबसे बड़ी वजह पीएम नरेन्द्र मोदी का वाराणसी से सांसद होना है और गोरखपुर से सीएम योगी का होना है।

पूर्वांचल में राजभर ने बढ़ाई चुनौती

हालांकि, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर औऱ सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हाथ मिलाने के बाद बीजेपी के सामने अपने दुर्ग पूर्वांचल को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इतना ही नहीं बीजेपी को लोकसभा औऱ जिला पंचायत अध्यक्ष के  चुनाव में पूर्वांचल इलाके में ही झटका लगा था। इसीलिए बीजेपी लगातार पूर्वांचल के सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है।

यूपी में चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल में करीब 6 जनसभा रखी हैं। इन चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार की उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की लोगों से अपील करेंगे। इसकी शुरुआत करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर को भगवान बुद्ध की धरती कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का भी शुभारंभ किया और चुनावी जनसभाओं का एक तरह से आगाज भी कर दिया।

कुशीनगर में एयरपोर्ट के साथ-साथ पीएम मोदी 478.74 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की भी सौगात दी है। 116.21 करोड़ से तैयार 11 परियोजनाओं का लोकार्पण और 362.53 की लागत से मेडिकल कॉलेज सहित तीन परियोजनाओं का तोहफा पीएम मोदी ने पूर्वांचल को दिया है। इसके अलावा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर के खाद कारखाना मैदान में जनसभा भी अक्टूबर में ही की गयी। इस जनसभा के बाद खाद कारखाना व गोरखपुर एम्स का लोकार्पण भी किया जाना है।

 

बीजेपी का सियासी समीकरण

पूर्वांचल में बीजेपी ने अपने समीकरण को मजबूत बनाए रखने के लिए जातीय आधारित पार्टियों के साथ भी गठबंधन कर रखा है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ बीजेपी मिलकर इसबार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। बीजेपी के इन दोनों ही दलों का सियासी आधार पूर्वांचल के जिलों में है। अनुप्रिया पटेल की कुर्मी वोटों पर पकड़ है तो संजय निषाद का मल्लाह समुदाय पर। इसके अलावा बीजेपी की नजर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी पर भी है। जिनके साथ गठबंधन फिर से किये जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस तरह बीजेपी पूर्वांचल के सियासी रण को बीजेपी मजबूती के साथ जीतने की रणनीति तैयार कर रही है।

यूपी की 33 फीसदी सीटें पूर्वांचल में हैं

पूर्वांचल की जंग फतह करने के बाद ही यूपी की सत्ता पर कोई पार्टी काबिज हो सकती है। क्योंकि सूबे की 33 फीसदी सीटें इसी इलाके की हैं। यूपी के 28 जिले पूर्वांचल में आते हैं। जिनमें कुल 164 विधानसभा सीटें हैं। 2017 के चुनाव में पूर्वांचल की 164 सीटों में से बीजेपी ने 115 सीट पर कब्जा जमाया था। जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस ने 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थी। हालांकि पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। वह एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में एक का साथ छोड़कर दूसरे का साथ पकड़ता रहा है। यही वजह है कि बीजेपी 2022 के चुनाव में अपने गढ़ को मजबूत करने में जुट गई है।

मोदी का मिशन पूर्वांचल

पीएम मोदी ने अपने चुनावी अभियान के लिए एक बार फिर पूर्वांचल की धरती को ही चुना। इसके पहले पीएम ने 2014 – 2019 के लोकसभा और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत पूर्वांचल से ही की थी। मिशन – 2022 का आगाज भी पूर्वांचल में कुशीनगर को इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सौगात से किया गया और सिद्धार्थनगर और काशी का दौरा कर चुनावी माहौल बनाया गया।

बहरहाल, पीएम मोदी और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब पूरी तरह से चुनावी मोड में हैं। और राजनीति के जानकारों की माने तो बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसी भी हाल में अपने हाथ से छूटने नहीं देना चाहती। साथ ही बीजेपी को इस बात का भी अंदाजा है कि इसबार का उत्तर प्रदेश का चुनाव उतना भी आसान नहीं होगा और जीत का आंकड़ा भी शायद वो नहीं होगा जो पिछली विधानसभा चुनाव के समय में था। वहीं, सच ये भी है कि उत्तर प्रदेश में इस बार बीजेपी के साथ बसपा, सपा और कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी भी सत्ता में आने का सपना संजोय बैठी हैं और जोड़ तोड़ की राजनीति के साथ-साथ हर एक वो हथकंडा अपना रही हैं जिससे उन्हें उत्तर प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा सीटें मिल जाए। 

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मुस्लिम वोटों के लए उलेमाओं की शरण में सपा, अबु आजमी से अखिलेश यादव तक सक्रिय

मुस्लिम वोटों के दम पर ही मुलायम सिंह यादव तीन बार और अखिलेश यादव एक बार उत्तर प्रदेश में सत्ता की कमान संभाल चुके हैं। अब 2022 के यूपी चुनाव में मुसलमानों को सपा अपने साथ मजबूती से जोड़ने के लिए उलेमाओं का सहारा लेने की कवायद में जुट गयी है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में मुसलमानों की भूमिका अहम मानी जाती है। यह बात समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बेहतर भला कौन समझ सकता है।

