आंखों देखी का हाल तो आपने जान ही लिया, लेकिन इसके अलावा भी एक चीज ऐसी है जो आपको अपनी और आकर्षित कर सकती है वो कुछ और नही बल्कि आंखों देखी की लोकप्रियता है।
मेरा ये अपना अनुभव है कि "आंखों देखी" को लोग किसी देश के मशहूर चैनल से ज्यादा जानते हैं। मैंने आँखों देखी के लिए दिल्ली से बाहर भी रिपोर्टिंग की है और ऐसी जगह की है जहां मुझे लगता था कि यहां आंखों देखी को कोई नही जानता होगा। लेकिन मुझे सबसे ज्यादा ताज्जुब तब हुआ जब उत्तर प्रदेश के ऐटा मैनपुरी के एक गांव में हमारे माइक को देखकर लोगों ने बड़े उत्साह से पूछा कि आप आंखों देखी के पत्रकार हो। हमने कहा हां भाई हम आंखों देखी से हैं, फिर उन्होंने बताया कि हम क्या पूरा उत्तर प्रदेश आंखों देखी को हर दिन बड़े़ ध्यान से देखता है। मुझे ये सुनकर खुशी भी हुई और ये दुख भी। खुशी इसलिये की "आंखों देखी" में किया गया हमारा काम लोगों तक पहुंच रहा है और दुख इसलिये हुआ कि इतनी लोकप्रियता हासिल कर लेना वाला कार्यक्रम कुछ लोगों की गलतनामी और नीयत के चलते खराब होता जा रहा है। अच्छे लोग आंखों देखी में आते नही और पुराने आने की हिम्मत नही करते।
इसमें शायद किसी की कमी नही हैं। असल में मैडम को आंखों देखी जैसे सरकारी चैनल को चलाने के लिए सस्ते लोगों की जरुरत रहती है। ये सस्ते लोग नये प्रशिक्षु होते हैं जो काम की तलाश में भटकते भटकते आंखों देखी चले आते हैं। युवा लोगों की नयी एनर्जी आंखों देखी को सींचती रहती है, इन्हें शहजाद पालता है और समय आने पर यही लोग आंखों देखी का पालन पोषण करते रहते हैं। इससे कार्यक्रम आगे चलता रहता है और
ये ठीक भी है क्योंकि शायद दूरदर्शन भी मैडम के आलावा आंखों देखी को किसी ओर को देना नहीं चाहता। मेरा तो ये भी मानना है कि आंखों देखी के समकक्ष भी दूरदर्शन किसी और को खड़ा नहीं करना चाहता जिससे इस कार्यक्रम को तैयार करने वालों में प्रतिस्पार्धा बढ़े।
वह तो केवल इतना चाहता है कि आंखों देखी पुराने ढर्रे पर चलता रहे और वह सरकार को एक प्राइवेट संस्था को सरकारी खर्च पर चला रहा है इसका ब्यौरा देता रहे। दूरदर्शन के लिए ये सही भी है क्योंकि दूरदर्शन को किसी से किसी तरह की कोई प्रतिस्पार्धा तो करनी नही है। वह एक ऐसा सफेद हाथी है जिसे सरकार पाल रही है और इसमें बैठे कुछ लोग इस हाथी पर सवार होकर मैडम की लगातार चापलूसी करते चले जा रहें हैं। मेरा ये कहना नही है कि वह मैडम का आंखों देखी बंद कर दें या फिर उन्हें इस कार्यक्रम से हटा दें। मेरा महज ये कहना है कि अगर आप बाहर से न्यूज सैगमेंट ले रहें हैं तो नये लोगों को भी उन्हें मौका देना चाहिए। उन्हें दूरदर्शन के लिए ऐसे लोगों को की जरूरत होती है जो सत्ता में किसी न किसी तरह से अपना वर्चस्व कायम किये हुए हैं। असल में हकीकत तो ये है कि दूरदर्शन कार्यक्रम ही केवल उन लोगों को देता है जो सत्ता में स्ट्रोंग रुप से जमें हुये हैं या फिर वह जो क्षेत्र में इतने दमदार है कि वह किसी और को यहां तक फटकने ही नही देते। इसमें दूरदर्शन की कुर्सियों पर बैठे वह तमाम बड़े अफसर भी शामिल होते हैं जो बहुत दफा रौब में और कई दफा पीछे के दरवाजे से मिलने वाली सहायता के लालच में इन्ही लोगों को कार्यक्रम दिये चले जाते हैं।
मैं केवल इतना पूछना चाहता हूं कि क्या इस देश में ऐसा कोई नहीं है जो 'रोजना' और 'आंखों देखी' जैसे कार्यक्रम तैयार नही कर सकता? क्या ऐसा कोई हिंदी पत्रकारिता में पत्रकार नहीं है जो 'आमने-सामने' जैसा प्रोग्राम तैयार नहीं कर सकता? क्या इस पूरे देश में ऐसा कोई नही है जो दूरदर्शन के लिए काम ही नही करना चाहता? ऐसे बहुत से लोग है जो दूरदर्शन के लिये फायदा भी ला सकते हैं और उसे नये आयाम तक भी ले जा सकते हैं। लेकिन हां ऐसे लोग वह है जिनका सत्ता से कुछ लेना देना नही है। वह लोग नये पत्रकार है जो अपना बजूद खोजने की कोशिश में हैं। वह छोटे -छोटे रुप में बड़े काम कर रहें हैं। अगर यहां नाम लेना जरूरी है तो मैं नाम लेकर ही बात करता हूं। क्या 'डीआईजी, कोबरा पोस्ट, तहलका,' ऐसी वह संस्था नहीं हैं जिन्होंने हिंदी और खासकर के खोजी पत्रकारिता को नया आयाम दिया है। अगर दूरदर्शन निष्पक्ष रूप से इन संस्थाओं को न्यूज बूलेटिन बनाने और खोजी पत्रकारिता करने के लिए बढ़ावा दे तो क्या इनमें से कोई है जो काम करने के लिए इंकार कर दें। लेकिन सरकार की ही नीयत में खोट हो तो फिर पत्रकारिता की सेवा करने वाले क्या कर सकते हैं। वह दूरदर्शन में ऐसे लोगों को चाहती है जो उसके तलवे चाटते रहें। वह उनकी वाह वाही में रात दिन एक कर दें। इसका सीधा सा अर्थ है कि दूरदर्शन ये चाहता ही नहीं है कि वह निष्पक्ष पत्रकारिता करें। वह तो केवल सरकारी पिठ्ठू बना रहना चाहता है। शायद यही कारण भी रहा है कि दूरदर्शन लगातार हर सरकार के लिए घाटे का सौदा ही साबित हुआ है। हालांकि दूरदर्शन के पास आज किसी भी देश के दूसरे चैनल से ज्यादा उम्दा उपकरण और तकनीके हैं, लेकिन वह केवल डब्बों में बंद ही रहती है। वह किसी के काम नही आती। ज्यादा से ज्यादा इसका प्रयोग देश में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में होता है या फिर ऐसी राजनैतिक रैलियों में जिनका संबंध देश की सत्ता से होता है।
