Thursday, March 22, 2012

काले कर्मों वाले बाबा


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बाबा रामदेव काफी समय से देश भर में काले धन के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। लेकिन पड़ताल बताती है कि असल में उनका खुद का हाल पर उपदेश कुशल बहुतेरे जैसा है। काले धन को लेकर सरकारों को पानी पी-पीकर कोसने वाले बाबा रामदेव खुद उसी काले धन के पहाड़ पर विराजमान हैं।
साल 2004 की बात है। बाबा रामदेव योगगुरु के रूप में मशहूर हुए ही थे। चारों तरफ उनकी चर्चा हो रही थी। टीवी चैनलों पर उनकी धूम थी। देश के अलग-अलग शहरों में चलने वाले उनके योग शिविरों में पांव रखने की जगह नहीं मिल रही थी और बाबा के औद्योगिक प्रतिष्ठान दिव्य फार्मेसी की दवाओं पर लोग टूटे पड़ रहे थे। लेकिन फार्मेसी ने उस वित्तीय वर्ष में सिर्फ छह लाख 73 हजार मूल्य की दवाओं की बिक्री दिखाई और इस पर करीब 54 हजार रुपये बिक्री कर दिया गया। यह तब था जब रामदेव के हरिद्वार स्थित आश्रम में रोगियों का तांता लगा था और हरिद्वार के बाहर लगने वाले शिविरों में भी उनकी दवाओं की खूब बिक्री हो रही थी। इसके अलावा डाक से भी दवाइयां भेजी जा रही थीं।
रामदेव के चहुंओर प्रचार और देश भर में उनकी दवाओं की मांग को देखकर उत्तराखंड के वाणिज्य कर विभाग को संदेह हुआ कि बिक्री का आंकड़ा इतना कम नहीं हो सकता। उसने हरिद्वार के डाकघरों से सूचनाएं मंगवाईं। पता चला कि दिव्य फार्मेसी ने उस साल 3353 पार्सलों के जरिए 2509.256 किग्रा माल बाहर भेजा था। इन पार्सलों के अलावा 13 लाख 13 हजार मूल्य के वीपीपी पार्सल भेजे गए थे। इसी साल फार्मेसी को 17 लाख 50 हजार के मनीऑर्डर भी आए थे।
सभी सूचनाओं के आधार पर राज्य के वाणिज्य कर विभाग की विशेष जांच सेल (एसआईबी) ने दिव्य फार्मेसी पर छापा मारा। इसमें बिक्रीकर की बड़ी चोरी पकड़ी गई। मामला कम से कम पांच करोड़ रु के बिक्रीकर की चोरी का था।
भ्रष्टाचार और काले धन को मुद्दा बनाकर रामदेव पिछले दिनों भारत स्वाभिमान यात्रा पर निकले हुए थे। इस यात्रा का पहला चरण खत्म होने के बाद 23 नवंबर को वे दिल्ली में थे। यहां बाबा का कहना था कि यदि संसद के शीतकालीन सत्र में लोकपाल और काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने वाले बिल पारित नहीं होते हैं तो वे उन पांच राज्यों में आंदोलन करेंगे जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इससे कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में उनका कहना था, ‘जिस दिन काले धन पर कार्रवाई शुरू होगी, उस दिन पता चलेगा कि जिन्हें हम खानदानी नेता समझ रहे थे उनमें से 99 प्रतिशत तो खानदानी लुटेरे हैं।
अब सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार और काले धन की जिस सरिता के खिलाफ रामदेव अभियान छेड़े हुए हैं उसी में अगर वे खुद भी आचमन कर रहे हों तो? फिर तो वही बात हुई कि औरों को नसीहत, खुद मियां फजीहत। पड़ताल कुछ ऐसा ही इशारा करती है।
सबसे पहले तो यह सवाल कि काला धन बनता कैसे है।
करों से बचाई गई रकम और ट्रस्टों में दान के नाम पर मिले पैसे से काला धन बनता है। काले धन को दान का पैसा दिखाकर, उस पर टैक्स बचाकर उसे फिर से उद्योगों में निवेश किया जाता है। इससे पैदा होने वाली रकम को पहले देश में जमीनों और जेवरात पर लगाया जाता है। इसके बाद भी वह पूरा न खप सके तो उसे चोरी-छुपे विदेश भेजा जाता है। यह एक अंतहीन श्रृंखला है जिसमें बहुत-से ताकतवर लोगों की हिस्सेदारी होती है।
दिव्य फार्मेसी पर छापे की कार्रवाई को अंजाम देने वाले तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा बताते हैं कि उनकी टीम ने इस छापे से पहले काफी होमवर्क किया था। राणा कहते हैं, ‘मेरी याददाश्त के अनुसार लगभग पांच करोड़ रु के राज्य और केंद्रीय बिक्री कर की चोरी का मामला बन रहा था।टीम के एक अन्य सदस्य बताते हैं, ‘पुख्ता सबूतों के साथ 2000 किलो कागज सबूत के तौर पर इकट्ठा किए गए थे।
रामदेव से जुड़ी फार्मेसी पर छापा मारने पर उत्तराखंड के तत्कालीन राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल बड़े नाराज हुए थे। उन्होंने इस छापे की पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट सरकार से तलब की थी। उस दौर में प्रदेश के प्रमुख सचिव (वित्त) इंदु कुमार पांडे ने राज्यपाल को भेजी रिपोर्ट में छापे की कार्रवाई को निष्पक्ष और जरूरी बताया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने भी इस रिपोर्ट के साथ अपना विशेष नोट लिख कर भेजा था जिसमें उन्होंने प्रमुख सचिव की बात दोहराई थी। रामदेव ने अधिकारियों पर छापे के दौरान बदसलूकी का आरोप लगाया था जिसे राज्य सरकार ने निराधार बताया था।
