Tuesday, September 17, 2013

दिल्ली का किंग कौन ?



दिल्ली क सत्ता पर पिछले 15 साल से काबिज शीला फिर दिल्ली की किंग बनेंगी या फिर केजरीवाल की झाड़ू शीला के पंजे को मात देगी। ये सवाल दिल्ली के उमस भरे माहौल में इन दिनों खासी गर्मी पैदा कर रहा है। आम लोगों का कहना है की दिल्ली में पिछले 15 साल में कई बेहद महत्वपूर्ण काम हुए हैं। जिनमें डीटीसी बसों का कायाकल्प और मेट्रो का जाल है। दिल्ली के आम आदमी की यातायात की समस्या लगभग खत्म हुई है। लेकिन बात यातायात तक ही नहीं है। दिल्ली में बिजली, पानी महंगा हुआ है। रहना सहन और जीवन यापन भी कठिन हो रहा है। कुल मिलाकार दिल्ली के लोग इन दिनों इस मारीचिका में फंसे हैं की वो झाड़ू का साथ दे या पंजा मजबूत करें या फिर कमल खिलाएं।

केजरीवाल की बढ़ती लोकप्रियता घटता कद !
एक ताजा सर्वे के मुताबिक अरविंद केजरीवाल की पार्टी बीजेपी के 24 फीसदी वोट खा रही है और कांग्रेस के 22 फीसदी। इस तरह से केजरीवाल एक मजबूत दावेदार के रूप में खड़े नजर आते हैं। लेकिन केजरीवाल के चुनावी प्रचार और उम्मीदवारों पर नजर डाली जाए तो उनका कद छोटा नजर आता है। वो ऑटो के पीछे लिखते हैं की ‘इस बार भी अगर शीला को वोट दिया तो दिल्ली में होते रहेंगे बलात्कार’। दिल्ली में शीला की सरकार में अपराध बढ़ा है। केजरीवाल मुद्दा उठाते तो नजर आते हैं लेकिन कोई सशक्त हल देते नजर नहीं आते और वहीं उनके उम्मीदवार भी कमजोर नजर आते हैं। क्योंकि उनकी पार्टी में ज्यादातर वो लोग हैं जो राजनीति में नए हैं।

खिल सकता है दिल्ली में कमल!
हाल ही में बदरपुर विधानसभा क्षेत्र से रामसिंह बिधुड़ी ने भाजपा का दामन थामा है। जिससे दिल्ली में बीजेपी का गुर्जर वोट मजबूत होता नजर आता है। दिल्ली में सात लोकसभा की सीटों पर कम से कम चार सीटों पर गुर्जर वोट्स सत्ता का समीकरण तय करते हैं। साथ ही दिल्ली की 70 सीटों में से 40 पर गुर्जर नेताओं का दवदवा है। इस तरह से रमेश बिधुड़ी के बाद रामसिंह बिधुड़ी भाजपा को गुर्जर वोट से गुलजार कर सकते हैं। वहीं पुरानी दिल्ली में विजय गोयल और साउथ दिल्ली में विजय जौली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस तरह से अब दिल्ली की 70 सीटों में से भाजपा को 32 सीटें मिल सकती हैं जो पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी सीटों से चार कम है।

हाशिए पर शीला सरकार ?
15 सालों तक शासन करने वाली शीला दीक्षित लोकप्रियता की रेस में तीसरे नंबर पर हैं। 26 फीसदी वोटरों का कहना है कि बीजेपी के अध्यक्ष विजय गोयल बेहतर मुख्यमंत्री हो सकते हैं, जबकि 24 फीसदी वोटरों के पंसदीदा मुख्यमंत्री उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल हैं। वहीं शीला दीक्षित के समर्थन में सिर्फ 22 फीसदी वोटर हैं।
दरअसल केन्द्र में 10 सालों से यूपीए की सरकार है और दिल्ली में कांग्रेस की। इस तरह से केन्द्र और राज्य के एंटी इनक्बेंसी की मार शीला सरकार पर पड़ रही है। हालांकि शीला की सरकार दिल्ली में अच्छा काम कर रही है। लेकिन फिर भी शीला की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार आम आदमी की नजरों में गिरता जा रहा है।