मुस्लिम उलेमाओं से मिलकर वोटर्स को साधने की कोशिश में सपा प्रमुख

सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस ईद-मिलादुन्नबी के मौके पर लखनऊ के ऐशबाग ईदगाह पहुंचे। यहां उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद राशीद फरंगी महली से मिलकर मोहम्मद साहब के जन्मदिन की बधाई दी। वहीं, सपा के मुस्लिम नेता व विधायक अबु आसिम आजमी ने भी लखनऊ में मुस्लिमों के धार्मिक संगठन सुन्नी मजलिस-ए-अमल के अध्यक्ष मौलान वली फारूकी सहित तमाम उलेमाओं के साथ मुलाकात औऱ बैठक की। इस बैठक की फोटो भी आजमी ने खुद अपने सोशल मीडिया पर शेयर की थी।

 

मुस्लिमों के बीच ओवैसी की सक्रियता

उत्तर प्रदेश में इस बार के चुनाव में बीजेपी के हार्ड हिन्दुत्व के सामने अखिलेश यादव खुलकर मुस्लिम कार्ड खेलने से अभी तक बच रहे थे। लेकिन, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में बढ़ती सक्रियता और कांग्रेस की मुस्लिम वोटों पर नजर को देखते हुए सपा के सामने अपने कोर वोट बैंक को साधे रखने की चुनौती है। ऐसे में अखिलेश यादव के बाद सपा नेता अबु आसिम आजमी की सूबे के उलेमाओं के साथ हुई मुलाकात को 2022 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, ओवैसी ने सूबे की 100 सीटों पर कैंडिडेट उतारने का ऐलान किया है। पिछले 8 महीनों से ओवैसी यूपी का लगातार दौरा कर रहे हैं और उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाके की सीटों को टारगेट किया है। ओवैसी मुस्लिम लीडरशिप को स्थापित करने और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सबसे बड़ा सियासी हथियार बना रहे हैं। मुस्लिम युवाओं के बीच ओवैसी का सियासी ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है तो कांग्रेस भी मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में लाने के तमाम जतन कर रही है। उलेमाओं से लेकर मस्जिदों तक सहारा ले रही है।

 

आजम की जगह आजमी मुस्लिम चेहरा

वही, सपा के कद्दावर मुस्लिम चेहरा व रामपुर से सांसद आजम खान के जेल में बंद होने के चलते पार्टी के पास कोई दूसरा बड़ा नेता नहीं है। ऐसे में अखिलेश यादव ने महाराष्ट्र के मुंबई से विधायक अबु आसिम आजमी को यूपी के लिए मुसलमानों को साधे रखने का जिम्मा सौंपा है। आजमी सूबे में अलग-अलग जिलों का दौरा करके मुस्लिमों को सपा से जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने सुन्नी मुजलिस-ए-अमल के अध्यक्ष मौलाना वली फारूकी के साथ बैठक की है।

 

यूपी में 20 फीसदी मुस्लिम वोटर अहम

उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। सूबे की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम अपना असर रखते हैं। इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है। 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान 30 फीसदी से ज्यादा है। सूबे की करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं जबकि करीब 107 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं। इनमें ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश की है।

 

क्या मुस्लिमों की पहली पसंद बनेगी सपा

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बाच सपा की अच्छी पैठ मानी जाती है। सूबे में 20 फीसदी मुस्लिम औऱ 10 फीसदी यादव वोटरों के सहारे सपा के एम-वाई समीकरण के दम पर मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव यूपी की सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं।

1990 का अयोध्या गोलीकांड औऱ उसके बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस के चलते सूबे में जो माहौल बदला उसमें मुस्लिम वोटों का सबसे ज्यादा फायदा मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा को मिला। इसी मुस्लिम वोटों के दम पर मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक सूबे के मुख्यमंत्री बने।

 


यूपी के सियासी माहौल में अखिलेश यादव मुस्लिम और यादव वोटों को अपना कोर वोटबैंक मानकर चल रहे हैं। 2022 में सत्ता में वापसी के लिए मुस्लिम-यादव वोटबैंक में अन्य ओबीसी के वोटों के कुछ हिस्से को जोड़ने की कोशिश में अखिलेश यादव जुटे हैं। बीजेपी के पास सत्ता होने के चलते जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें अभी तक मुस्लिम के बीच सपा सबसे पहली पंसद मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस से लेकर बसा और मुस्लिम पार्टियां यादव मुस्लिम समीकरण को तोड़ने की कवायद में जुटी है। इसीलिए सपा भी मुस्लिमों के बीच अपनी पैठ कायम रखने के लिए उलेमाओं का सहारा ले रही है।

UP Election 2022: '22 के रण' से '24 की पिच' की तैयारी कर रही है भाजपा, काशी विश्वनाथ, जेवर पूर्वांचल से क्या सधेगा निशाना