विभाग के कुछ अधिकारियों का मानना है कि रामदेव के मामले में अनुचित दबाव पड़ने के बाद डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा ने समय से चार साल पहले ही सेवानिवृत्ति ले ली थी। राणा को तब विभाग के उन उम्दा अधिकारियों में गिना जाता था जो किसी दबाव से डिगते नहीं थे। एसआईबी के इस छापे के बाद राज्य या केंद्र की किसी एजेंसी ने रामदेव के प्रतिष्ठानों पर छापा मारने की हिम्मत नहीं की। इसी के साथ रामदेव का आर्थिक साम्राज्य भी दिनदूनी रात चौगुनी गति से बढ़ने लगा।
लेकिन बिक्री कम दिखाना तो कर चोरी का सिर्फ एक तरीका था। दिव्य फार्मेसी एक और तरीके से भी कर की चोरी कर रही थी। दस्तावेज बताते हैं कि उस साल फार्मेसी ने वाणिज्य कर विभाग को दिखाई गई कर योग्य बिक्री से पांच गुना अधिक मूल्य की दवाओं (30 लाख 17 हजार रु) का स्टाक हस्तांतरणबाबा द्वारा धर्मार्थ चलाए जा रहे दिव्य योग मंदिर ट्रस्टको किया। रिटर्न में फार्मेसी ने बताया कि ये दवाएं गरीबों और जरूरतमंदों को मुफ्त में बांटी गई हैं। लेकिन वाणिज्य कर विभाग के तत्कालीन अधिकारी बताते हैं कि दिव्य फार्मेसी उस समय गरीबों को मुफ्त बांटने के लिए दिखाई जा रही दवाओं को कनखल स्थित दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट से बेच रही थी।
जमीन का फेर
योग और आयुर्वेद का कारोबार बढ़ने के बाद रामदेव ने वर्ष 2005 में पतंजलि योग पीठ ट्रस्ट के नाम से एक और ट्रस्ट शुरू किया। रामदेव तब तक देश की सीमाओं को लांघ कर अंतरराष्ट्रीय हस्ती हो गए थे। 15 अक्टूबर, 2006 को गरीबी हटाओ पर हुए मिलेनियम अभियान में रामदेव ने विशेष अतिथि के रूप में संयुक्त राष्ट्र को संबोधित किया। अपने वैश्विक विचारों को मूर्त रुप देने के लिए अब उन्हें हरिद्वार में और ज्यादा जमीन की जरूरत थी। इस जरूरत को पूरा करने के लिए आचार्य बालकृष्ण, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट और पतंजलि ट्रस्ट के नाम से दिल्ली-माणा राष्ट्रीय राजमार्ग पर हरिद्वार और रुड़की के बीच शांतरशाह नगर, बढ़ेड़ी राजपूताना और बोंगला में खूब जमीनें खरीदी गईं। राजस्व अभिलेखों के अनुसार शांतरशाह नगर की खाता संख्या 87, 103, 120 और 150 में दर्ज भूमि रामदेव के ट्रस्टों के नाम पर है। यह भूमि कुल 23.798 हेक्टेयर (360 बीघा) के लगभग बैठती है और इसी पर पतंजलि फेज-1, पतंजलि फेज- 2 और पतंजलि विश्वविद्यालय बने हैं।
रामदेव के पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट को 16 जुलाई, 2008 को उत्तराखंड सरकार से औरंगाबाद, शिवदासपुर उर्फ तेलीवाला आदि गांवों में पंचकर्म व्यवस्था, औषधि उत्पादन, औषधि निर्माणशाला एवं प्रयोगशाला स्थापना के लिए 75 हेक्टेयर जमीन खरीदने की इजाजत मिली थी। शर्तों के अनुसार खरीदी गई भूमि का प्रयोग भी उसी कार्य के लिए किया जाना चाहिए जिस कार्य के लिए बताकर उसे खरीदने की इजाजत ली गई है। पहले बगीचा रही इस कृषि-भूमि पर रामदेव ने योग ग्राम की स्थापना की है। श्रद्धालुओं को बाबा के इस रिजॉर्टनुमा ग्राम में बनी कॉटेजों में रहकर पंचकर्म कराने के लिए 1000 रु से लेकर 3500 रु तक प्रतिदिन देना होता है।
फर्जीवाड़े दुनिया भर के
तेलीवाला गांव में रामदेव की जमीनों के लगभग 20 बीघा वाले हिस्से में एक भव्य भवन वाला बड़ा आवासीय परिसर बना है। इस पर पर बाबा के बड़े-बड़े फोटो लगे हैं। बाबा ने तेलीवाला की अपनी सारी जमीन पर योग ग्राम की ही तरह बिजली के प्रवाह वाली सबसे महंगी तार-बाड़ लगाई है। इस परिसर के प्रभारी राजस्थान निवासी कोई शास्त्री जी हैं। परिसर में ट्रैक्टर सहित कई कृषि यंत्र दिखते हैं। बाबा के सेवक इस परिसर में शाहीवाल नस्ल की गायें भी पालते हैं। इसके पास ही पतंजलि धर्मकांटाभी लगाया गया है जहां से गन्ना तुल कर परिसर में बने गुड़ के कोल्हू पर पिराई के लिए जाता है। कोल्हू दो हैं जिन्हें चलाने के लिए रामदेव के लोग आसपास के गांवों के किसानों से गन्ना खरीदते हैं। आने वाला गन्ना तोलने के लिए उन्होंने बाकायदा धर्मकांटा तक लगाया है। विजयपाल सैनी बताते हैं, ‘बाबा की इन चरखियों में हर दिन लगभग 300 क्विंटल गन्ना पिरोया जाता है।