ये तो बात थी, दूर से दर्शन करने वाले दूरदर्शन की, लेकिन फिलहाल हमारा विषय दूरदर्शन नहीं "आंखों देखी" है। तो आंखों देखी की लोकप्रियता आपके प्रभावित कर सकती है। ऐसा इसलिये भी है कि आंखों देखी में जो भी काम करता है वह यह सोचकर करता है कि उसके जीवन का ये पहला कदम है और वह इस कदम के मजबूती से रखना चाहता है। इसका फायदा नये लोगों को भी होता है और आंखों देखी को भी।
नये लोगों के लिए मेरा ये कहना है कि अगर वह आंखों देखी को अपना पहला कदम बनाने की बात सोचते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन वह केवल इसे एक ऐसे संस्थान के रुप में लें जहां वह मात्र 30 दिन तक रहें। इतने दिनों में वह लगभग इलैक्ट्रोनिक मीडिया की बारिकियां जान ही जायेंगे। इसके बाद वह अपना नया टारगेट खोज लें। क्योंकि आंखों देखी किसी भी नये पत्रकार या पुराने का भी "लक्ष्य" तो हो ही नही सकता। अगर फिर भी कोई इसे अपना लक्ष्य बनना ही चाहे तो भैय्या इसमें हम तो इतना ही कह सकते हैं कि ठीक है हर किसी को मुकम्मल जहां नही मिलता सभी को आजतक और स्टार न्यूज नहीं मिलता।
लेकिन नये लोगों से मेरा यही निवेदन है कि आज उनके लिये बहुत से ऑप्सन हैं। वह सीधे चैनलों को एपरोच कर सकते हैं। उन्हें यहां जाने की जरूरत ही नहीं हैं।
देश में आज ऐसे बहुत से नये और पुराने चैनल हैं जो नये लोगों को प्रशिक्षण और फिर नौकरी देने से गुरेज नहीं करते। इन चैनलों में ऐसे लोग भी है जो नये लोगों की कद्र करना जानते हैं। यहां मैं उन लोगों की ही बात करूं तो न्यूज 24 में अजीत अंजूम, इंडिया टीवी में प्रशांत टंडन और स्टार न्यूज में साजी ऐसे लोगों में से हैं जो नये लोगों को हाथों हाथ लेते हैं और उन्हें काम करने का मौका भी देते हैं। सहारा खुले तौर पर नये लोगों की भर्ती करता है तो जी न्यूज की वेबसाइट से ही आप नौकरी पा सकते हैं। इसके अलावा आज इंडिया न्यूज तो नये लोगों पर ही चल रहा है। हां ऐसे देश में दो चैनल हैं जिनके अंदर जाना बेहद मुश्किल है। पहला है एनडीटीवी इंडिया और दूसरा है आईबीएन7। ये दोनों ही ऐसे चैनल हैं जहां "बाबाओं" का जमधट है। यहां पर आपको उपदेश मिलेंगे लेकिन काम नही। हां अगर आपकी पहुंच है और आप किसी के भाई भतीजे या फिर जानकार है तो आपको कहीं भी काम मिल ही जायेगा। एनडीटीवी इंडिया में तो नये लोगों के लिए काम लगभाग है नही। मैंने पिछले कई सालों से नही देखा कि इस चैनल ने खुले तौर पर कभी नये लोगों को अपने यहां काम देने की बात कही हो। हां अगर यहां पर भी आपका अगर कोई हितेषी (जुगाड़) है तो आपको यहां क्या देश के किसी भी बड़े चैनल में काम मिल ही जायेगा। बाकी यहां अधिकतर लोग ऐसे परिवारों से हैं जिनके लिय़े पत्रकारिता मिशन नही बल्कि ऐसा काम है जिससे उन्हें लोकप्रियता मिलती है और समाज में इज्जत। इस काम को वह इसलिये भी करते हैं कि राजनीति में लोग उनके नाम को पहचाने।
इसमें से कुछ लोग तो खबरियां चैनल के माध्यम से अगले चार पांच साल में देश के किसी छोटे राज्य के मुख्यमंत्री तक बनने के सपने देख रहें हैं। अगर आज आपको मेरी बात का यकीन नहीं हो रहा तो ये मेरा दावा है कि अगले चार पांच सालों में गोवा का मुख्यमंत्री देश का ऐसा पत्रकार होगा जिसे लोग आज हर दिन टीवी पर देखते हैं। इस पत्रकार ने गोवा में अपने आपको इस तरह से परमोंट करना आरंभ किया है कि गोवा के लोगों की सोच अब इस पत्रकार के पक्ष में जा रही है। ये पत्रकार हफ्ते के दो दिन यही पाया जाता है। तो आज पत्रकारिता महज सत्ता पाने का हथियार ही नही है बल्कि इस देश पर राज करने का औजार भी होती जा रही है। ऐसे में ये चैनल नये लोगों को काम कैसे दे सकते हैं।
नये लोगों को अपने लिये ऐसे संस्थानों का चयन करना चाहिए जो उनके काम को सराहे भी और समय आने पर उनकी मदद भी करे। मेरा ये कहना है कि आज के युवा उन चैनलों को देखें जो नये हैं क्योंकि नये चैनल बेशक अभी खड़े हो रहें हैं लेकिन जब वह पूरी तरह से खड़े हो जायेंगे तो इनसे जुड़े नये लोगों को भी वह स्थापित कर देगा। ऐसे में नये लोगों को पहचान भी मिलेगी और काम भी।
अब मैं यहां बताना चाहूंगा कि इलैक्ट्रोनिक मीडिया में संपादक जिसे बहुत सी जगह ईसी यानी एडिटोरियल चीफ या फिर असाइनमेंट हैड के रूप में पहचाना जाता है, किस तरह की रिपोर्टिंग चाहता है। अगर आप आंखों देखी में काम कर रहें हैं तो शहजाद आपसे चाहेंगा कि आप कोई ऐसी सनसनी लेकर आओं जो देखने वालों में कपकपी पैदा कर दे। अगर आप कहीं और हैं तो आपको पहले अपनी बीट को समझना होगा। बीट से मेरा मतलब ये है कि जब आप कही भी काम करते हैं तो वहां के हेड आपसे ये जरुर पूछेगा कि आपका सबजेक्ट क्या रहा है। अगर आप विज्ञान के छात्र रहें हैं तो आपको ऐसी रिपोर्टिंग दी जा सकती है जो विज्ञान की खबरों से जुड़ी हो, अगर आप अर्थ या व्यापार में जानकारी रखते हैं तो आपको बिजनेस रिपोर्टिंग दी जा सकती है। इसके अलावा राजनैतिक और अपराध बीट पर हर आदमी काम करना ही चाहता है। क्योंकि देश का हर एक नया युवा ये मानकर चलता है कि उसे दो ही चीजों की सही जानकारी है। पहली राजनीति की दूसरी देश के अपराध की, लेकिन ये हमेशा सही नही होता। अक्सर जोश में हम ये भूल जाते हैं कि हम असल में किस विषय की जानकारी रखते