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणभेरी अभी तक बजी नहीं है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में बीजेपी पूरे चुनावी मोड में है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार उत्तर प्रदेश में रैली, उद्घाटन, शिलान्यास और योजनाओं की सौगात दे रहे हैं। वहीं, पूर्वांचल में खाद कारखाना, मेडिकल कॉलेज और तकरीबन 3000 करोड़ की योजनाओं की घोषणा करने के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में जेवर एयरपोर्ट, फिल्मसिटी की सौगात सैंपी।


अब प्रधानमंत्री ने काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के पहले चरण के पूरे होने के बाद उद्घाटन किया है। जिसके बाद यह साफ देखने को मिल रहा है कि बीजेपी अब उत्तर प्रदेश को लेकर पूरे चुनावी मोड में है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर काफी गंभीर हैं।

वहीं, अब जिन परियोजनाओं का हो रहा शिलान्यास, उनका 2024 से पहले उद्घाटन होगा। केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं में तेजी दिखेगी।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि चुनाव तो 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का है लेकिन इसके बहाने भाजपा 2024 की पिच भी तैयार कर रही है। इस पिच पर विकास का उछाल होगा तो आस्था के नाम पर स्विंग भी खूब पड़ेंगी। इसके लिए टीम भाजपा ने अपनी एक कोर कमेटी का गठन भी कर दिया है। जो अभी से 2024 में चुनावी रोड मैप तैयार करने लगा है। इस कमेटी के सदस्यों का काम उन योजनाओं पर नजर रखने के साथ उनको 2024 चुनाव से पहले तक पूरा करवाने का भी है जिनका प्रधानमंत्री शिलान्यास कर रहे हैं या राज्य और केंद्र सरकारें जिन बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने वाली हैं। 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों का माहौल बनाने की शुरुआत तो भारतीय जनता पार्टी ने विकास के मॉडल के साथ की है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर से बने चुनावी माहौल से अब तक उत्तर प्रदेश में जितने दौरे किए हैं वह सभी विकास के नाम पर शुरू हुए प्रोजेक्ट के उद्घाटन और शिलान्यास से ही हुए हैं। इसमें कुछ प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ तो कुछ का उद्घाटन भी किया गया। 

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जिन प्रोजेक्ट का उद्घाटन हुआ उसका निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनाव में फायदा मिलेगा। वह कहते हैं कि जिन प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ है उनमें ज्यादातर का उद्घाटन 2024 से पहले हो जाएगा। ऐसे में एक बात तो बिल्कुल साफ है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में विकास के नाम पर रखी गई आधारशिलाओं से 2024 का चुनाव भी सधेगा। 




कमेटी के हर सदस्य की जिम्मेदारियां तय

भाजपा केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पार्टी ने अपने तमाम राजनैतिक और आस्था के मुद्दों के साथ विकास को ही तरजीह दी है। भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जिन प्रोजेक्ट का शिलान्यास प्रधानमंत्री मोदी ने किया है उसकी गति पर नजर रखने के लिए पार्टी ने एक कोर कमेटी का गठन भी किया है। इस कोर कमेटी में केंद्रीय मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों के साथ-साथ राज्य स्तर के पार्टी पदाधिकारी भी शामिल हैं। 

सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी की एक और कमेटी इन प्रोजेक्ट को न सिर्फ मॉनिटर करेगी बल्कि इस पर लगातार नजर भी रखेगी। कोर कमेटी से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि जो प्रोजेक्ट 2024 तक शुरू होने हैं उनको और तेज गति देने के लिए कमेटी संबंधित मंत्रालय और अधिकारियों के संपर्क में भी रहेगी, ताकि किसी भी तरीके की कोई लापरवाही न हो। ऐसे सभी सदस्यों के पास किसी न किसी तरीके की जिम्मेदारियां हैं जो समय-समय पर पार्टी आलाकमान को अपना फीडबैक भी देती रहेंगी।

2024 में होने वाले लोकसभा के चुनावों से पहले कई अहम प्रोजेक्ट सिरे चढ़ चुके होंगे या चढ़ने वाले होंगे। बनाई गई कोर कमेटी के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा। इसे लोकसभा या विधानसभा के चुनावों से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यह जब पूरे होंगे तो निश्चित तौर पर किसी न किसी चुनाव के दौरान उद्घाटन और शिलान्यास होते रहेंगे। हालांकि सूत्रों का कहना है कि जिस तरीके से बीते कुछ महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया है वह 2024 से पहले सिरे चढ़ने शुरू हो जाएंगे। 

हर प्रोजेक्ट की टाइम लाइन तय 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेवर एयरपोर्ट का शिलान्यास किया था। इस एयरपोर्ट का रनवे 2023 में शुरू होना है। इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 दिसंबर को गंगा एक्सप्रेस वे का शिलान्यास कर दिया। इस प्रोजेक्ट को भी 2024 से पहले शुरू कर दिया जाएगा। इसके अलावा बुंदेलखंड में बनने वाले बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का भी अगले महीने लोकार्पण किया जाएगा और 2024 से पहले एक बड़े फेज को न सिर्फ शुरू किया जाएगा बल्कि कनेक्टिंग एक्सप्रेस वे से जोड़ भी दिया जाएगा। 