तेलीवाला में बिजली के दो कनेक्शन भी आचार्य बालकृष्ण के नाम व दिव्य योग मंदिर, कनखल के पते पर लिए गए हैं। बिजली के एक कनेक्शन की उपभोक्ता संख्या 711205 है। 35 हार्स पावर का एक कनेक्शन ट्यूब-वेल के नाम पर लिया गया है।
नये जमाने के जमींदार
आजादी के बाद वर्ष 1950 में जमींदारी प्रथा को खत्म करने के मकसद से एक कानून बनाया गया था जो 1952 में पूरी तरह से लागू हुआ। असल में तब समस्या यह थी कि चंद लोगों के पास जमीनें ही जमीनें थीं जबकि बाकी भूमिहीन थे। कानून का मकसद था कि यह असंतुलन दूर हो और दलित व गरीब भूमिहीनों को भी खेती के लिए जमीन मिले। लेकिन रामदेव जो कर रहे हैं वह एक झलक है कि किस तरह वही क्रूर जमींदारी प्रथा एक नयी शक्ल में फिर से सिर उठा रही है।
बाबा के ट्रस्टों द्वारा खरीदी गई भूमियों में से एक (खाता संख्या 120) की गहनता से जांच की तो पाया कि रामदेव ने जमीनों को खरीदने के लिए कानून के उन्हीं छेदों का सहारा लिया है जिनका इस्तेमाल भूमाफिया अनुसूचित जाति के गरीब किसानों की जमीन छीनने में करते हैं। बढेड़ी राजपूतान गांव निवासी कल्लू के चार पुत्रों में से तीन ने वर्ष 2007 से लेकर 2009 के बीच जमीन को बंधक रख बैंक से ऋण लेना दिखाया है। बाद में ऋण अदायगी के नाम पर अनुसूचित जाति के इन किसानों को भूमि बेचने की इजाजत उपजिलाधिकारी से दिलाई गयी और इस भूमि को पतंजलि योगपीठ ने ले लिया। अब ये परिवार भूमिहीन हैं।
पट्टे में मिली खेती की तीन बीघा जमीन पर बाबा के लोगों द्वारा कब्जा करने के बाद शकीला अब अपने बेटे गुलजार के साथ नदी की रेत में पसीना बहा कर किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम करेगी। आचार्य बालकृष्ण ने सरकार को इस नदी को भी उनके ट्रस्ट को आवंटित करने का प्रस्ताव भेजा है। फिर भूमिहीन हो गए सैकड़ों ग्रामीण कहां जाएंगे, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
हाल ही में रामदेव ने फिर उत्तराखंड सरकार से हरिद्वार जिले के तेलीवाला, औरंगाबाद, हजारा ग्रांट, अन्यगी आदि गांवों में 125 हेक्टेयर (1875 बीघा) भूमि खरीदने की अनुमति मांगी है। वास्तव में ये जमीनें बाबा ने अपने लिए इकट्ठा करवा कर कब्जे में ले रखी हैं। अब उन्हें खरीद का वैधानिक रूप देना है। इनमें से ज्यादातर अनुसूचित जाति के किसानों की हैं जो बाबा को जमीन बेच कर एक बार फिर भूमिहीन हो गए हैं। बाबा के ट्रस्टों के भू-विस्तार अभियान से भूमिहीन हो गए सैकड़ों ग्रामीण कहां जाएंगे, इसके बारे में सोचने की फुरसत किसी को नहीं। शकीला के पास टीवी भी तो नहीं है। कम से कम वह उस पर रोज आ रहे बाबा रामदेव के प्रवचनों को सुन कर यह संतोष तो कर लेती कि उसकी थोड़ी-सी जमीन काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ किए जा रहे बाबा के संघर्ष में कुर्बान हुई है।
दवा और उत्पादों की कीमत में हेरफेर
इसके अलावा अगर बाबा के प्रोडक्ट्स की बात की जाए...तो वो भी बाजार के दूसरे उत्पादों की तरह ही महंगे हैं....लेकिन बाबा का तर्क है...कि वो वगैर मुनाफे के अपने उत्पाद बेच रहे हैं....आईये हम आपको बाबा राम देव और दूसरे उत्पाद की कीमते दिखाते हैं...जो अपने आप ये बयां करने के लिए काफी होगें कि बाबा के उत्पाद किस भी हाल में सस्ते नहीं हैं। अगर एक दो चीजों की कीमतों को छोड़ दिया जाए तो।
आरोग्य आटा 2 KG Rs. 100
आरोग्य विस्कुट – 100GM Rs. 10
आंवला केंडी 500GM Rs.110.00
आंवला चटपटा 500GM Rs.115.00
अमृत रसायन 1000GM Rs.140.00
बादाम पाक 500GM Rs.225.00
बादाम रोगन 60ML Rs.100.00
बेसन 500GM Rs.30.00
बेव कैंडी 500GM Rs.110.00
दिव्य दलिया 500GM Rs.30.00
दिव्य शोधित हरड़ 100GM Rs.30.00
गुलकंद 400GM Rs.45.00
हींग पेड़ा 200GM Rs.55.00
महात्रिफला घृत 200GM Rs.180.00
मिक्स जैम 500GM Rs.70.00
फल घृत 200 GM Rs.200.00
पाइनएप्पल जैम 1000GM Rs.100.00
सादा च्वनप्राश 1KG Rs.140.00
सेब जैम 1000GM Rs.100.00
शिलाजीत सत 20GM Rs.60.00
ये बाबा रामदेव के उत्पादों की कीमते हैं....जिन्हें देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता है...कि बाबा के कोई भी उत्पाद बाजार के दूसरे उत्पादों जैसे महंगे ही है....फिर बाबा किस आधार पर कहते हैं...कि उनके उत्पाद बाजार कीमतों से कम है...और वो किसी तरह का मुनाफा कमाने में यकीन नहीं करते।