हैं। हम वही करने लग जाते हैं जिसकी सबसे ज्यादा डिमांड होती है। ऐसा जब होता है तभी नये लोगों का ह्रास होना आरंभ हो जाता है। क्योंकि नये लोग ये नहीं समझ पाते कि वह कौन सा कार्य है जिसे वह आसानी से कर सकते हैं। वह ये समझते हैं कि वह एक पत्रकार हैं जो सभी कुछ जानता है। ऐसा जब कभी भी होता है तभी नये लोग "बाइट सोल्जर" बनते चले जाते हैं। वह फिर ना तो अपने द्वारा सोची गयी स्टोरी को सही रुप दे पाते हैं और न ही अपनी सोच के मुताबिक स्टोरी ही लिख पाते हैं। वह अपने विषय से भटकते चले जाते हैं और एक ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां वह पत्रकारिता में मात्र एक कामगार बनकर रह जाते हैं। मेरा ये कहना है कि हमें वही काम करना चाहिए जिसे हम अच्छी तरह से कर सके। ऐसा ना हो कि कार्य करते रहने के बाद हम अपने आप से कहें कि यार उस फलां आदमी ने कहां फंसा दिया।
पत्रकारिता का नाम ही फंसना है और फिर उससे बाहर आना। जी हां, पत्रकारिता का मतलब ही है कि हम ऐसे विषय उठाये जिनकी जानकारी साधारण आदमी को न हो, हम उन तक वह खबर पहुंचाये जिससे वह अनिभिज्ञ हैं। हमारा काम ही है कि ऐसी जानकारियां लेकर आये जिससे समाज को अपने आपको देखने और समझने का मौका मिले।
नये लोगों को चाहिए कि वह ऐसी दमदार रिपोर्टिंग करें जिससे उनके कैरियर को दिशा मिले ना कि वह उन्हें अंधेरे में ले जाये। क्रमश:
कहने के लिए कभी कभी हमारे पास शब्द नहीं होते और कभी माध्यम, लेकिन कहना तो है। क्योंकि मरना तय है और मरते वक्त दिल में कोई बात रह जाये तो फिर उस जीवन का मतलब ही क्या? इसलिए अपने दिल की बात कहो और अगर कोई न सुने तो शोर मचा कर कहो ताकि अंतिम समय दिल यहीं कहे कि अब बस बहुत हुआ अब शांत हो जाओ।
Thursday, March 4, 2010
आंखों देखी -2
आंखों देखी का आंखों देखा हाल

ब्लोगर जगत में पहले कदम के साथ में भी अब ब्लोगर दुनिया का हिस्सा हो चला हूं। यूं तो मैं लिखने की कई सालों से कोशिश में था, लेकिन ब्लोगर की पूरी जानकारी नहीं होने और अपने हाथ में कम्प्यूटर नहीं होने की वजह से शायद मुझे ब्लोगर लिखने में देरी हुई। लेकिन आज मैं भी ब्लोगर की दुनिया का हिस्सा हूं। मुझे इस बात की आज बेहद खुशी है और अपनी किस्मत पर फक्र है कि आज हमारे हाथ मे ब्लोगर जैसी ताकत है जिसके माध्यम से हम अपने दिल की बात सारी दुनिया के सामने ऱख सकते हैं। लोगों से न सिर्फ बातें कर सकते हैं बल्कि उनसे अपनी समझ और ख्यालातों पर राय भी बेहद सुलभ और आसन तरीके से प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अपने ब्लोगर की शुरूआत बेहद खास तरीके से करने की कोशशि की है, मेरा ये मानना है कि पहले आदमी को अपने पर बीती हुई चीजों को अपने सामने रख लेना चाहिए, इससे होता ये है कि आप अपने आपको ठीक से देख पाते हैं।
इसका अर्थ ये भी हो सकता है कि आप अपने सामने एक ऐसा आईना रख लेते हैं जिसमें आपकी शख्सियत बिल्कुल साफ- साफ दिखाई देती है।
मैं पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में अपबीती अपने ब्लोगर पर रखने जा रहा हूं, साथ ही मैं इस बात को भी यहां साफ करना चाहूंगा कि ये मेरे अपने पत्रकारिता के अनुभव हैं और ये उस समय की बातें हैं जब में पत्रकारिता आरंभ कर ही रहा था। मैं एक प्रशिक्षु था तो मेरे लिए ये भी आवश्यक था कि मैं पहले अपने प्रोफेशनल की आस पास की चीजों को ज्यादा से ज्यादा समझ लूं। मेरा पत्रकारिता का शुरूआती अनुभव कुछ ज्यादा अच्छे नहीं रहें। मैं लगातार आजतक ये ही सोचता रहा कि आखिर युवा पत्रकारिता में आने से पहले इसके नफे नुकसान क्यो नहीं सोचते। इसीलिये शायद मैंने अपने ब्लोगर में “पत्रकारिता का सच” पेश करने की कोशिश की है। ये वो सच है जिसें मैं आज ज्यादा पास से जानता हूं। क्योंकि राह पार कर चुका पथिक ही रास्ते की सही जानकारी दे सकता है।
मेरा मकसद अपने ब्लोगर के माध्यम से नये लोगों को पत्रकारिता की जानकारी देना मात्र है, साथ ही उन लोगों के चेहरे “बेनकाब” करना भी है, जो पत्रकारिता की आढ़ में “दलाली” करते हैं और देश के लोगों को गुमराह करते रहें हैं और लगातार कर रहें हैं।
पत्रकारिता उन लोगों के लिए मिशन नहीं है बल्कि हाथ में आयी वो तलवार है जिसके आधार पर वह इस देश पर राज करना चाहते हैं।
मेरा अपनी आने वाली पत्रकारिता की पीढ़ी से अनुरोध है कि वह इन लोगों से सावधान रहें और अपना कैरियर इनके माध्यम से आरंभ न करें। क्योंकि ये वह लोग हैं जो आज भी सामांतवादी सोच के शिकार हैं। ये ऊपर से बहुत सभ्य दिखाई देते हैं, लेकिन ये वह इंसानी भे़ड़िये हैं जो समाज को तो नोच-नोच कर खा ही नहीं रहें बल्कि पत्रकारिता का चीर हरण करके उसका लगातार परिहास उड़ा रहें हैं।
मेरे साथियों मेरा आपसे अनुग्रह हैं कि आप अपनी राह चुनने से पहले ये अवश्य तय कर लें कि आखिर आपको जाना कहां हैं।
हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी कम बूरे और बहुत अच्छे लोग हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि बहुत से अच्छे लोग होने के बाद भी पत्रकारिता में कोई किसी की मदद नहीं करता और हिंदी पत्रकारिता में तो बिल्कुल भी नहीं।