उत्तर प्रदेश में ही अगले 3 साल में कई और डोमेस्टिक एयरपोर्ट न सिर्फ बनाए जाएंगे बल्कि उनको भी शुरू करने की योजना है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मेट्रो को शुरू किया जाना है जिसकी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक 2024 से पहले कई बड़े शहरों में मेट्रो की शुरुआत हो जाएगी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को भी पूरी तरह से शुरू कर दिया जाएगा। अगले 3 सालों के भीतर उत्तर प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल भी इसी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में बननी शुरू हो जाएगी। 

सूत्रों के मुताबिक सिर्फ यही नहीं बल्कि पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के बाद केंद्र सरकार की योजना है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश से बिहार होते हुए पूरे नॉर्थ ईस्ट को एक बड़े एक्सप्रेस से कनेक्ट किया जाए। इसके अलावा तय योजना के मुताबिक 2023 में ही राम मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी विकास और आस्था के इस पूरे मॉडल के साथ 2024 की पिच अभी से तैयार करने लगी है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वांचल को लेकर हैं गंभीर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और जेवर एयरपोर्ट से पहले पूर्वांचल को मिली विकास की सौगात

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश को लगातार विकास की सौगात तो दे ही रहे हैं साथ ही योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी लगातार कर रहे हैं।

देखने में ऐसा लग रहा है जैसे पीएम नरेन्द्र मोदी ने ही उत्तर प्रदेश की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में थाम ली है। वहीं, देखने में ये भी आ रहा है कि पीएम का ज्यादा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित है। इसी फेहरिस्त में मोदी ने सिद्धार्थनगर और वारणसी को विकास की सौगात से भी नवाजा है।

जी हां, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसेवैसे राजनीतिक दलों ने अपने सियासी अभियान तेज कर दिए हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने यूपी चुनाव की कमान संभाल ली है। प्रधानमंत्री का अब पूरा फोकस पूर्वांचल पर केन्द्रित हो चला है।

अगर अक्टूबर की ही बात की जाए, अक्टूबर में ही प्रधानमंत्री ने पूर्वांचल क्षेत्र का दो बार दौरा किया है। साथ ही क्षेत्र के विकास के लिए सौगात भी दी हैं। प्रधानमंत्री ने केन्द्र व राज्य सरकार की यहां उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की यहां के लोगों से अपील की है।

 


9 मेडिकल कॉलेज की सौगात

पीएम नरेन्द्र मोदी ने सिद्धार्थनगर से उत्तर प्रदेश को एक साथ 9 मेडिकल की सौगात दी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी चिकित्सा महाविद्यालय का लोकार्पण करने के साथ 2239 करोड़ रुपये की लागत से देवरिया, एटा, फतेहपुर, हरदोई, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर के नवनिर्मित मेडिकल कॉलेजों के राज्य स्वशासी मेजिकल कालेजों का वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

यूपी के लिए पूर्वांचल की जीत जरूरी

देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है तो यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है। इसी फॉर्मूले से लगातार दो लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली बीजेपी मिशन-2022 के लिए पूर्वांचल में पैठ बनाने की कोशिश में है। इसी के मद्देनजर पीएम मोदी का फिलहाल पूरा फोकस पूर्वांचल पर है। पीएम मोदी एक तरफ पूर्वांचल को मेडिकल कॉलेजों की सौगात दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल के विकास के लिए योजना भी तैयार करवाकर पूर्वांचल के लोगों को सौंपने की बात कह रहे हैं।

दरअसल, किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड के बाद से पश्चिम यूपी, तराई बेल्ट और अवध के इलाके में सरकार के खिलाफ माहौल गर्म है। वहीं, पूर्वांचल अभी भी बीजेपी का गढ़ माना जाता है। जिसकी सबसे बड़ी वजह पीएम नरेन्द्र मोदी का वाराणसी से सांसद होना है और गोरखपुर से सीएम योगी का होना है।

पूर्वांचल में राजभर ने बढ़ाई चुनौती

हालांकि, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर औऱ सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हाथ मिलाने के बाद बीजेपी के सामने अपने दुर्ग पूर्वांचल को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इतना ही नहीं बीजेपी को लोकसभा औऱ जिला पंचायत अध्यक्ष के  चुनाव में पूर्वांचल इलाके में ही झटका लगा था। इसीलिए बीजेपी लगातार पूर्वांचल के सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है।

यूपी में चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल में करीब 6 जनसभा रखी हैं। इन चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार की उपलब्धियां गिनाकर मिशन 2022 को सफल बनाने की लोगों से अपील करेंगे। इसकी शुरुआत करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर को भगवान बुद्ध की धरती कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का भी शुभारंभ किया और चुनावी जनसभाओं का एक तरह से आगाज भी कर दिया।