Thursday, December 29, 2011

गुरू


दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं...जो ये समझ पाते हैं...कि जिंदा रहना ही इस दुनिया में काफी नहीं है...इसके आगे भी एक दुनिया है....एक दुनिया ऐसी भी है...जहां मौत जिंदगी से हार जाती है। ये फिलॉसिफिकल बातें हो सकती हैं...खासतौर पर उन लोगों के लिए जिनके लिए जिंदगी जीने का मतलब ही दो समय का खाना खाकर इस दुनिया में आबादी बढ़ाना है। ये काम सभी करते हैं... जो इस दुनिया में आते हैं...लेकिन, इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं...जो ये काम नहीं करते...उनकी प्यास उनकी थ्रस्ट आबादी नहीं आबादी की यादों में सालों साल बना रहना होता...वो जिंदा रहते हैं...तो भी और जब वो जिंदा नहीं भी होते तब भी।

मेरे एक दोस्त हैं...वो अक्सर कहते हैं...रवि ये दुनिया लोगों को भूल जाती है...कोई फर्क नहीं पड़ता कितने ही रोज आते हैं... कितने ही चले जाते हैं...लेकिन, कुछ को ये दुनिया पता है क्यों चाहकर भी नहीं भूला पाती क्योंकि वो लोग कभी भी इस दुनिया का हिस्सा नहीं रहे...वो कभी इस दौड़ में शामिल नहीं हुए कि शाम का खाना कहां से आयेगा...उन्हें ये नहीं पता होता था कि आज खाकर फिर कब मिलेगा...और ना ही वो इस बात की फ्रिक किया करते थे...कि कल खाना कपड़ा या सिर छुपाने के लिए छत कहां मिलेगी...वो चलते गए...चलते गए...और वो मंजिल पा गए...लेकिन अक्सर हम ऐसे लोगों को मूर्ख, फकीर या फिर पागल मानते रहे हैं...लेकिन असल मायने में वो हमारे गुरू हैं। वो इसलिए क्योंकि ये समाज से अलग रहे हैं...इनकी राह अलग रही है...सवाल ये भी उठता है कि आखिर इस जीवन का मतलब क्या है...हम एक समाजिक प्राणी है...समाज में रहकर अपना औऱ समाज का विकास करना हमारा मूलमंत्र है....और एक अनूठा काम ये है कि हमने आने वाली नस्लों को इतना मजबूत बनाना है..कि वो आने वाले समय में औऱ ज्यादा से ज्यादा सही तरीके से इस दुनिया में रह पाये। यहां मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल कर पाये...लेकिन एक नजर डाले तो क्या समाजिक परिवेश दिन पर दिन और और कठिन नहीं होता जा रहा है...मानव जीवन लगातार एकाकी की ओर बढ़ रहा है। परिवार टूट रहे हैं...आत्महत्या बढ़ रही हैं..और मानव कुठा में इजाफा हो रहा है। क्या बजह हो सकती है। समाज तो सुधर रहा है...समाज में बड़े बड़े परिवर्तन हो रहे हैं....समाज लगातार विकास कर रहा है। आज का युवा गांव से शहर शहर से देश और देश से विदेश में काम कर रहा है। बावजूद इसके आज का युवा क्यों विचलित है। क्यों उसके मन में रह रह कर ये सवाल उठता है कि अभी मंजिल दूर है। क्यों युवा आज भीड़ में अपने आप को अकेला महसूस करता है। इसका जबाव इकनॉमी के एक्सपर्ट अलग अलग तरह से बता सकते हैं। वह कहेंगे कि मानव की मांग और इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही हैं... और मानल की मांग लगातार बढ़ रही हैं। उसकी जरूरतों में इजाफा हो रहा है। पहले कम आय में गुजारा होता था। औऱ आदमी उसमें खुश था। लेकिन जैसे जैसे मानव का समग्र विकास हुआ है। मानल की जरूरतें बढ़ गयी हैं। ऐसे में इच्छाओं की पूर्ति होना मुश्किल होता जा रहा है...और इसका नतीजा ये है कि आत्महत्या और एकांकी बढ़ रही है। अब इसी बात को हम समाजशास्त्रीयों के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। समाजशास्त्रियों की माने तो उनका मानना है कि समाज का जब जब विकास होता है...उसमें असंतोष बढ़ता है...क्योंकि समाज में प्रतिस्पार्धा बढ़ती है। और जब प्रतिस्पार्धा बढ़ती है...तो उस समाज में अवसाद होना स्वाभाविक है। खैर ये तो समाजशास्त्रियों की सोच है। लेकिन जब बात प्रतिस्पार्धा की हो तो मानव समाज में तो प्रतिस्पार्धा उसी दिन से आरंभ हो जाती है...