अरविंद बनेंगे किंग मेकर !
दिल्ली विधानसभा चुनाव में किस पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलेगा ये कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन, मौजूदा समीकरण और आम लोगों की राय के मुताबिक केजरीवाल किंग मेकर की भूमिका जरूर निभा सकते हैं। लेकिन, अरविंद केजरीवाल का कहना है की भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ऐसे में किस पार्टी की सरकार को वो समर्थन देंगे ये सवाल बेशक पेचिदा है। लेकिन, सरकार तो बनेगी ही ऐसे में सवाल ये भी उठता है की क्या केजरीवाल राजनीति की विसात पर इन दोनों पार्टियों से दो दो हाथ कर पाएंगे या फिर पाला बदल कर सत्ता की चाबी संभालेंगे। ये अभी समय के गर्भ में हैं। लेकिन इतना तय है की दिल्ली में होने वाला इस बार का चुनाव बेहद रोमांचक और राजनीतिक उठा पटक का होगा। जिसमें कांग्रेस और भाजपा अपने अपने खेमे में उम्मीदावारों को खींचने के लिए दाना फेंक चुकी हैं।

रविन्द्र कुमार गौतम




Sunday, March 3, 2013

पटौदी की रैली के मायने

राव इन्द्रजीत की रैली के क्या मायने हैं...क्या इन्द्रजीत की रैली कांग्रेस के भीतरी अंतर्कलह की दस्तक है...या फिर कांग्रेस में दो फाड़ की दहाड़। रैली में एक तरफ जहां इन्द्रजीत के मंच पर सूबे के मुख्यमंत्री के खेमे का कोई नेता नहीं दिखाई दिया...वहीं...मंच पर राव इन्द्रजीत की हुंकार ये साफ करने के लिए काफी थी कि उनकी तल्खी बेवजह नही है।
राव इन्द्रजीत का दावा है कि चौधर की चाबी दक्षिण हरियाणा के हाथ में है। ऐसे में दक्षिण हरियाणा के लोगों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। लेकिन मुख्यमंत्री दक्षिण हरियाणा की अनदेखी करते हैं। और यहां के नेताओं की बात भी नहीं सुनते। हालांकि सूबे के मुख्यमंत्री ने पिछले छह महीने के भीतर दक्षिण हरियाणा के बावल में 8 साल के बाद रैली भी की...और दक्षिण हरियाणा के लोगों से वादा भी किया की अगर हरियाणा की चौधर की चाबी उनके हाथ आती है...और दक्षिण हरियाणा के लोग उनका हाथ मजबूत करते हैं तो मेवात का चौमुखी विकास होगा। उन्होंने बावल में कहा की लोग सोनीपत पानीपत रोहतक के साथ साथ मेवात का नाम भी लेंगे। ये बात साबित करने के लिए उन्होंने इशारा भी दिया की वो मेवात को पहले ही एक परियोजना झझर रोहत रेवाड़ी रेल लाइन के रूप में दे चुके हैं। इसके अलावा दो औऱ रेल परियोजना यहां आने के संकेत भी दिए। जिसपर रेल बजट आने के बाद मुहर भी लग गयी। साथ ही मेवात में रेल डिब्बा कोच फेक्ट्री ने सोने पर सुहागे का काम किया। लेकिन सवाल ये उठता है कि एक साल पहले ही मुख्यमंत्री को मेवात और खासतौर पर दक्षिण हरियाणा की याद क्यों आय़ी। वजह साफ है। दक्षिण हरियाणा से सांसद राव इन्द्रजीत से मुख्यमंत्री की पटरी मेल नहीं खाती। मुख्यमंत्री के किसी भी प्रोग्राम में राव इन्द्रजीत को न्यौता नहीं जाता।
मुख्यमंत्री की ये बेरूखी ही है कि इन्द्रजीत को पटौदी का मैदान चुनना पड़ा। इन्द्रजीत ने रेवाड़ी नहीं चुना और ना ही मेवात उन्होंने पटौदी को चुना। इसके पीछे वजह ये है कि यहां अहिरवालों की खासी अच्छी तादाद है। और यहां वो रेवाड़ी और मेवात के साथ साथ गुड़गांव की भीड़ भी जुटा सकते हैं। और ऐसा हुआ भी। भीड़ के उत्साह से से भी साफ रहा की राव इन्द्रजीत बेवजह ही दक्षिण हरियाणा से हुंकार नहीं भरते। यहां उनका जनसमर्थन उनके हक की बात करता है। और एक बड़ा धड़ा चाहता है कि अब समय आ गया है जब हरियाणा की चौधर की चाबी दक्षिण हरियाणा के हाथ आनी चाहिए। उसके लिए इन्द्रजीत जमीन भी लगभग तैयार कर ही चुके है। एक तरफ अंवाला से शैलजा मुख्यमंत्री से नाराज हैं तो दूसरी ओर अवतार सिंह भड़ाना फरीदाबाद से, बीरेन्द्र सिंह उचाना से। इसके अलावा नरेश सेलवाल और राजपाल भूखड़ी मुख्यमंत्री से खासे नाराज है। सभी का कहना है कि मुख्यमंत्री उन्हे तरजीह नहीं देते। कुल मिलाकर आने वाले विधानसभा चुनावों में किस विधानसभा की सीट पर किसे उम्मीदवारी दी जाए। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष फूलचंद मुलाना के लिए बेशक टेढी खीर साबित हो सकता है। खैर...इतना तय है कि अब राव इन्द्रजीत की इस हुंकार के बाद। मुख्यमंत्री को शायद दक्षिण हरियाणा के लिए अपने किसी खास कैंडिडेट के लिए फिल्डिंग सजानी होगी। और इसका भी चुनाव शायद वो कर चुके हैं। इसीलिए एक तरफ जहां पटौदी में राव इन्द्रजीत इंसाफ रैली कर रहे थे। और उसी समय मुख्यमंत्री दिल्ली के आवास पर आफताव अहमद की वाहवाही में कसीदे पढ़ रहे थे।  