कुशीनगर में एयरपोर्ट के साथ-साथ पीएम मोदी 478.74 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की भी सौगात दी है। 116.21 करोड़ से तैयार 11 परियोजनाओं का लोकार्पण और 362.53 की लागत से मेडिकल कॉलेज सहित तीन परियोजनाओं का तोहफा पीएम मोदी ने पूर्वांचल को दिया है। इसके अलावा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर के खाद कारखाना मैदान में जनसभा भी अक्टूबर में ही की गयी। इस जनसभा के बाद खाद कारखाना व गोरखपुर एम्स का लोकार्पण भी किया जाना है।

बीजेपी का सियासी समीकरण

पूर्वांचल में बीजेपी ने अपने समीकरण को मजबूत बनाए रखने के लिए जातीय आधारित पार्टियों के साथ भी गठबंधन कर रखा है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ बीजेपी मिलकर इसबार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। बीजेपी के इन दोनों ही दलों का सियासी आधार पूर्वांचल के जिलों में है। अनुप्रिया पटेल की कुर्मी वोटों पर पकड़ है तो संजय निषाद का मल्लाह समुदाय पर। इसके अलावा बीजेपी की नजर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी पर भी है। जिनके साथ गठबंधन फिर से किये जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस तरह बीजेपी पूर्वांचल के सियासी रण को बीजेपी मजबूती के साथ जीतने की रणनीति तैयार कर रही है।

यूपी की 33 फीसदी सीटें पूर्वांचल में हैं

पूर्वांचल की जंग फतह करने के बाद ही यूपी की सत्ता पर कोई पार्टी काबिज हो सकती है। क्योंकि सूबे की 33 फीसदी सीटें इसी इलाके की हैं। यूपी के 28 जिले पूर्वांचल में आते हैं। जिनमें कुल 164 विधानसभा सीटें हैं। 2017 के चुनाव में पूर्वांचल की 164 सीटों में से बीजेपी ने 115 सीट पर कब्जा जमाया था। जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस ने 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थी। हालांकि पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। वह एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में एक का साथ छोड़कर दूसरे का साथ पकड़ता रहा है। यही वजह है कि बीजेपी 2022 के चुनाव में अपने गढ़ को मजबूत करने में जुट गई है।

Wednesday, November 24, 2021

किस तरह वोट करता है उत्तर प्रदेश का दलित

यूपी में दलितों की राजनीति किस तरीके से बदल रही है और उसका प्रभाव अगले चुनाव में कैसा होने वाला है? आइए जानते हैं। 

राजनीति में हमेशा से नारों का अपना महत्व रहा है। कभी कांशीराम ने नारा दिया, 'ठाकुर बाभन बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर। तिलक, तराजू और तलवारइनको मारो जूते चार' साल 2007 में उनकी शिष्या मायावती इसके बिल्कुल विपरित नारा देती हैं, 'पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा', 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है'  एक साल 2007 का समय था और एक आज का समय है, मायावती ने इसके बाद सिर्फ नीचे की ओर ही सफर किया है। साल 2021 में मायावती एक बार फिर ब्राह्मणों की ओर रुख किया है। ब्राह्मण सम्मेलन बुलाया जा रहा है। सतीश मिश्रा ने एक बार फिर से मोर्चा संभाल लिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि जिस दलित को अपना कोर वोट मानकर बसपा ये प्रयोग कर रही है, क्या वह उसके साथ हैं? यूपी में दलितों की राजनीति किस तरीके से बदल रही है और उसका प्रभाव अगले चुनाव में कैसा होने वाला है? आइए जानते हैं।


जगजीवन राम नहीं बने प्रधानमंत्री, कांशीराम नेता बन गए

नारों की बात करें, तो एक और नारा भारतीय राजनीति में खूब चर्चित हुआ था। आपातकाल के दौरान कहा गया, 'जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जाएगी इंदिरा गांधी' जगजीवन राम ही वो नेता हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित पहचान को एक अलग मुकाम दिया। जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्री नारायण, जो अपनी हालिया किताब 'रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व' को लेकर चर्चा में हैं, बताते हैं कि दलित राजनीति में चेतना काम 1930 के दौर में स्वामी अच्युतानंद के समय में ही शुरू हो गया था। शुरुआत में दलितों की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस हुआ करती थी। हालांकि, कांशीराम जैसे नेता अपनी कोशिश कर रहे थे। इसके अलावा, आगरा बेल्ट में कुछ नेता थे, जो दलित की राजनीति कर रहे थे।

दलित राजनीति को समझने वाले एक्सपर्ट बताते हैं कि असली परिवर्तन जगजीवन राम के प्रधानमंत्री ना बनने पर हुआ। दरअलस, 1977 में जब जनता पार्टी जीत कर आई, तो तीन लोग प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई। जब मोरारजी के नाम पर मुहर लगी

, तो दलित समुदाय के अंदर रोष आ गया। उस समय को याद करते हुए आज भी दलित रो उठते हैं। उस दिन कई घरों में खाना नहीं बना था। इस नाराजगी को मोबलाइज कर कांशीराम ने एक बड़ा वोट बैंक खड़ा कर लिया, जिसने आगे चलकर मायावती के मुख्यमंत्री बनने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।

कितना बड़ा है दलित वोट बैंक?