वैसे भी हिंदी के लोग कुछ ज्यादा ही “समझदार” होते हैं, वह हमेशा ये कोशिश करते हैं कि उनके नीचे का आदमी कभी ऊपर न आये। यहां मुझे एक दोस्त जो इन दिनों आजतक में कार्य करता है। वह कहा करता था कि “किसी बड़े होने से कोई छोटा नहीं होता” लेकिन पत्रकारिता में अगर कोई बड़ा हो जाता है तो वह अपने से नीचे वाले को तो कम से कम कभी बड़ा नहीं होने देगा। ये मेरा मानना भी है और दृण विश्वास भी कि कभी भी अपने सबसे पास के आदमी पर पत्रकारिता में विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि वही आदमी आपके बॉस से आपकी चुगली कर आयेगा और आपकी नौकरी खा जायेगा। पत्रकारिता में कुछ लोग ऐसे भी है जो जिंदगी की हर राह पर आपको अपने पास खड़े हुये दिखाई देंगे।
खैर ये अपने – अपने व्यक्तिगत अनुभव की बातें हैं।
मैं आपको पहले अपनी पहली नौकरी “आंखों देखी” के बारे में बताना चाहूंगा। आंखों देखी का मेरे लिये ऐसा अनुभव है कि उसका भूत आजतक मेरे सर पर सवार है। मैं जब भी अपनी आंखें बंद करता हूं मुझे आंखों देखी का वह बीता एक- एक पल ताजा हो आता है जो वहां बीता। हालांकि मेरी दूसरी नौकरी आंखों देखी की बदौलत ही थी, लेकिन कहते हैं ना पहली गर्लफ्रेंड, पहली बेचलर पार्टी और पहली रात आदमी ताउम्र नहीं भूलता। इसीलिये मैं भी आंखों देखी को अपनी गर्लफ्रेंड मान चुका और ये भी मान चुका की ये वही गर्लफ्रेंड है जो कालेज में समोसा-चाय तो मेरी ही पाकेट से खाया करती थी लेकिन कालेज के बाद जीवन की तपती धरती पर पैर रखने से पहले ही किसी रहीस जादे की गोद में जा बैठी।
मैंने सन् 2000 में अपनी दैनिक हिदुंस्तान से इंटर्नशिप पूरी की, चूंकि इलैक्ट्रोनिक मीडिया भी उन दिनों देश के दरबाजे पर मजबूती से दस्तक दे ही रहा था। इसलिये हमने भी मौका देखकर चौका मारा और आंखों देखी में इंटर्नशिप करने के लिये जा पहुंचे। यहां पहले दिन हमें श्री दुष्यंत कुमार जी मिले जो आंखों देखी के उन दिनों ब्यूरो हेड थे, इनके साथ ही अनंत मित्तल भी कार्यरत थे। चूंकि मेरी पहली मुलाकात दुष्यंत कुमार जी से ही हुई थी, तो मैं दुष्यंत कुमार जी के ही निकट था। आंखों देखी में उन दिनों मेरे कई साथी रहें उनमें से दिनेश पाठक भी थे जो आज भी कहने के लिए मेरे दोस्त हैं। वह आज भी आंखों देखी की सेवा में हैं। सुना है इनदिनों वहीं आंखों देखी के ब्यूरो चीफ हैं।
मैं अपने ब्लोगर में केवल पत्रकारिता की बात ही करूंगा, इसमें मैं पहले अपने अनुभव इस ब्लोगर के माध्यम से आप लोगों के सामने रखने जा रहा हूं। मैं चाहता तो बहुत कुछ लिखना हूं। लेकिन ब्लोगर आरंभ में केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि मेरे ब्लोगर को कृपया वह लोग न पढ़े जो ये मानते है कि पत्रकारिता महज एक कार्य है।
मेरा मानना है कि पत्रकारिता केवल रोजी रोटी का जरिया ही नहीं है बल्कि ये वह ताकत है जिसके साहरे हम युवा लोग इस देश का तरक्की की राह दिखा सकते हैं।
चूंकि मैं एक हिंदी पत्रकार भी हूं तो मेरा मिशन हिंदी की सेवा करना भी है और हिंदी की सेवा तभी संभव है जब इंटरनेट बाबा की शरण में हिंदी में ज्यादा से ज्यादा काम होगा। मैं कोशिश करूंगा कि इंटरनेट बाबा की शरण में हिंदी में जमकर लिखू और अपनी आने वाली पीढ़ी को यानी पत्रकार बंधुओं को वह समस्त जानकारी उपलब्ध करवाऊ जिसकी उन्हें अक्सर आवश्यकता रहती है।
इन सभी का खुलासा में आगे करूंगा पहले आंखों देखी से निपट लिया जाये। मेरी पहली नौकरी आंखों देखी में थी। जिस दिन इंटर्शिप पूरी हुई उसी दिन शहजाद साहब जो मैडम के दाये बाये सारे हाथ हैं ने हमारे सर पर हाथ रखकर हमे आर्शीवाद की मुद्रा में कहा। जाओ बच्चा तुम्हारा कल्याण हो गया। हम और मैडम तुम्हारे काम से बहुत खुश है। तुमने जो कारनामा अपने इंटर्नशिप के दौरान किये और एक नयी खबर बड़ी ही रोचक ढ़ंग से की उसके बदले तुम्हे नौकरी दी जाती है। तुम्हे साढ़े तीन हजार के मासिक वेतन पर रखा जा रहा है और तीन महीने बाद ये तनख्वाह दो-गुना बढ़ा दी जायेगी, लेकिन शर्त यही है कि तुम इसी तरह की स्टोरी लाते रहोगें और मैडम के साथ - साथ हमे भी खुश रखोगें। मैं मुर्ख अज्ञानी पहले इन बातों को समझ ही नहीं पाया कि मान्यवर शहजाद क्या कह रहें हैं। हम तो समझे खुश का मतलब मेहनत से काम करना होता है। हमने जब ये खबर अपने माता पिता को सुनाई तो हमारी माता ने उस दिन मंदिर जाकर दस रूपये का प्रसाद बांटकर भगवान के समक्ष हमारी कामयाबी की दुआ मांगी और हमने भी उनकी आंखों में आंखों देखी की दया को आंसूओं के रूप में देखा। मेरे बूढ़े बाप ने अपनी 502 पताका बीढ़ी का लंबा कस लेकर और दम साधकर मेरी मां से कहां। अजी सुनती हो अब अपना लोंडा भी कमाने लगा, अब तो घर में मुझे अराम करने ही दिया करेगी तू। मैं भी यह बात सुनकर खुश था कि अब मुझे नौकरी मिल गयी है। दूसरे दिन मैं बड़े ही जोश से अपने दफ्तर पहुंचा और पहुंचते ही मान्यवर शहजाद जी के चरण स्पर्श करके नमस्कार करके बोला, सर आपका मेरे ऊपर बड़ा उपकार है। आप ही है जिन्होंने मेरी प्रतिभा को समझा है बस आप मुझे आर्शीवाद प्रदान कर दो फिर देखना मे पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे झंडे गाढ़ता हूं मेरी बातों पर मुस्कुराते हुए मान्यवर शाहजाद उर्फ आंखों देखी के वीडीयो एडिटर यानी टेक्नीकल आदमी जो दसवीं फेल हैं और पत्रकारिता किस परिंदे