जब पहला शुक्राणु अपना अंडा पाने के लिए गर्भ में तेजी से दौड़ लगाता है। और जो शुक्राणु जीत जाता है...वो अपना अंडा निषेचित करने में कामयाब हो जाता है। और फिर मानव के पैदा होने से लेकर जीवन जीने और उसे सुंदर बनाने में मानव लगातार प्रतिस्पार्धा में रहता है। फिर अचानक क्या हो जाता है...कि आदमी आत्महत्या करता है। क्यों आदमी इस अमूल्य जीवन को जो मिलता ही है एक भरसक प्रयास और कड़ी प्रतिस्पार्धा के बाद उसे खत्म, समाप्त करने की वीड़ा उठा लेता है। इसके लिए हमें आज से कुछ समय पीछे चलना होगा। हमें महाभारत काल में जाना होगा। जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं...और उन्हें गीता के माध्यम से जीवन का मर्म समझा रहे हैं। अर्जुन जीवन युद्ध से खिन्न है। और गांडीव छोड़ जमीन पर घुटनों के बल बैठे हैं। कृष्ण जो अर्जुन के गुरू भी हैं... और सारथी भी। वो अर्जुन को देखर स्तब्ध है। वह पहले मुस्कुराते हैं...और फिर अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं। पार्थ....ये जो भी तुम देखरहे हो...औऱ जिन्हें तुम अपना कह रहे हो...ये सभी उतने ही मेरे भी है...जितने तुम्हारे। और ये युद्ध तुम्हारा नहीं है। ये उस मानव जाति का है जो इस युद्ध के बाद सालों साल नहीं बल्कि युगों तक इस युद्ध को याद रखेगा। वो इस युद्ध को इसलिए याद नहीं रखेगा कि ये युद्ध तुमने या मैंने लड़ा है। बल्कि इस युद्ध को इस लिए याद रखा जाएगा...क्योंकि इस युद्ध में ये तय होगा कि घरती पर असल मायने में जीने का अधिकार किसे है। वो कौन है...जो इस अनमोल धरती पर सालों साल राज करेगा। और वो कैसा होगा...जो इस धरती पर इस अनमोल जीवन जीयेगा। हम और तुम और ये सभी एक दिन इस धरती पर नहीं रहेंगे। लेकिन आने वाली पीढ़ी को हम जीवन का वो अनमोल रत्न सौंपकर जाएंगे जिसे पाकर आने वाली पीढ़ी इस धरती पर सालों साल दुख दर्द और एकांकी से दूर रहकर सुखी जीवन व्यतीत करेगी। तो पार्थ गांडीव उठाओं और कर्म करते हुए....पाप, घृणा, नफरत, लालच, व्यविचार और समस्त गलत कार्यों को करने वाले इन शरीरों का नाश करो...नाश करो उन शरीरों को जो इनको धारण किए हुए हैं...नाश करो...उस विचार को जिसे पालकर मानवजाति काल शौक और दुख के गर्त में धंसती जाती है...और अंत में मुक्ति और मोक्ष को नहीं बल्कि अक्रांत दुख को हासिल करता है। पार्थ खत्म करो ये शोक और उठाओं गांडीव। तब अर्जुन श्री हरि से आज्ञा लेकर अक्रांत दुख शोक, लालच का विनाश करते हैं। अगर हम इस बात को और आसान तरीके से समझने की कोशिश करे तो श्री हरि ने कृष्ण के माध्यम से सिर्फ ये समझाने की कोशिश की है...कि जो भी कुछ हम देखते समझते या इस लोक पर महसूस करते हैं...वो सभी कुछ नश्वर है। जीवन कर्म के आधार पर सुख या दुख तय करता है। कर्म प्रधान है। औऱ कर्म का साफ सुथरा और समाज के प्रति ईमानदार अपने प्रति ईमानदार होना ही सभी दुखों पर विजय प्राप्त करना है। अर्जुन ने भी वहीं किया। लेकिन जीवन के इस महाभारत में सभी को कृष्ण कैसे मिले। ये भी एक बड़ा सवाल है। और इसका जबाव हमें महाभारत काल से पहले अयोध्या में मिलता है। जहां श्री राम को उनके गुरू वशिष्ठ गुरुकुल में शिक्षा दे रहे हैं। वहां गुरू राम से कह रहे हैं....राम तुम्हारे लिए सबसे बड़ा कौन है...और राम कहते हैं...आप। और फिर वशिष्ठ राम से पूछते हैं...मैं कैसे। इसपर राम मुस्कुरा कर कहते हैं...क्योंकि आपने मुझे जीवन का मर्म समझाया है। आपने इस जीवन को जीने का तरीका मुझे बताया है...मुझे अस्त्र शस्त्र से लेकर समाजिक परिवेश में रहने की चुनौतियों का सामना करने का तरीका समझाया है। ऐसे में आप ही मेरे लिए सबसे बड़े हैं। यानी कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो हर हाल में गुरू सबसे बड़ा है। और जिसके जीवन में गुरू है...उसका जीवन किसी अल्हड़ मस्त फकीर जैसा मस्त होगा।