ओबीसी समुदाय के बाद दलित वोट की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में 42-45 फीसदी ओबीसी हैं, उसके बाद 20-21 फीसदी संख्या दलितों की है। 20-21 फीसदी में सबसे बड़ी संख्या जाटव की है, जो करीब 54 फीसदी हैं। इसके अलावा दलितों की 66 उपजातियां हैं, जिनमें 55 ऐसी उपजातियां हैं, जिनका संख्या बल ज्यादा नहीं हैं।  इसमें मुसहर, बसोर, सपेरा और रंगरेज शामिल हैं। 20-21 फीसदी को दो भागों में बांट दें, तो 14 फीसदी जाटव हैं और बाकियों की संख्या 8 फीसदी है।

जाटव के अलाव अन्य जो उपजातियां हैं, उनकी संख्या 45-46 फीसदी के करीब है। इनमें पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं।  कुल मिलाकर पूरे उत्तर प्रदेश में 42 ऐसे जिलें हैं, जहां दलितों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है।

 यूपी के दलित नेता

उत्तर प्रदेश में दलित नेताओं की बात की जाए, तो बसपा प्रमुख सबसे बड़ी नेता के तौर पर सामने आती हैं। वह उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। साथ ही साथ चार बार वह सत्ता का सफर तय कर चुकी हैं। इसके अलावा किसी भी पार्टी के पास इतना बड़ा चेहरा नहीं है। भाजपा के पास सुरेश पासी, रमापति शास्त्री , गुलाबो देवी और कौशल किशोर जैसे नेता हैं। इसके अलावा विनोद सोनकर हैं, जो भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के पास आलोक प्रसाद और पीएल पुनिया जैसे नेता हैं। वहीं, चंद्रशेखर आजाद भी कुछ समय पहले से काफी चर्चा में आए हैं।

किसे वोट करते हैं दलित?

उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा प्रयोग साल 2007 में मायावती ने किया। सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से उन्होंने विधानसभा में 3043 फीसदी वोटों के साथ 206 सीट हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 2009 के लोकसभा चुनावों में भी बसपा 274 फीसदी वोट के साथ 21 सीटें जीतने में सफल रही। लेकिन साल 2012 में सोशल इंजीनियरिंग की चमक कमजोर पड़ गई। वोट गिरते हुए 259 फीसदी पर पहुंच गए और बसपा 206 से गिरकर 80 पर पहुंच गई। सबसे बड़ा झटका 2014 के लोकसभा चुनावों में लगा, जब बसपा को सिर्फ 20 फीसदी वोट मिले और खाता भी नहीं खुला। 2017 में 23 फीसदी वोट के साथ बसपा को सिर्फ 19 सीटें मिलीं, जिनमें बगावत के बाद अब सिर्फ 7 विधायक बचे हैं।

 

चुनावी रणनीतिकार और पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, 'अगर आप आंकड़ों को देखें, तो भाजपा इस वक्त देश की सबसे बड़ी दलित पार्टी है। लड़ाई सिर्फ उत्तर प्रदेश में है।' सीएसडीएस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 24 फीसदी दलितों का वोट हासिल हुआ। वहीं, कांग्रेस को 185 फीसदी, बसपा को 139 फीसदी वोट मिले थे।

अगर आप लंबे समय से दलितों का पूरे भारत में वोटिंग पैटर्न देखें, तो यह कांग्रेस से शिफ्ट हो कर भाजपा की ओर चली गई है। सीएसडीएस की रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1971 में भाजपा को 10 फीसदी दलित वोट मिलता था, जो साल 2014 तक 24 फीसदी पहुंच गया। बसपा को साल 2004 में सबसे अधिक 24 फीसदी वोट मिले थे, जो 2014 में 14 फीसदी हो जाता है। जबकि कांग्रेस 71 में 46 फीसदी दलित वोट करते थे, 2014 में गिरकर 19 फीसदी हो गया।

गैर जाटव ने पलटा गेम

एक प्रसंग यूपी की राजनीति में दलित परिपेक्ष्य को बड़ा साफ करता है। दरअसल, 2006 में मायवाती से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? मायवती ने जवाब दिया- 'मेरा उत्तराधिकारी जाटव ही होगा, उनमें से एक जिन्होंने मनुवादियों के हाथों सबसे ज्यादा जुल्म सहे हैं।कहा जाता है कि यहीं से भाजपा ने गैर जाटव का एक राग पकड़ा, जो अब सुर में बदल गया है।

दलित राजनीति को समझने वाले कहते हैं कि साल 2012 में जब मायावती विधानसभा का चुनाव हारीं, तो उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने साथ नहीं दिया। लेकिन जब आप आंकड़ें देखेंगे, तो साल 2012 में ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों ने बसपा का साथ दिया, लेकिन दलित उनसे छिटक गए। आंकड़ों से देखें, तो मामला बिल्कुल साफ हो जाता है। 2014 में गैर जाटव का 61 फीसदी वोट भाजपा को मिला। वहीं, 11 फीसदी जाटव ने भी वोट किया। ठीक इसके उलट बसपा को 68 फीसदी जाटव और 11 फीसदी गैर जाटव ने वोट दिया है।