का नाम हैं ये उन दिनों नहीं जानता था ने अपनी आंखे ऊपर चढ़ाते हुये कहा। बेटा आर्शीवाद तो हमने तुम्हें दे ही दिया है, लेकिन आज से एक बात का ध्यान रखना कि स्टोरी आपने पहले मुझे दिखानी है हमारे ब्यूरो चीफ दुष्यंत और आनंत मित्तल को अपनी स्टोरी नहीं देनी है। हमें एक दम से तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन शाम तक समझ में आ गया जब अनंत मित्तल और दुष्यंत जी आंखों देखी को अलविदा कह गये। अब हमारी समझ में पहले ही दिन आ गया कि हमे एकदम से नौकरी पर क्यों रख लिया गया था। थोड़ा बहुत हम लिख ही लिया करते थे, बाकी कहानी पर मैडम कलम चला ही लिया करती है। आंखों देखी में हमारे साथ वाली कुर्सी पर ही हमारे दोस्त हैं दिनेश पाठक वो आज तक उसी कुर्सी पर हैं जहां हम उन्हें छोड़ गये थे क्योंकि वह वो करने में एक्सपर्ट हो गये जो हम आजतक नहीं सीख पाये। खैर हम काम करते रहें महीना बीता सभी की तनख्वाह मिली, लेकिन हमें नहीं मिली। इसका कारण जब हमने शहजाद जी से पूछा तो उन्होंने कहा तुम्हारा नाम अकाउंट सेक्शन में अपडेट नहीं हुआ इसलिये इसबार चैक नहीं बना अगले महीने बन जायेगा। हमने सोचा चलो वैसे भी 20 तारीख तो हो ही गयी है। अगला महीना भी आया जाता है। अगला महीना आया और अगले महीने तक हम भी पूरी तरह से पक चुके थे। घर पर जबाव देकर भी और दफ्तर में फोकट में काम करते करते भी। फिर अगले महीने की 10 तारीख आयी सभी को चैक मिल गया, मुझे फिर नहीं मिला। मैंने इसबार अकाउंट सेक्शन में इस बारे में मालूमात किया जो मेरी ही सीट के सामने मौजूद था जो रिसेप्सन भी था। वहां एक दक्षिण भारतीय व्यक्ति बैठा करते थे जिनका नाम राजन था। उन्हें ना तो अंग्रेजी आती थी और ना ही हिंदी। मैं पिछले तीन महीने से सोच रहा था कि इस आदमी को यहां क्यों रखा गया है। इस बात का पता भी मुझे उस दिन चल गया। मैंने पूछा मेरे चैक का क्या हुआ तो वह व्यक्ति मुझे देखकर थोड़ी देर तक तो हंसता रहा। मुझे लगा जैसे उसकी समझ में चैक का मतलब कुछ और तो नहीं आया मैंने इशारे से कहा मेरे चैक का क्या हुआ। तो वह बोला मुझे नहीं मालूम जाकर शहजाद से पूछो। मैं जब शहजाद के पास गया तो वह बोला कि अकाउंट में बात करो जब अकाउंट पर गया तो वह फिर बोला तुम क्या चैक चैक कर रहें हो मेरी समझ में नहीं आता। मुझे हिंदी नहीं आता। मैं बोला लेकिन तुम इतना तो समझते ही हो कि मैं क्या बात कर रहा हूं। वह अपने लंबे दांत दिखाकर मुस्कुराते हुआ बोला लेकिन भाई मेरे, मुझे जब तक समझ में नहीं आता जब तक शहजाद मुझे साइड में ले जाकर नहीं समझा देता। मेरी समझ में अब तक आ चुका था कि शायद घी सीधी ऊंगली से नहीं निकलेगा। इस बीच हमारे संगी साथी "आंखो देखी" के हमारे अंदर हवा भर ही चुके थे, जिसमें नईम और आंखों देखी के क्राइम रिपोर्टर शमशाद अली खास थे। हवा इन्होंने क्यों भरी इसका अंदाजा भी हमें हो चला था। क्योंकि नईम हिंदी में रिपोर्टिग नहीं कर पाता था। शमशाद को अंग्रेजी नहीं आती थी। इसलिये इन दोनों कि हमसे ......................थी? लेकिन हमने सोचा यह भी ठीक कह रहें हैं। अब भला कोई फ्री में कब तक कोई काम कर सकता है। लेकिन मैडम कि एक आदत थी वह जब तक किसी रिपोर्टर को रूला नहीं लेती और उससे अपनी रात दिन जी हुजूरी नहीं करवा लेती वह उसे नौकरी पर नहीं रखती और ये दोनों ही चीजे हमने पिछले चार महीनें में नहीं की। जब हर चीज की हद हो गयी और मैं पक गया, तो मैं मैडम के कमरे में गया और मैंने कहा। मैडम मेरा नाम जासूस पर्दाफाश करमचंद है और मैं आपके संस्थान में काम करता हूं।
इसपर मैडम ने बड़े ही रौबदार अंदाज में कहा, तो फिर मैं क्या करू कि तुम्हारा नाम जासूस पर्दाफाश करमचंद है या फिर कुछ और, मैंने घिघियाते हुए कहा मैडम मैंने इस दिवाली पर आंखों देखी के लिए एनटीपीसी दादरी से एक ब्रेकिंग स्टोरी की थी जिसपर आंखों देखी को काफी वाह वाही मिली है। मैडम बोलीं हां ये बात मैं जानती हूं आप मुझे ये बात क्यों बता रहें हैं। मैंने कहां मैंडम मेरे साथ के सारे स्टाफ को अपनी तनख्वाह मिल गयी, लेकिन मुझे पिछले दो महीने से नहीं मिल रही है। उन्होंने पूछा तुम्हे नौकरी ज्वाइन किये कितना समय हुआ है। मैंने कहा दो महीने। मैडम ने पूछा तुम्हे रखा किसने हैं, मैंने कहा शहजाद जी ने। मैडम ने कहा, जब शहजाद ने रखा है तो तनख्बाह भी तो वही देगा, मैं तुम्हे नहीं जानती की तुम मेरे यहां नौकरी करते हो। मैंने कहा मैडम मैं चार महीने से आप के यहां हूं आपको यह नहीं पता कि मैं यहां क्यों हूं। मैडम ने साफ कहा मेरे यहां लोग सालों साल से हैं, लेकिन मैं उन्हें भी नहीं जानती तो तुम कौन हो, और हां अब मेरा समय खराब मत करो और दफा हो जाओ। मैं धीरे से मैडम के कमरे से बाहर हो गया और बाहर आकार शहजाद से बोला भाई साहब आपके बारे में सुना बहुत कुछ था लेकिन आज जान भी लिया। अब ईश्वर से यही दुआ करेंगे कि आप जैसा आदमी हमें इस फील्ड मैं ना मिले। इसपर शहजाद ने अपने खींसे निपुरते हुये कहा। हमारा काम है मैडम का काम करना और वो भी मुफ्त में, अगर नहीं करेंगे तो हमारी गाड़ी में तेल नहीं पड़ेगा। मेरे भाई तू मुझे ऐसी धमकी मत दे कि मुझसे मुलाकात नहीं होगी। मैं तो तुम्हे हर मोड़ पर मिलने वाला हूं। हां ये बात अलग है कि दूसरी जगह दूसरी सूरत और नाम का आदमी मिलेगा, लेकिन मिलूंगा मैं ही। मैं आंखों देखी को छोड़ आया और सोचता रहा कि क्या शहजाद सही कह रहा है।