Saturday, June 9, 2012

बौनों का कोरस

मीडिया में एक प्रथा बेहद प्रचललित है। और वो की जो एक करे वो आप भी करो। देर सबेर जो एक भौंके उसपर आपभी कुछ समय के बाद भौंकना शुरु कर दो। पहले मीडिया बाबा रामदेव के पीछे पड़ा। लेकिन बाबा को मीडिया मैनेज करना आता है। अब मीडिया के बौने बाबा की तारीफ करते नहीं थकते। हर चैनल पर बाबा की तारीफ होती है। लेकिन, मीडिया को लगातार ऐसे फीडर चाहिए जो कुर्सी पर बैठे निठल्लें मोटी तनख्वाह पर मालिक की छाती पर मूंग दलने वाले तथाकथित पत्रकार और आज के दलाल, भ्रष्टाचारी, दारूबाज, लड़कीबाज अपनी बीबीयों से मार खाने वाले ऑफिस की लड़कियों को घूरने वाले और चुगली रस का आनंद लेकर अपने से नीचे काम करने वालों की नौकरी खाने वाले ऐसे तमाम कमीने मालिकों को नए आइडिया देते हैं। 
ऐसे आइडिया जिसमें पत्रकारिता कम और दलाली की बू ज्यादा आती है। पिछले दिनों एक चैनल ने निर्मल बाबा को पहले खूब उछाला। उसके बाद सभी चैनल्स ने बाबा की जमकर खिंचाई की। लेकिन, यहां भी बाबा ही जीत गए। बाबा ने कुत्तों के आगे वोटी डाल दी...और कुत्ते खामोश हो गए। उसके बाद अब खबर मुंबई से है। मुंबई से राधे मां इन दिनों चर्चा में है। वो तो अच्छा है की राधे मां कुछ बोलती नहीं है। और मीडिया को उनके खिलाफ कोई मसाला नहीं मिल रहा है। असल में मीडिया में अक्सर बौने की कोरस गाते हैं। 
ये ठीक है कि समाज को ठगों से जालसाजों से बचाना है। ऐसे पाखंडी बाबाओं की भी जानकारी देनी है। लेकिन, किस शर्त पर। क्या इस शर्त पर की या तो आप हमें मोटा एड दीजिए नहीं तो हम आपको बदनाम करेंगे। आज अगर कोई किसी भी चैवल पर स्टिंग होता है तो वो टेलिकास्ट नहीं होता। क्योंकि जिसका स्टिंग होता है उसे आज दफ्तरों में बुला लिया जाता है। बाकायदा उसे स्टिंग दिखाया जाता है। और फिर दलाली होती है। देश के एक बड़े चैनल ने देश के एक प्रदेश में एक स्टिंग किया। उसे दिखाया भी। उसपर चैनल की टीआरपी आई। लेकिन, कुछ समय के बाद ही उस चैनल पर उस प्रदेश के सीएम का एड और विज्ञापन देखने को मिला। और हां....फिर उस खबर को फॉलोअप भी नहीं किया गया। ठीक इसी तरह से जब कभी भी देश के चैनल कोई खुलासा या बड़ी खबर करते हैं...तो उनके पीछे मकसद अब एक ही होता है। मोटा पैसा कमाना क्योंकि चैनल अब लोगों को शिक्षित या फिर जानकारी देने का माध्यम नहीं है। ये सिर्फ कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की मशीन है। जिसमें जितना जल्दी आउटपुट निकलता है और किसी धंधे में नहीं निकलता। औऱ इसी लिए चैनल्स में ऊंची पोस्ट पर बैठे दलाल लगातार ऐसे इनपुट देते रहते हैं जिसमें खबर कम और माल ज्यादा निकले। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता की देश की अर्थव्यवस्था कहां जा रही है। देश के आम आदमी का हाल क्या है। उन्हें दो ही चीज दिखाई देती है अपनी तनख्वाह और ऐश करने की अड्डा। 
ये तथाकथित पत्रकार अपनी गांड खुजाता कहीं भी आपको मिल जाएगा। हर उस प्रैस कांफ्रेस में जहां मुफ्त का मुर्गा और शराब मिल रही हो। हर उस सभा में जहां बकबक करने का पैसा मिलने वाला हो। इन दिनों एक और प्रचलन है। ये मोटे तोंद के पत्रकार अपना एक समूह बना लेते हैं। हर छुट्टी वाले दिन ये सभा रखते हैं। वहां मुर्गा और दारू तो होती ही है जिसका बंदोबस्त कोई लाला या ऐसा आदमी करता है जिसे मीडिया से काम निकलवाना होता है। 
इस तरह से ये हरामखोर पहले तो छुट्टी वाले दिन अपनी बीबीयों से पिटने से बच जाते हैं। दूसरा दूसरे दिन अखबार में इनका कोई बयान अगर छप जाए जो अक्सर छपता नहीं तो उसे पड़ोसी को दिखाकर अपने कालर सीधे कर लेते हैं। 