यही नहीं, Axix My India डेटा एक और चौंकाने वाले विषय की ओर इशारा करता है। साल 2019 में करीब 60 फीसदी गैर जाटव के साथ 21 फीसदी जाटव ने भी भाजपा को वोट दिया।

आरक्षित सीट का खेल

दलित को प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था है। सीट की स्थिति की बात करें, तो यूपी विधानसभा की 403 सीटों में से इस वक्त 86 सीट आरक्षित हैं। इन सीटों पर जिसका कब्जा रहा, वह यूपी की सत्ता पा गया।

साल 2017 में 85 रिजर्व विधानसभा सीट में भाजपा ने

65 गैर जाटव को टिकट दिया था। भाजपा ने 76 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की। जबकि बसपा के खाते में सिर्फ 2 गईं। सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) 3 और अपना दल ने 2 सीटें जीतीं। 

2012 के विधानसभा चुनाव देखे जाएं, तो सपा ने 58, बसपा ने 15 और भाजपा ने सिर्फ 3 सीटों पर जीत हासिल की थी।

वहीं, 2007 में बसपा 62, सपा 13, भाजपा 7 और कांग्रेस ने 5 सीटों पर जीत हासिल की थी।

गौरतलब है कि  साल 2017 में भाजपा, 2012 में सपा और 2007 में बसपा ने यूपी की राजनीति में परचम लहराया था।

 

हालांकि, अगर ये आंकड़ें सीटों के हिसाब से देखें, तो 9 ऐसी सीटें रही हैं, जहां भाजपा हमेशा से मजबूत रही है। वहीं, सपा 3 सीटों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रही है। शाहजहांपुर में कांग्रेस,

तो मिश्रिख बसपा का गढ़ रहा है। हरदोई और लालगंज में हमेशा मुकाबला कांटे का रहा है।

भाजपा के साथ क्यों आया गैर जाटव?

साल 2007 से पहले लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में स्थिर सरकारें नहीं रहीं। इसकी बड़ी वजह थी जाति त्रिकोण। सपा के पास यादव, मुस्लिम और अन्य जातियों के कुछ वोट थे

, जो 25 फीसदी के करीब थे। भाजपा के पास सवर्ण और कुछ ओबीसी वोट थे, जो 20 फीसदी के करीब थे। वहीं, मायावती की बसपा की भी यही स्थिति थी। दलितों के वोट के साथ वो भी 20 प्रतिशत के करीब पहुंचने में सफल हो जाती थीं। गेम 2007 में पलटा, जब मायावती ने बहुजन से सर्वजन की राजनीति शुरू की। ऐसे में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम का एक कॉम्बिनेशन बना, जिससे बसपा को 30.43 मत हासिल हुआ। यहीं से गैर जाटव का मामला शुरू हुआ। क्योंकि इस सरकार में दलितों से ज्यादा ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व मिला।

दलित सुमदाय का अध्ययन करने वाले प्रोफेसर बद्री नारायण बताते हैं कि यह एक लंबा प्रोसेस है। जो आज वोट दिख रहा है, वो आरएसएस के कार्यों की लंबी प्रक्रिया है। दरअसल, आरएसएस में जाति वाला कोई फैक्टर नहीं है। ऐसे में जब वह गैर जाटव यानी कम संख्या वाली दलित जातियों के पास पहुंचे, तो उनके अंदर एक किस्म की छटपटाहट थी। उनको प्रतिनिधित्व देना था। आरएसएस ने यह फीडबैक भाजपा को दिया होगा

, जिस पर काम किया गया। यह कोई एक चुनाव का परिणाम नहीं है। धीरे-धीरे गैर जाटव की छोटी-छोटी जातियों को इकट्ठा करके एक बड़ा वोट बैंक बनाया गया।

उन्होंने अपनी किताब 'फैलिनेटिंग हिंदुत्व: सैफरन पॉलिटिक्स एंड दलित मोबिलाइजेशन' में भी इस बात का जिक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में आरएसएस के कई कार्यक्रमों का जिक्र किया है, जिसके जरिए उन्होंने उन जातियों को अप्रोच किया, जिन्हें ना आवाज मिली, ना पहचान मिली और ना ही सत्ता। धीरे-धीरे आरएसएस ने भाजपा का काम आसान कर दिया।

 

अगर आप पासी जाति का उदाहरण लें। तो इस वक्त भाजपा उत्तर प्रदेश में उदा देवी की मूर्तियां लगवा रही हैं, जो इस समुदाय के लिए काफी सम्मान वाली बात है। इसके अलावा, इस वक्त भाजपा के 23 विधायक और 6 सांसद इस समुदाय से आते हैं। कौशल किशोर को मोदी मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया है। योगी कैबिनेट में सुरेश पासी इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। साल 2017 में अवध-पूर्वांचल की पासी बहुल सीटों जैसे बाराबंकी की जैदपुर और हैदरगढ़, सीतापुर की मिश्रिख,

हरदोई की बालामऊ और गोपामऊ सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को मिली जीत इशारा करती है कि पासी बिरादरी में भाजपा ने अपनी पैठ बना ली है।

मायवाती हैं बड़ा चेहरा, फिर भाजपा बिना नेता कैसे लड़ रही है?