क्योंकि जीवन के सात साल पत्रकारिता को समर्पित करने के बाद आज मैं एक ऐसे संस्थान के साथ हूं जहां मेरे काम को सराहा भी जाता है और मुझे भी पूरा सम्मान मिल रहा है। पैसा पत्रकारिता में चैनल में भर्ती होने के बाद या फिर किसी रैकेट यानी 'पत्रकारिता की दलाली' करने के बाद ही आता है।
इस बात को बताने में या कहने में मुझे अब कोई डर इसलिये नहीं लगता कि अब मैं मान चूका की समस्त टीवी चैनल और अखबार वाले मुझे नौकरी नहीं देने वाले। जिसने मेरे और मेरे बच्चों का दाना पानी देना था, उसे मेरे काम से कोई शिकायत नही है। यानी अब मैं एक ऐसे पवित्र और अच्छे संस्थान में हूं जहां मेरी और मेरे काम की इज्जत होती है। एक पत्रकार को यही चाहिए भी होता है और रही बात पैसों की तो मैं ये मानता हूं कि पैसें तो रेड लाइट पर खड़ा भीखारी भी कमा लेता है, लेकिन इज्जत और सम्मान से मिली सूखी रोटी में शहद की मिठास होती है। ये मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे आज एक ऐसा संस्थान मिला है जो मुझे ये दोनों चीजे प्रदान कर रहा है।
क्रमश:
मैंने अपने ब्लोगर की शुरूआत बेहद खास तरीके से करने की कोशशि की है, मेरा ये मानना है कि पहले आदमी को अपने पर बीती हुई चीजों को अपने सामने रख लेना चाहिए, इससे होता ये है कि आप अपने आपको ठीक से देख पाते हैं।
इसका अर्थ ये भी हो सकता है कि आप अपने सामने एक ऐसा आईना रख लेते हैं जिसमें आपकी शख्सियत बिल्कुल साफ- साफ दिखाई देती है।
मैं पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में अपबीती अपने ब्लोगर पर रखने जा रहा हूं, साथ ही मैं इस बात को भी यहां साफ करना चाहूंगा कि ये मेरे अपने पत्रकारिता के अनुभव हैं और ये उस समय की बातें हैं जब में पत्रकारिता आरंभ कर ही रहा था। मैं एक प्रशिक्षु था तो मेरे लिए ये भी आवश्यक था कि मैं पहले अपने प्रोफेशनल की आस पास की चीजों को ज्यादा से ज्यादा समझ लूं। मेरा पत्रकारिता का शुरूआती अनुभव कुछ ज्यादा अच्छे नहीं रहें। मैं लगातार आजतक ये ही सोचता रहा कि आखिर युवा पत्रकारिता में आने से पहले इसके नफे नुकसान क्यो नहीं सोचते। इसीलिये शायद मैंने अपने ब्लोगर में “पत्रकारिता का सच” पेश करने की कोशिश की है। ये वो सच है जिसें मैं आज ज्यादा पास से जानता हूं। क्योंकि राह पार कर चुका पथिक ही रास्ते की सही जानकारी दे सकता है।
मेरा मकसद अपने ब्लोगर के माध्यम से नये लोगों को पत्रकारिता की जानकारी देना मात्र है, साथ ही उन लोगों के चेहरे “बेनकाब” करना भी है, जो पत्रकारिता की आढ़ में “दलाली” करते हैं और देश के लोगों को गुमराह करते रहें हैं और लगातार कर रहें हैं।
पत्रकारिता उन लोगों के लिए मिशन नहीं है बल्कि हाथ में आयी वो तलवार है जिसके आधार पर वह इस देश पर राज करना चाहते हैं।
मेरा अपनी आने वाली पत्रकारिता की पीढ़ी से अनुरोध है कि वह इन लोगों से सावधान रहें और अपना कैरियर इनके माध्यम से आरंभ न करें। क्योंकि ये वह लोग हैं जो आज भी सामांतवादी सोच के शिकार हैं। ये ऊपर से बहुत सभ्य दिखाई देते हैं, लेकिन ये वह इंसानी भे़ड़िये हैं जो समाज को तो नोच-नोच कर खा ही नहीं रहें बल्कि पत्रकारिता का चीर हरण करके उसका लगातार परिहास उड़ा रहें हैं।
मेरे साथियों मेरा आपसे अनुग्रह हैं कि आप अपनी राह चुनने से पहले ये अवश्य तय कर लें कि आखिर आपको जाना कहां हैं।
हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी कम बूरे और बहुत अच्छे लोग हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि बहुत से अच्छे लोग होने के बाद भी पत्रकारिता में कोई किसी की मदद नहीं करता और हिंदी पत्रकारिता में तो बिल्कुल भी नहीं।
वैसे भी हिंदी के लोग कुछ ज्यादा ही “समझदार” होते हैं, वह हमेशा ये कोशिश करते हैं कि उनके नीचे का आदमी कभी ऊपर न आये। यहां मुझे एक दोस्त जो इन दिनों आजतक में कार्य करता है। वह कहा करता था कि “किसी बड़े होने से कोई छोटा नहीं होता” लेकिन पत्रकारिता में अगर कोई बड़ा हो जाता है तो वह अपने से नीचे वाले को तो कम से कम कभी बड़ा नहीं होने देगा। ये मेरा मानना भी है और दृण विश्वास भी कि कभी भी अपने सबसे पास के आदमी पर पत्रकारिता में विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि वही आदमी आपके बॉस से आपकी चुगली कर आयेगा और आपकी नौकरी खा जायेगा। पत्रकारिता में कुछ लोग ऐसे भी है जो जिंदगी की हर राह पर आपको अपने पास खड़े हुये दिखाई देंगे।
खैर ये अपने – अपने व्यक्तिगत अनुभव की बातें हैं।
मैं आपको पहले अपनी पहली नौकरी “आंखों देखी” के बारे में बताना चाहूंगा। आंखों देखी का मेरे लिये ऐसा अनुभव है कि उसका भूत आजतक मेरे सर पर सवार है। मैं जब भी अपनी आंखें बंद करता हूं मुझे आंखों देखी का वह बीता एक- एक पल ताजा हो आता है जो वहां बीता। हालांकि मेरी दूसरी नौकरी आंखों देखी की बदौलत ही थी, लेकिन कहते हैं ना पहली गर्लफ्रेंड, पहली बेचलर पार्टी और पहली रात आदमी ताउम्र नहीं भूलता। इसीलिये मैं भी आंखों देखी को अपनी गर्लफ्रेंड मान चुका और ये भी मान चुका की ये वही गर्लफ्रेंड है जो कालेज में समोसा-चाय तो मेरी ही पाकेट से खाया करती थी लेकिन कालेज के बाद जीवन की तपती धरती पर पैर रखने से पहले ही किसी रहीस जादे की गोद में जा बैठी।