Monday, November 28, 2011

चेहरे

ऑफिस में पहुंचते ही आज मुझे अचानक बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। दो दिन रिपोर्टर और वीडियो एडिटर एक ऐसी लड़की का वीडियो डाउनलोड करने में मशगूल थे...जिसने विदेश की कई ब्लू फिल्मों में काम किया है। इस लड़की की देश के बिग बॉस में एंट्री हुई थी। इसपर ऑफिस के एक विभाग को कार्यक्रम बनाना था। ऐसे में इस लड़की की वीडियो और फोटो को ये सभी लोग बड़ी ही ईमानदारी से डॉउनलोड कर रहे थे औऱ निहार रहे थे। ये ऑफिस में खुल्लम खुल्ला हो रहा था। यानी आज ऑफिस में उन इस मॉडल के तो पता नहीं कितने कपड़े उतरे थे...लेकिन ऑफिस के कुछ लोगों की नंगनियत खुलकर दिखाई दे रही थी।

ऐसा इसलिए भी था...क्योंकि ये लोग ज्यादातर काम में मशरूफ रहते थे औऱ सिर्फ काम की ही बाते करते नजर आते थे। लेकिन इस खबर के साथ एक साथ इतने लोगों का क्रेज मेरे लिए किसी पहेली से कम नहीं था। हालांकि इससे पहले भी मैं ऐसे स्थितियों से दो चार हुआ हूं। जब कभी भी किसी भी लड़की के एमएमएस की कहानी या खबर ऑफिस में आती है..तो उसकी फुटेज भी आती है...उस फुटेज को ऑफिस का हर कर्मचारी बड़ी ही शालीनता से देखता है...और ये सिद्ध करने में कतई कोर कसर नहीं छोड़ता की उसका इस खबरे से कितना लगाव है। ऑफिस में एमएमएस को बड़ी सिद्धत से देखा औऱ सुना जाता है...इसमें फिर चाहे काफी एडिटर हो या फिर एडिटर सभी को एमएमएस देखने की दिलचस्पी होती है...और हो भी भला क्यूं नहीं जब माल फ्री का हो तो उसपर हाथ भला कौन नहीं साफ करना चाहेगा। कुछ ऐसा ही इस मॉडल के साथ भी हुआ। ऑफिस में जमकर लोग इसके फोटो देख रहे थे।

Saturday, November 26, 2011

जिंदगी

कभी कभी लगता है जैसे ये जिंदगी होने या ना होने के बीच भटक रही है

कभी कभी ये भी लगता है कि जिंदा होने या ना होने के बीच का अंतर ही जिंदगी है।

फिर लगता है कि मासूम बच्चों की किलकारी

घर में उनका कलरव

घर आने पर उनका खुली बाजूओं से छूना ही जिंदगी है।

सुबह से शाम के बीच ऑफिस में जूझना

अपने को जिंदा रखना

या फिर अपने कंपीटिटरों को पछाड़ देना

शायद यहीं जिंदगी है।

फिर अहसास होता है...