अगर उत्तर प्रदेश में दलितों के बड़े नेताओं की बात की जाए, तो मायावती के आगे कोई नहीं टिकता। अगर भाजपा को देखें, तो ऐसा कोई दलित चेहरा नहीं है। इस मामले में बद्री नारायण कहते हैं कि प्रतिनिधित्व के लिए मंत्री या मुख्यमंत्री होना जरूरी नहीं है। ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और पार्टी में पद देकर भी इसे साधा जा सकता है। फिलहाल, भाजपा यही कर रही है। उसे ओबीसी की तरह दलित नेताओं को कल्टिवेट करने की जरूरत है।

वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि भाजपा का फोकस मूलतः ओबीसी पॉलिटिक्स पर है। यूपी में ओबीसी और दलित दो ध्रुव हैं। जहां ओबीसी हैं, वहां दलित नहीं जाएंगे। बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ दलित नहीं जाएंगे। वहीं

भाजपा के पास ओबीसी की नाराजगी झेलने की हिम्मत भी नहीं है। ऐसे में यहां भाजपा के लिए मुश्किलें हैं।

हालांकि, एक्सपर्ट इस बात से अलग विचार रखते हैं। वे कहते हैं कि बसपा लगातार तीन चुनाव हार चुकी है। गैर जाटव पहले ही भाजपा के साथ हैं। डाटा भी देखें, तो जाटव का झुकाव भाजपा की ओर दिखता है। अगर चुनाव दो तरफा होता है, यानी भाजपा बनाम सपा, तो जाटव भी भाजपा की ओर जा सकते हैं। क्योंकि कोई भी समुदाय पावर चाहता है, जाटव को यह उम्मीद मायावती के साथ नहीं दिख रही है। वहीं, यूपी में ओबीसी खासकर यादव बनाम दलित का नरेटिव रहा है। ऐसे में वह भाजपा में अपनी जगह तलाश सकते हैं। हालांकि, यह चुनाव के बाद ही पता चलेगा।


क्या चंद्रशेखर आजाद बनेंगे मायावती के विकल्प या होगी बसपा की वापसी?

इस वक्त दलित राजनीति में मायवाती के अलावा चंद्रशेखर आजाद की भी पार्टी दिख रही है। आजाद की पहचान अग्रेसिव राजनीति की रही है। राजनीति को समझने वालों का कहना है कि चेहरा होना और चुनाव में परफॉर्मेंस करना दोनों अलग चीजें हैं। आजाद के पास कोई नरेटिव नहीं है। उन्हें पता ही नहीं है कि वो क्या कर रहे हैं। अगर कांशीराम को देखें, तो वह मंच से पहले कई जातियों के नाम लेते थे, फिर भाई का संबोधन करते थे। उनके पास एक नरेटिव था। आजाद के पास सिर्फ जाटव राजनीति ही दिखती है। फिलहाल, वह एनजीओ जैसा काम कर रहे हैं। इससे कुछ खास फायदा होता नहीं दिख रहा है।

वहीं, एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि आजाद के पास पोटेंशियल है। लेकिन उन्हें अभी बहुजन का पूरा समर्थन हासिल नहीं है। ना ही वह कुछ ऐसा नरेटिव बनाते दिख रहे हैं, जो चुनाव को पलट सके। अगर वह 3 फीसदी भी मत हासिल करते हैं, तो बड़ी बात होगी।

मायावती की वापसी को लेकर एक्सपर्ट कहते हैं कि ब्राह्मण सम्मेलन करने से वोट तो नहीं मिल जाएगा। भले ही ये कहा जा रहा है कि ब्राह्मण भाजपा से नाराज हैं, लेकिन अभी उन्हें कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। वहीं, मायावती का भाजपा के बी टीम वाला प्रोजेक्शन भी उनको नुकसान पहुंचा रहा है।


 

बहरहाल, मायवाती एक बार ब्राह्मण का प्रयोग कर चुकी हैं। फिर सम्मेलन कर रही हैं, लेकिन इससे ब्राह्मण वोट उन्हें नहीं मिल जाएगा। भाजपा सरकार से ब्राह्मण नाराज हैं। ऐसे में ब्राह्मण कहां जाएगा। नाराजगी में कई बार समुदाय बदले की भावना से भी रिएक्ट करता है। अगर ब्राह्मण देखेगा कि कहीं राजपूत कैंडिडेट खड़ा है और उसकी लड़ाई समाजवादी पार्टी से है, तो वहां बाह्मण सपा के साथ चला जाएगा। वहीं, जहां बसपा से टक्कर होगी, वहां बसपा को फायदा मिलेगा। जहां कांग्रेस से सीधी टक्कर होगी, वहां कांग्रेस के साथ जाएगा।  

अब देखना ये दिलचस्प होगा कि आने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में दलित बसपा को वोट करता है या नहीं। और देखना ये भी दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश में 2022 में किस पार्टी की सरकार सत्ता पर कब्जा जमाती है।