मैंने सन् 2000 में अपनी दैनिक हिदुंस्तान से इंटर्नशिप पूरी की, चूंकि इलैक्ट्रोनिक मीडिया भी उन दिनों देश के दरबाजे पर मजबूती से दस्तक दे ही रहा था। इसलिये हमने भी मौका देखकर चौका मारा और आंखों देखी में इंटर्नशिप करने के लिये जा पहुंचे। यहां पहले दिन हमें श्री दुष्यंत कुमार जी मिले जो आंखों देखी के उन दिनों ब्यूरो हेड थे, इनके साथ ही अनंत मित्तल भी कार्यरत थे। चूंकि मेरी पहली मुलाकात दुष्यंत कुमार जी से ही हुई थी, तो मैं दुष्यंत कुमार जी के ही निकट था। आंखों देखी में उन दिनों मेरे कई साथी रहें उनमें से दिनेश पाठक भी थे जो आज भी कहने के लिए मेरे दोस्त हैं। वह आज भी आंखों देखी की सेवा में हैं। सुना है इनदिनों वहीं आंखों देखी के ब्यूरो चीफ हैं।
मैं अपने ब्लोगर में केवल पत्रकारिता की बात ही करूंगा, इसमें मैं पहले अपने अनुभव इस ब्लोगर के माध्यम से आप लोगों के सामने रखने जा रहा हूं। मैं चाहता तो बहुत कुछ लिखना हूं। लेकिन ब्लोगर आरंभ में केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि मेरे ब्लोगर को कृपया वह लोग न पढ़े जो ये मानते है कि पत्रकारिता महज एक कार्य है।
मेरा मानना है कि पत्रकारिता केवल रोजी रोटी का जरिया ही नहीं है बल्कि ये वह ताकत है जिसके साहरे हम युवा लोग इस देश का तरक्की की राह दिखा सकते हैं।
चूंकि मैं एक हिंदी पत्रकार भी हूं तो मेरा मिशन हिंदी की सेवा करना भी है और हिंदी की सेवा तभी संभव है जब इंटरनेट बाबा की शरण में हिंदी में ज्यादा से ज्यादा काम होगा। मैं कोशिश करूंगा कि इंटरनेट बाबा की शरण में हिंदी में जमकर लिखू और अपनी आने वाली पीढ़ी को यानी पत्रकार बंधुओं को वह समस्त जानकारी उपलब्ध करवाऊ जिसकी उन्हें अक्सर आवश्यकता रहती है।
इन सभी का खुलासा में आगे करूंगा पहले आंखों देखी से निपट लिया जाये। मेरी पहली नौकरी आंखों देखी में थी। जिस दिन इंटर्शिप पूरी हुई उसी दिन शहजाद साहब जो मैडम के दाये बाये सारे हाथ हैं ने हमारे सर पर हाथ रखकर हमे आर्शीवाद की मुद्रा में कहा। जाओ बच्चा तुम्हारा कल्याण हो गया। हम और मैडम तुम्हारे काम से बहुत खुश है। तुमने जो कारनामा अपने इंटर्नशिप के दौरान किये और एक नयी खबर बड़ी ही रोचक ढ़ंग से की उसके बदले तुम्हे नौकरी दी जाती है। तुम्हे साढ़े तीन हजार के मासिक वेतन पर रखा जा रहा है और तीन महीने बाद ये तनख्वाह दो-गुना बढ़ा दी जायेगी, लेकिन शर्त यही है कि तुम इसी तरह की स्टोरी लाते रहोगें और मैडम के साथ - साथ हमे भी खुश रखोगें। मैं मुर्ख अज्ञानी पहले इन बातों को समझ ही नहीं पाया कि मान्यवर शहजाद क्या कह रहें हैं। हम तो समझे खुश का मतलब मेहनत से काम करना होता है। हमने जब ये खबर अपने माता पिता को सुनाई तो हमारी माता ने उस दिन मंदिर जाकर दस रूपये का प्रसाद बांटकर भगवान के समक्ष हमारी कामयाबी की दुआ मांगी और हमने भी उनकी आंखों में आंखों देखी की दया को आंसूओं के रूप में देखा। मेरे बूढ़े बाप ने अपनी 502 पताका बीढ़ी का लंबा कस लेकर और दम साधकर मेरी मां से कहां। अजी सुनती हो अब अपना लोंडा भी कमाने लगा, अब तो घर में मुझे अराम करने ही दिया करेगी तू। मैं भी यह बात सुनकर खुश था कि अब मुझे नौकरी मिल गयी है। दूसरे दिन मैं बड़े ही जोश से अपने दफ्तर पहुंचा और पहुंचते ही मान्यवर शहजाद जी के चरण स्पर्श करके नमस्कार करके बोला, सर आपका मेरे ऊपर बड़ा उपकार है। आप ही है जिन्होंने मेरी प्रतिभा को समझा है बस आप मुझे आर्शीवाद प्रदान कर दो फिर देखना मे पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे झंडे गाढ़ता हूं मेरी बातों पर मुस्कुराते हुए मान्यवर शाहजाद उर्फ आंखों देखी के वीडीयो एडिटर यानी टेक्नीकल आदमी जो दसवीं फेल हैं और पत्रकारिता किस परिंदे का नाम हैं ये उन दिनों नहीं जानता था ने अपनी आंखे ऊपर चढ़ाते हुये कहा। बेटा आर्शीवाद तो हमने तुम्हें दे ही दिया है, लेकिन आज से एक बात का ध्यान रखना कि स्टोरी आपने पहले मुझे दिखानी है हमारे ब्यूरो चीफ दुष्यंत और आनंत मित्तल को अपनी स्टोरी नहीं देनी है। हमें एक दम से तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन शाम तक समझ में आ गया जब अनंत मित्तल और दुष्यंत जी आंखों देखी को अलविदा कह गये। अब हमारी समझ में पहले ही दिन आ गया कि हमे एकदम से नौकरी पर क्यों रख लिया गया था। थोड़ा बहुत हम लिख ही लिया करते थे, बाकी कहानी पर मैडम कलम चला ही लिया करती है। आंखों देखी में हमारे साथ वाली कुर्सी पर ही हमारे दोस्त हैं दिनेश पाठक वो आज तक उसी कुर्सी पर हैं जहां हम उन्हें छोड़ गये थे क्योंकि वह वो करने में एक्सपर्ट हो गये जो हम आजतक नहीं सीख पाये। खैर हम काम करते रहें महीना बीता सभी की तनख्वाह मिली, लेकिन हमें नहीं मिली। इसका कारण जब हमने शहजाद जी से पूछा तो उन्होंने कहा तुम्हारा नाम अकाउंट सेक्शन में अपडेट नहीं हुआ इसलिये इसबार चैक नहीं बना अगले महीने बन जायेगा। हमने सोचा चलो वैसे भी 20 तारीख तो हो ही गयी है। अगला महीना भी आया जाता है। अगला महीना आया और अगले महीने तक हम