Monday, May 28, 2012

खेल नहीं साजिश है आईपीएल ?


आईपीएल एक महीने चला औऱ 27 मई की रात खत्म हो गया। इस बीच ग्रीष्मकालीन सत्र भी खत्म हो चला है औऱ अन्ना की हुंकार भी रालेगंज सिद्धी तक ही गूंज कर रह गयी। टीम अन्ना ने गाजियाबाद से दिल्ली तक जमकर हो हल्ला किया। संसद में कितने नेता ऐसे हैं जिनकी संपत्ति की जांच होनी चाहिए। ऐसे कौन से नेता है जिनपर जांच बैठानी चाहिए। लेकिन, आईपीएल के चौके छक्के में सारी मांगे उड़ती रही। यहां तक की एक साथ साढ़े सात रुपये प्रैट्रोल पर बढ़ा दिए गए, जिसे भी लोग आईपीएल के नशे में गले से उतार गए। जिसके बाद एक आधा जगह एक दो दिन धरना प्रदर्शन जरूर हुआ। पर वो भी आईपीएल के फाइनल में धुल गया।
खैर, अब तो आईपीएल खत्म हो गया। शाहरुख ने भी अपने किए पर माफी मांग ली जैसे उन्होंने देश पर कोई अहसान कर दिया। उन्होंने बड़े ही अदब से कहा की मैं अपने किए पर माफी मांगता हूं। और लोगों ने भी भी शाहरुख को माफ कर दिया। इसे अपने देश के लोगों का बड़प्पन समझे या मजबूरी ये जरूर शोध का विषय हो सकता है। क्योंकि दोनों ही हाल में देश का आम आदमी अपने आपको इस मामले में ठगा से महसूस करेगा ही करेगा। खैर, शाहरुख ने तो माफी मांग ली है।
वहीं इससे पहले देश के प्रधानमंत्री ने भी यूपीए-2 सरकार के तीन साल पूरे होने पर एक रात्रि भोज का आयोजन किया। जिसमें उन्होंने सरकार की कामयाबी का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। औऱ इस मौके पर पहली बार मुलायाम सिंह प्रधानमंत्री के साथ मंच पर खड़े दिखाई दिए। जिसके बाद यूपीए-2 सरकार के ना सिर्फ कंधों में एक नयी ताजगी दिखाई दी बल्कि मैडम के चेहरे पर भी ऐसी मुस्कान दिखी की आम आदमी की घिग्गी बंध गयी। अपने पजामे का नाड़ा बांधकर हर रोज ये कसम उठाने वाला आम आदमी की इस बार सरकार को मजा चखा दूंगा दूसरे दिन से ही अपना नाड़ा बगैर किसी लागलपेट के बांधता नजर आया। क्योंकि सरकार के साथ अब ममता कम और मुलायाम की साईकिल ज्यादा नजर आ रही थी।
