Wednesday, November 24, 2021

किस तरह वोट करता है उत्तर प्रदेश का दलित

यूपी में दलितों की राजनीति किस तरीके से बदल रही है और उसका प्रभाव अगले चुनाव में कैसा होने वाला है? आइए जानते हैं। 

राजनीति में हमेशा से नारों का अपना महत्व रहा है। कभी कांशीराम ने नारा दिया, 'ठाकुर बाभन बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर। तिलक, तराजू और तलवारइनको मारो जूते चार' साल 2007 में उनकी शिष्या मायावती इसके बिल्कुल विपरित नारा देती हैं, 'पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा', 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है'  एक साल 2007 का समय था और एक आज का समय है, मायावती ने इसके बाद सिर्फ नीचे की ओर ही सफर किया है। साल 2021 में मायावती एक बार फिर ब्राह्मणों की ओर रुख किया है। ब्राह्मण सम्मेलन बुलाया जा रहा है। सतीश मिश्रा ने एक बार फिर से मोर्चा संभाल लिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि जिस दलित को अपना कोर वोट मानकर बसपा ये प्रयोग कर रही है, क्या वह उसके साथ हैं? यूपी में दलितों की राजनीति किस तरीके से बदल रही है और उसका प्रभाव अगले चुनाव में कैसा होने वाला है? आइए जानते हैं।


जगजीवन राम नहीं बने प्रधानमंत्री, कांशीराम नेता बन गए

नारों की बात करें, तो एक और नारा भारतीय राजनीति में खूब चर्चित हुआ था। आपातकाल के दौरान कहा गया, 'जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जाएगी इंदिरा गांधी' जगजीवन राम ही वो नेता हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित पहचान को एक अलग मुकाम दिया। जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्री नारायण, जो अपनी हालिया किताब 'रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व' को लेकर चर्चा में हैं, बताते हैं कि दलित राजनीति में चेतना काम 1930 के दौर में स्वामी अच्युतानंद के समय में ही शुरू हो गया था। शुरुआत में दलितों की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस हुआ करती थी। हालांकि, कांशीराम जैसे नेता अपनी कोशिश कर रहे थे। इसके अलावा, आगरा बेल्ट में कुछ नेता थे, जो दलित की राजनीति कर रहे थे।

दलित राजनीति को समझने वाले एक्सपर्ट बताते हैं कि असली परिवर्तन जगजीवन राम के प्रधानमंत्री ना बनने पर हुआ। दरअलस, 1977 में जब जनता पार्टी जीत कर आई, तो तीन लोग प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई। जब मोरारजी के नाम पर मुहर लगी

, तो दलित समुदाय के अंदर रोष आ गया। उस समय को याद करते हुए आज भी दलित रो उठते हैं। उस दिन कई घरों में खाना नहीं बना था। इस नाराजगी को मोबलाइज कर कांशीराम ने एक बड़ा वोट बैंक खड़ा कर लिया, जिसने आगे चलकर मायावती के मुख्यमंत्री बनने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।

कितना बड़ा है दलित वोट बैंक?

ओबीसी समुदाय के बाद दलित वोट की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में 42-45 फीसदी ओबीसी हैं, उसके बाद 20-21 फीसदी संख्या दलितों की है। 20-21 फीसदी में सबसे बड़ी संख्या जाटव की है, जो करीब 54 फीसदी हैं। इसके अलावा दलितों की 66 उपजातियां हैं, जिनमें 55 ऐसी उपजातियां हैं, जिनका संख्या बल ज्यादा नहीं हैं।  इसमें मुसहर, बसोर, सपेरा और रंगरेज शामिल हैं। 20-21 फीसदी को दो भागों में बांट दें, तो 14 फीसदी जाटव हैं और बाकियों की संख्या 8 फीसदी है।

जाटव के अलाव अन्य जो उपजातियां हैं, उनकी संख्या 45-46 फीसदी के करीब है। इनमें पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं।  कुल मिलाकर पूरे उत्तर प्रदेश में 42 ऐसे जिलें हैं, जहां दलितों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है।

 यूपी के दलित नेता

उत्तर प्रदेश में दलित नेताओं की बात की जाए, तो बसपा प्रमुख सबसे बड़ी नेता के तौर पर सामने आती हैं। वह उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। साथ ही साथ चार बार वह सत्ता का सफर तय कर चुकी हैं। इसके अलावा किसी भी पार्टी के पास इतना बड़ा चेहरा नहीं है। भाजपा के पास सुरेश पासी, रमापति शास्त्री , गुलाबो देवी और कौशल किशोर जैसे नेता हैं। इसके अलावा विनोद सोनकर हैं, जो भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के पास आलोक प्रसाद और पीएल पुनिया जैसे नेता हैं। वहीं, चंद्रशेखर आजाद भी कुछ समय पहले से काफी चर्चा में आए हैं।

किसे वोट करते हैं दलित?

उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा प्रयोग साल 2007 में मायावती ने किया। सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से उन्होंने विधानसभा में 3043 फीसदी वोटों के साथ 206 सीट हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 2009 के लोकसभा चुनावों में भी बसपा 274 फीसदी वोट के साथ 21 सीटें जीतने में सफल रही। लेकिन साल 2012 में सोशल इंजीनियरिंग की चमक कमजोर पड़ गई। वोट गिरते हुए 259 फीसदी पर पहुंच गए और बसपा 206 से गिरकर 80 पर पहुंच गई। सबसे बड़ा झटका 2014 के लोकसभा चुनावों में लगा, जब बसपा को सिर्फ 20 फीसदी वोट मिले और खाता भी नहीं खुला। 2017 में 23 फीसदी वोट के साथ बसपा को सिर्फ 19 सीटें मिलीं, जिनमें बगावत के बाद अब सिर्फ 7 विधायक बचे हैं।

 

चुनावी रणनीतिकार और पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, 'अगर आप आंकड़ों को देखें, तो भाजपा इस वक्त देश की सबसे बड़ी दलित पार्टी है। लड़ाई सिर्फ उत्तर प्रदेश में है।' सीएसडीएस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 24 फीसदी दलितों का वोट हासिल हुआ। वहीं, कांग्रेस को 185 फीसदी, बसपा को 139 फीसदी वोट मिले थे।

अगर आप लंबे समय से दलितों का पूरे भारत में वोटिंग पैटर्न देखें, तो यह कांग्रेस से शिफ्ट हो कर भाजपा की ओर चली गई है। सीएसडीएस की रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1971 में भाजपा को 10 फीसदी दलित वोट मिलता था, जो साल 2014 तक 24 फीसदी पहुंच गया। बसपा को साल 2004 में सबसे अधिक 24 फीसदी वोट मिले थे, जो 2014 में 14 फीसदी हो जाता है। जबकि कांग्रेस 71 में 46 फीसदी दलित वोट करते थे, 2014 में गिरकर 19 फीसदी हो गया।

गैर जाटव ने पलटा गेम

एक प्रसंग यूपी की राजनीति में दलित परिपेक्ष्य को बड़ा साफ करता है। दरअसल, 2006 में मायवाती से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? मायवती ने जवाब दिया- 'मेरा उत्तराधिकारी जाटव ही होगा, उनमें से एक जिन्होंने मनुवादियों के हाथों सबसे ज्यादा जुल्म सहे हैं।कहा जाता है कि यहीं से भाजपा ने गैर जाटव का एक राग पकड़ा, जो अब सुर में बदल गया है।

दलित राजनीति को समझने वाले कहते हैं कि साल 2012 में जब मायावती विधानसभा का चुनाव हारीं, तो उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने साथ नहीं दिया। लेकिन जब आप आंकड़ें देखेंगे, तो साल 2012 में ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों ने बसपा का साथ दिया, लेकिन दलित उनसे छिटक गए। आंकड़ों से देखें, तो मामला बिल्कुल साफ हो जाता है। 2014 में गैर जाटव का 61 फीसदी वोट भाजपा को मिला। वहीं, 11 फीसदी जाटव ने भी वोट किया। ठीक इसके उलट बसपा को 68 फीसदी जाटव और 11 फीसदी गैर जाटव ने वोट दिया है।

यही नहीं, Axix My India डेटा एक और चौंकाने वाले विषय की ओर इशारा करता है। साल 2019 में करीब 60 फीसदी गैर जाटव के साथ 21 फीसदी जाटव ने भी भाजपा को वोट दिया।

आरक्षित सीट का खेल

दलित को प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था है। सीट की स्थिति की बात करें, तो यूपी विधानसभा की 403 सीटों में से इस वक्त 86 सीट आरक्षित हैं। इन सीटों पर जिसका कब्जा रहा, वह यूपी की सत्ता पा गया।

साल 2017 में 85 रिजर्व विधानसभा सीट में भाजपा ने

65 गैर जाटव को टिकट दिया था। भाजपा ने 76 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की। जबकि बसपा के खाते में सिर्फ 2 गईं। सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) 3 और अपना दल ने 2 सीटें जीतीं। 

2012 के विधानसभा चुनाव देखे जाएं, तो सपा ने 58, बसपा ने 15 और भाजपा ने सिर्फ 3 सीटों पर जीत हासिल की थी।

वहीं, 2007 में बसपा 62, सपा 13, भाजपा 7 और कांग्रेस ने 5 सीटों पर जीत हासिल की थी।

गौरतलब है कि  साल 2017 में भाजपा, 2012 में सपा और 2007 में बसपा ने यूपी की राजनीति में परचम लहराया था।

 

हालांकि, अगर ये आंकड़ें सीटों के हिसाब से देखें, तो 9 ऐसी सीटें रही हैं, जहां भाजपा हमेशा से मजबूत रही है। वहीं, सपा 3 सीटों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रही है। शाहजहांपुर में कांग्रेस,

तो मिश्रिख बसपा का गढ़ रहा है। हरदोई और लालगंज में हमेशा मुकाबला कांटे का रहा है।

भाजपा के साथ क्यों आया गैर जाटव?