भी पूरी तरह से पक चुके थे। घर पर जबाव देकर भी और दफ्तर में फोकट में काम करते करते भी। फिर अगले महीने की 10 तारीख आयी सभी को चैक मिल गया, मुझे फिर नहीं मिला। मैंने इसबार अकाउंट सेक्शन में इस बारे में मालूमात किया जो मेरी ही सीट के सामने मौजूद था जो रिसेप्सन भी था। वहां एक दक्षिण भारतीय व्यक्ति बैठा करते थे जिनका नाम राजन था। उन्हें ना तो अंग्रेजी आती थी और ना ही हिंदी। मैं पिछले तीन महीने से सोच रहा था कि इस आदमी को यहां क्यों रखा गया है। इस बात का पता भी मुझे उस दिन चल गया। मैंने पूछा मेरे चैक का क्या हुआ तो वह व्यक्ति मुझे देखकर थोड़ी देर तक तो हंसता रहा। मुझे लगा जैसे उसकी समझ में चैक का मतलब कुछ और तो नहीं आया मैंने इशारे से कहा मेरे चैक का क्या हुआ। तो वह बोला मुझे नहीं मालूम जाकर शहजाद से पूछो। मैं जब शहजाद के पास गया तो वह बोला कि अकाउंट में बात करो जब अकाउंट पर गया तो वह फिर बोला तुम क्या चैक चैक कर रहें हो मेरी समझ में नहीं आता। मुझे हिंदी नहीं आता। मैं बोला लेकिन तुम इतना तो समझते ही हो कि मैं क्या बात कर रहा हूं। वह अपने लंबे दांत दिखाकर मुस्कुराते हुआ बोला लेकिन भाई मेरे, मुझे जब तक समझ में नहीं आता जब तक शहजाद मुझे साइड में ले जाकर नहीं समझा देता। मेरी समझ में अब तक आ चुका था कि शायद घी सीधी ऊंगली से नहीं निकलेगा। इस बीच हमारे संगी साथी "आंखो देखी" के हमारे अंदर हवा भर ही चुके थे, जिसमें नईम और आंखों देखी के क्राइम रिपोर्टर शमशाद अली खास थे। हवा इन्होंने क्यों भरी इसका अंदाजा भी हमें हो चला था। क्योंकि नईम हिंदी में रिपोर्टिग नहीं कर पाता था। शमशाद को अंग्रेजी नहीं आती थी। इसलिये इन दोनों कि हमसे ......................थी? लेकिन हमने सोचा यह भी ठीक कह रहें हैं। अब भला कोई फ्री में कब तक कोई काम कर सकता है। लेकिन मैडम कि एक आदत थी वह जब तक किसी रिपोर्टर को रूला नहीं लेती और उससे अपनी रात दिन जी हुजूरी नहीं करवा लेती वह उसे नौकरी पर नहीं रखती और ये दोनों ही चीजे हमने पिछले चार महीनें में नहीं की। जब हर चीज की हद हो गयी और मैं पक गया, तो मैं मैडम के कमरे में गया और मैंने कहा। मैडम मेरा नाम जासूस पर्दाफाश करमचंद है और मैं आपके संस्थान में काम करता हूं।
इसपर मैडम ने बड़े ही रौबदार अंदाज में कहा, तो फिर मैं क्या करू कि तुम्हारा नाम जासूस पर्दाफाश करमचंद है या फिर कुछ और, मैंने घिघियाते हुए कहा मैडम मैंने इस दिवाली पर आंखों देखी के लिए एनटीपीसी दादरी से एक ब्रेकिंग स्टोरी की थी जिसपर आंखों देखी को काफी वाह वाही मिली है। मैडम बोलीं हां ये बात मैं जानती हूं आप मुझे ये बात क्यों बता रहें हैं। मैंने कहां मैंडम मेरे साथ के सारे स्टाफ को अपनी तनख्वाह मिल गयी, लेकिन मुझे पिछले दो महीने से नहीं मिल रही है। उन्होंने पूछा तुम्हे नौकरी ज्वाइन किये कितना समय हुआ है। मैंने कहा दो महीने। मैडम ने पूछा तुम्हे रखा किसने हैं, मैंने कहा शहजाद जी ने। मैडम ने कहा, जब शहजाद ने रखा है तो तनख्बाह भी तो वही देगा, मैं तुम्हे नहीं जानती की तुम मेरे यहां नौकरी करते हो। मैंने कहा मैडम मैं चार महीने से आप के यहां हूं आपको यह नहीं पता कि मैं यहां क्यों हूं। मैडम ने साफ कहा मेरे यहां लोग सालों साल से हैं, लेकिन मैं उन्हें भी नहीं जानती तो तुम कौन हो, और हां अब मेरा समय खराब मत करो और दफा हो जाओ। मैं धीरे से मैडम के कमरे से बाहर हो गया और बाहर आकार शहजाद से बोला भाई साहब आपके बारे में सुना बहुत कुछ था लेकिन आज जान भी लिया। अब ईश्वर से यही दुआ करेंगे कि आप जैसा आदमी हमें इस फील्ड मैं ना मिले। इसपर शहजाद ने अपने खींसे निपुरते हुये कहा। हमारा काम है मैडम का काम करना और वो भी मुफ्त में, अगर नहीं करेंगे तो हमारी गाड़ी में तेल नहीं पड़ेगा। मेरे भाई तू मुझे ऐसी धमकी मत दे कि मुझसे मुलाकात नहीं होगी। मैं तो तुम्हे हर मोड़ पर मिलने वाला हूं। हां ये बात अलग है कि दूसरी जगह दूसरी सूरत और नाम का आदमी मिलेगा, लेकिन मिलूंगा मैं ही। मैं आंखों देखी को छोड़ आया और सोचता रहा कि क्या शहजाद सही कह रहा है।
क्योंकि जीवन के सात साल पत्रकारिता को समर्पित करने के बाद आज मैं एक ऐसे संस्थान के साथ हूं जहां मेरे काम को सराहा भी जाता है और मुझे भी पूरा सम्मान मिल रहा है। पैसा पत्रकारिता में चैनल में भर्ती होने के बाद या फिर किसी रैकेट यानी 'पत्रकारिता की दलाली' करने के बाद ही आता है।
इस बात को बताने में या कहने में मुझे अब कोई डर इसलिये नहीं लगता कि अब मैं मान चूका की समस्त टीवी चैनल और अखबार वाले मुझे नौकरी नहीं देने वाले। जिसने मेरे और मेरे बच्चों का दाना पानी देना था, उसे मेरे काम से कोई शिकायत नही है। यानी अब मैं एक ऐसे पवित्र और अच्छे संस्थान में हूं जहां मेरी और मेरे काम की इज्जत होती है। एक पत्रकार को यही चाहिए भी होता है और रही बात पैसों की तो मैं ये मानता हूं कि पैसें तो रेड लाइट पर खड़ा भीखारी भी कमा लेता है, लेकिन इज्जत और सम्मान से मिली सूखी रोटी में शहद की मिठास होती है। ये मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे आज एक ऐसा संस्थान मिला है जो मुझे ये दोनों चीजे प्रदान कर रहा है।
क्रमश:
Subscribe to:
Posts (Atom)