इसी बीच पहले मध्याविधि चुनावों की घोषणा करते टेलिविजन इस रात्रि भोज के बाद घिघियाते दिखे। और टेलिविजन के तमाम धुरंधर अपने अपने कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर स्टोरी फोड़ने की कोशिश में अपना आपा खो बैठे। इस बीच खबर मिली की प्रधानमंत्री ने भी महंगाई पर नया प्रस्ताव लोगों को दिया है। उन्होंने लोगों से कहा है कि वो महंगाई को अपने हिसाब से नियंत्रित करे। अपनी जेब देखकर खर्च करें। क्योंकि सरकार के पास कोई जादु नहीं है। प्रधानमंत्री ने ये भी मान ही लिया की महंगाई है। लेकिन, महंगाई कम करेगा कौन। मैं अक्सर अपने दादा से लाल बहादुर शास्त्री के बारे में सुनता था। वो अक्सर कहते थे। बेटा, शास्त्री जी होते तो महंगाई नहीं होती। हम पूछते दादा जी क्यों वो क्या कर लेते। तो वो कहते थे। बेटा शास्त्री जी ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था। उनका कहना था कि जहां कही भी खाली जमीन दिखे वहां अनाज उगा दो। ये जो इंडिया गेट के बड़े पार्क हैं ना यहां भी शास्त्री जी ने अनाज उगवा दिया था। वो जहां कहीं भी खाली जगह देखते वहीं अनाज उगाने की बात कहते थे। लेकिन, आज मामला उलटा है। आज देश का प्रधानमंत्री कहता है जहां खाली जगह दिखे वहां बिल्डिंग बना दो। यहां विदेश से आउटसोर्स आयेगा। यहां युवा नौकरी पायेगा। और विदेश से पैसा आयेगा। उसी विदेशी जमीन से जो खुद कर्जें में हैं। यानी आज हमारे नेता उस जमीन पर खेती कर रहे हैं जो असल में है ही नहीं। ऐसे में महंगाई कम कैसे होगी। ये कहना मुश्किल है। लेकिन, हां...इतना जरूर है कि जब कभी भी आम जनता ज्यादा परेशान होया तो आईपीएल करवा दो या फिर कॉमनवेल्थ और कुछ और ना हो तो कोई और खेल करवा दो। क्योंकि कहा भी जाता है जब भूख भूलानी हो तो भजन गा। और भजन नहीं गा सकता तो सो जा।  

Monday, April 30, 2012

गोश्त


सड़क पर बिकता गोश्त
कभी कटा हुआ कभी लटका हुआ
और कभी
कई रंगों में लिपटकर इशारा करता हुआ।
दोनों ही तरह का गोश्त करता है इंतजार
एक किसी के पेट की भूख शांत करने का
और दूसरा किसी के दिमाग की।
दोनों ही भूख के बदले गोश्त के हिस्से में आते हैं
निशान दांतों के।
गोश्त कटने से पहले टटोला जाता है।
अपनी भूख और हवस के हिसाब से तोला जाता है।
कभी भींचकर तो कभी टांग उठाकर परखा जाता है।
गर्दन काटने से पहले कलमा तक पढ़ा जाता है।
और बदन से कपड़े उताराने से पहले गंडा ताबीज अलग किए जाते हैं।
दोनों ही बार दिमाग में एक ही तूफान होता है जल्दी निपटाने
और आराम से पैर सीधे कर सोने का इंतजाम देखने का।