एक दिन मैं भी हारूंगा।

हार जाउंगा किसी दौड़ में

क्योंकि उम्र की ढलान मैं कब तक रोक पाउंगा

कब तक मैं दौड़ मैं बना रहूंगा।

एक दिन मैं कम से कम सांस लेने के लिए तो रुकूंगा ही।

फिर उसके बाद

शायद थक कर बैठा तो बैठा ही रहूंगा।

फिर उसके बाद...

खामोश सी सड़क

सड़क पर मुसाफिर जो चला जा रहा है

किसी अज्ञात मंजिल की ओर

बगैर थके बगैर रूके लेकिन कहा कब तक

Monday, September 26, 2011

आखिर राजबाला ने दम तोड़ दिया



दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ योग से अपनी काया दुरुस्त करने और देश से भ्रष्टाचार खत्म करने की मुहिम में शामिल राजबाला अब हमारे बीच नहीं है...आज उनका तीन महीने चली लंबी जद्दोजेहद खत्म हो गयी..वो आम आदमी की तरह सरकार रूपी मौत के आगे हार गयी। बेहद, दुख के साथ सभी लोग एक या दो दिन बाद राजबाला को भूल भी जाएंगे...क्योंकि प्रणब की मुलाकात चिंदबरम पर कोई ना कोई रंग लाकर रहेगी...मीडिया आज इस खबर को तभी तक चलाएगा...जब तक की चिंदबरम पर कोई पुख्ता बयान सरकार की ओर से नहीं आ जाता...एक बार सरकार का बयान आया नहीं की राजबाला पुरानी खबर हो जाएगी...राजबाला के घर पर शायद ही कोई रिपोर्टर पहुंचेगा...लेकिन राजबाला ने तो अपनी जान दी है...हालांकि रामदेव उनकी मौत को शहादत मान रहे हैं...जिसपर सरकार के कानून मंत्री ने धीरे से मोटी धमकी रामदेव को दे भी डाली है...उन्होंने साफ रामदेव को चेतावनी के अंदाज में कहा है कि राजबाला पर देश में राजनीति नहीं होनी चाहिए....कानून मंत्री के हाथ क्योंकि देश का कानून है...तो शायद उनसे कोई ये बात भी ना पूछे कि आखिर क्यों देश के लोग राजबाला की बात ना करें...क्यों राजबाला की मौत की जिम्मेदारी सरकार पर क्यों ना डाली जाए...अगर राजबाला की मौत की बजह दिल्ली पुलिस की लाठियां हैं...तो क्यों सरकार ने राजबाला का इलाज अच्छे से अच्छे अस्पताल में क्यों नहीं करवाया...क्यों राजबाला को तीन महीने तक मौत का इंतजार करवाया गया...क्यों उसे तिल तिल करके मर जाने दिया गया... राजबाला जीबी पंत अस्पताल में भर्ती थीं। राजबाला की मौत के विपक्ष राजनीतिक तौर पर इसे मुद्दा भी बनायेगा....वहीं ये मामला सुप्रीम कोर्ट और आयोगों के स्तर पर भी उठाए जाने की संभावना है। 51 वर्षीय राजबाला 4 जून की रात से ही जीबी पंत अस्पताल में एडमिट थीं। उनके शरीर में कई फ्रैक्चर थे। डॉक्टरों के मुताबिक राजबाला दो दिन से वेंटिलेटर पर थीं। गहरी चोट ही उनकी मौत की वजह बनीं। बाबा रामदेव के साथ अनशन पर बैठे लोगों पर पुलिस लाठीचार्ज का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। कोर्ट ने उस रात की पुलिस कार्रवाई की सीडी तलब की है। किन हालात में, किसने पुलिस ऐक्शन के आदेश दिए और किस तरह सोते हुए लोगों पर एक्शन हुआ, यह सब सवालों के घेरे में है। मानवाधिकार आयोग में भी शिकायतें हैं। राजबाला की मौत के बाद उन शिकायतों की गंभीरता और बढ़ गई हैं खैर राजबाला चली गयी...लेकिन अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गयी जिसके सवाल आने वाले दिनों में देश की सरकार को देने ही होंगे।

Tuesday, August 16, 2011

क्या ये सरकार आम आदमी की है ?