साल 2007 से पहले लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में स्थिर सरकारें नहीं रहीं। इसकी बड़ी वजह थी जाति त्रिकोण। सपा के पास यादव, मुस्लिम और अन्य जातियों के कुछ वोट थे

, जो 25 फीसदी के करीब थे। भाजपा के पास सवर्ण और कुछ ओबीसी वोट थे, जो 20 फीसदी के करीब थे। वहीं, मायावती की बसपा की भी यही स्थिति थी। दलितों के वोट के साथ वो भी 20 प्रतिशत के करीब पहुंचने में सफल हो जाती थीं। गेम 2007 में पलटा, जब मायावती ने बहुजन से सर्वजन की राजनीति शुरू की। ऐसे में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम का एक कॉम्बिनेशन बना, जिससे बसपा को 30.43 मत हासिल हुआ। यहीं से गैर जाटव का मामला शुरू हुआ। क्योंकि इस सरकार में दलितों से ज्यादा ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व मिला।

दलित सुमदाय का अध्ययन करने वाले प्रोफेसर बद्री नारायण बताते हैं कि यह एक लंबा प्रोसेस है। जो आज वोट दिख रहा है, वो आरएसएस के कार्यों की लंबी प्रक्रिया है। दरअसल, आरएसएस में जाति वाला कोई फैक्टर नहीं है। ऐसे में जब वह गैर जाटव यानी कम संख्या वाली दलित जातियों के पास पहुंचे, तो उनके अंदर एक किस्म की छटपटाहट थी। उनको प्रतिनिधित्व देना था। आरएसएस ने यह फीडबैक भाजपा को दिया होगा

, जिस पर काम किया गया। यह कोई एक चुनाव का परिणाम नहीं है। धीरे-धीरे गैर जाटव की छोटी-छोटी जातियों को इकट्ठा करके एक बड़ा वोट बैंक बनाया गया।

उन्होंने अपनी किताब 'फैलिनेटिंग हिंदुत्व: सैफरन पॉलिटिक्स एंड दलित मोबिलाइजेशन' में भी इस बात का जिक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में आरएसएस के कई कार्यक्रमों का जिक्र किया है, जिसके जरिए उन्होंने उन जातियों को अप्रोच किया, जिन्हें ना आवाज मिली, ना पहचान मिली और ना ही सत्ता। धीरे-धीरे आरएसएस ने भाजपा का काम आसान कर दिया।

 

अगर आप पासी जाति का उदाहरण लें। तो इस वक्त भाजपा उत्तर प्रदेश में उदा देवी की मूर्तियां लगवा रही हैं, जो इस समुदाय के लिए काफी सम्मान वाली बात है। इसके अलावा, इस वक्त भाजपा के 23 विधायक और 6 सांसद इस समुदाय से आते हैं। कौशल किशोर को मोदी मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया है। योगी कैबिनेट में सुरेश पासी इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। साल 2017 में अवध-पूर्वांचल की पासी बहुल सीटों जैसे बाराबंकी की जैदपुर और हैदरगढ़, सीतापुर की मिश्रिख,

हरदोई की बालामऊ और गोपामऊ सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को मिली जीत इशारा करती है कि पासी बिरादरी में भाजपा ने अपनी पैठ बना ली है।

मायवाती हैं बड़ा चेहरा, फिर भाजपा बिना नेता कैसे लड़ रही है?

अगर उत्तर प्रदेश में दलितों के बड़े नेताओं की बात की जाए, तो मायावती के आगे कोई नहीं टिकता। अगर भाजपा को देखें, तो ऐसा कोई दलित चेहरा नहीं है। इस मामले में बद्री नारायण कहते हैं कि प्रतिनिधित्व के लिए मंत्री या मुख्यमंत्री होना जरूरी नहीं है। ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और पार्टी में पद देकर भी इसे साधा जा सकता है। फिलहाल, भाजपा यही कर रही है। उसे ओबीसी की तरह दलित नेताओं को कल्टिवेट करने की जरूरत है।

वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि भाजपा का फोकस मूलतः ओबीसी पॉलिटिक्स पर है। यूपी में ओबीसी और दलित दो ध्रुव हैं। जहां ओबीसी हैं, वहां दलित नहीं जाएंगे। बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ दलित नहीं जाएंगे। वहीं