अन्ना हजारे को सात दिनों की हिरासत में भेजने के बाद दिल्ली पुलिस कमीश्नर वी के गुप्ता का ये कहना उन्होंने अन्ना हज़ारे और उनके कुछ समर्थकों को शांति भंग होने की आंशका की वजह से गिरफ़्तार किया है। बेहद ही शर्मनाक और हास्यपद वाकया प्रतीत होता है। हालांकि गिरफ्तारी से पहले अन्ना हजारे को विशेष अदालत में पेश किया गया है जहां निजी मुचलका देने से इनकार करने के बाद उन्हें सात दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। जबकि दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन कर रहे क़रीब 1400 लोगों को हिरासत में लिया गया।
ये वो खबर है...जो मीडिया के लोग चिल्ला चिल्ला कर चैनलों पर गा रहे थे....उन्हें टीआरपी की रेस में रहने के लिए लगातार ऐसी खबर देनी थी...जिसपर आम और खास आदमी की लगातार नजर बनी रहे...टीवी पर दनादन खबरों के बीच में चैनल बदलता जा रहा था...तभी देश के नंबर एक चैनल पर आकार मेरा हाथ रूक गया...यहां देश के दो बड़े पत्रकार आपस में बात कर रहे थे...इनमें से एक पत्रकार ऐसे हैं...जो देश का सबसे बड़ा अखबार चलाने का दम भरते हैं...दूसरे वो है जो अखबार के दफ्तर में कम और मनमोहन सोनिया के दरबार में ज्यादा दिखाई देते हैं। यहां बीच बहस में देश के जाने माने कुछ फिल्मी कलाकार भी कोढ़ में खाज की तरह उटपटांग सवाल इनसे पूछ रहे थे...जो बेशक पेट पकड़कर हंसाने के लिए काफी थे....इनमें से एक ने दूसरे से पूछा कि अन्ना को भला इतनी क्या जल्दी थी...लोकपाल बिल को लेकर अनशन करने की...और देश की व्यवस्था बिगाड़ने की...हमने इमरजेंसी का दौर देखा है...कहां है इमरजेंसी सभी कुछ तो ठीक चल रहा है...कहां हो रहा है ऐसे भ्रष्टाचार जिसपर इतनी चीख चिल्लाहाट अन्ना मचा रहे हैं...कहां है....ऐसे हालात की जनता त्राही त्राही कर रही है...इसपर दूसरे ने हां जी हां जी में सिर हिलाते हुए कहा आप ठीक कह रहे हैं...अन्ना बेवजह ही चीख चिल्ला रहे हैं...अन्ना को चाहिए कि वो चुनाव लड़े और संसद में आये और उसके बाद अपनी बात पटल पर रखे....पहले ने इसपर रियेक्ट करते हुए कहा...अगर वो चुनाव भी नहीं लड़ना चाहते तो देश के संविधान पर भरोसा रखे...और एक बहस हो जाने दें...जिसके बाद वो अपनी बात रखे...वाह रे हमारे देश के बुढ़े गिद्दों...तुम्हारी मां.......सालों...
खैर ये तो रही उन लोगों की बात जो समाज के ठेकेदार बनने का दावा करते हैं...अब जरा दिल्ली पुलिस का पूरा बयान पर भी गौर कर लेते हैं......दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता ने पत्रकारों को बताया कि किसी संज्ञेय अपराध की आशंका और शांति भंग की आशंका को देखते हुए अन्ना हज़ारे
, अरविंद केजरीवाल और उनके पांच अन्य सहयोगियों को धारा 107, 151 के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। कमिश्नर बीके गुप्ता के अनुसार किरण बेदी और शांति भूषण सहित क़रीब 14 सौ लोगों को धारा 65 के तहत हिरासत में लिया गया।
क्या अजीब बात है...एक समाजसेवी को दिल्ली पुलिस इसलिए गिरफ्तार कर लेती है...क्योंकि वो आम आदमी की आवाज उठाना चाहता है....उसके साथ आम जनता को इसलिए गिरफ्तार किया जाता है...क्योंकि वो अन्ना की आवाज बुलंद करके देश में एक ऐसा कानून लाना चाहते हैं...जो भ्रष्टाचार को खत्म करने का माद्दा रखता है.....वहीं कांग्रेसी नेता अन्ना को समाज का दुश्मन बताकर अपनी बांहों की आस्तीनों को ऊपर चढ़ाकर कामयाबी का दंभ भर रहे हैं....किसका देश है...ये कौन है ये कुछ लोग...जिन्हें इतने अधइकार मिल गए कि देश में कौन सही कर रहा है कौन गलत....ऐसा क्या कह दिया अन्ना ने जिसपर सरकार के कारिंदों को इतना गुस्सा है...खैर अन्ना अब तिहाड़ में हैं...और मैं यहीं सोच रहा हूं...कि आजादी के 64 साल बाद भी क्या ये देश आम आदमी का देश बन पाया है।