भाजपा के पास ओबीसी की नाराजगी झेलने की हिम्मत भी नहीं है। ऐसे में यहां भाजपा के लिए मुश्किलें हैं।

हालांकि, एक्सपर्ट इस बात से अलग विचार रखते हैं। वे कहते हैं कि बसपा लगातार तीन चुनाव हार चुकी है। गैर जाटव पहले ही भाजपा के साथ हैं। डाटा भी देखें, तो जाटव का झुकाव भाजपा की ओर दिखता है। अगर चुनाव दो तरफा होता है, यानी भाजपा बनाम सपा, तो जाटव भी भाजपा की ओर जा सकते हैं। क्योंकि कोई भी समुदाय पावर चाहता है, जाटव को यह उम्मीद मायावती के साथ नहीं दिख रही है। वहीं, यूपी में ओबीसी खासकर यादव बनाम दलित का नरेटिव रहा है। ऐसे में वह भाजपा में अपनी जगह तलाश सकते हैं। हालांकि, यह चुनाव के बाद ही पता चलेगा।


क्या चंद्रशेखर आजाद बनेंगे मायावती के विकल्प या होगी बसपा की वापसी?

इस वक्त दलित राजनीति में मायवाती के अलावा चंद्रशेखर आजाद की भी पार्टी दिख रही है। आजाद की पहचान अग्रेसिव राजनीति की रही है। राजनीति को समझने वालों का कहना है कि चेहरा होना और चुनाव में परफॉर्मेंस करना दोनों अलग चीजें हैं। आजाद के पास कोई नरेटिव नहीं है। उन्हें पता ही नहीं है कि वो क्या कर रहे हैं। अगर कांशीराम को देखें, तो वह मंच से पहले कई जातियों के नाम लेते थे, फिर भाई का संबोधन करते थे। उनके पास एक नरेटिव था। आजाद के पास सिर्फ जाटव राजनीति ही दिखती है। फिलहाल, वह एनजीओ जैसा काम कर रहे हैं। इससे कुछ खास फायदा होता नहीं दिख रहा है।

वहीं, एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि आजाद के पास पोटेंशियल है। लेकिन उन्हें अभी बहुजन का पूरा समर्थन हासिल नहीं है। ना ही वह कुछ ऐसा नरेटिव बनाते दिख रहे हैं, जो चुनाव को पलट सके। अगर वह 3 फीसदी भी मत हासिल करते हैं, तो बड़ी बात होगी।

मायावती की वापसी को लेकर एक्सपर्ट कहते हैं कि ब्राह्मण सम्मेलन करने से वोट तो नहीं मिल जाएगा। भले ही ये कहा जा रहा है कि ब्राह्मण भाजपा से नाराज हैं, लेकिन अभी उन्हें कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। वहीं, मायावती का भाजपा के बी टीम वाला प्रोजेक्शन भी उनको नुकसान पहुंचा रहा है।


 

बहरहाल, मायवाती एक बार ब्राह्मण का प्रयोग कर चुकी हैं। फिर सम्मेलन कर रही हैं, लेकिन इससे ब्राह्मण वोट उन्हें नहीं मिल जाएगा। भाजपा सरकार से ब्राह्मण नाराज हैं। ऐसे में ब्राह्मण कहां जाएगा। नाराजगी में कई बार समुदाय बदले की भावना से भी रिएक्ट करता है। अगर ब्राह्मण देखेगा कि कहीं राजपूत कैंडिडेट खड़ा है और उसकी लड़ाई समाजवादी पार्टी से है, तो वहां बाह्मण सपा के साथ चला जाएगा। वहीं, जहां बसपा से टक्कर होगी, वहां बसपा को फायदा मिलेगा। जहां कांग्रेस से सीधी टक्कर होगी, वहां कांग्रेस के साथ जाएगा।  

अब देखना ये दिलचस्प होगा कि आने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में दलित बसपा को वोट करता है या नहीं। और देखना ये भी दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश में 2022 में किस पार्टी की सरकार सत्ता पर कब्जा जमाती है। 





















 

Wednesday, September 29, 2021

चरणजीत चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस ने किए एक तीर से कई शिकार !!

पंजाब में सियासी तूफान

-कैप्टन के बिना आसान नहीं है कांग्रेस की राह

पंजाब के इतिहास में चरणजीत सिंह चन्नी का नाम पहले अनुसूचित जाति के मुख्यमंत्री के रूप में लिखा जाएगा। इससे पहले 60 के दशक में बिहार में भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने थे। बिहार में दलित मुख्यमंत्री बनने के बाद भी दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया और आज भी बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े, अति पिछड़े हाशिये पर ही है। अब पंजाब में चरणजीत सिंह सिंह चन्नी को लेकर देश की सियासत में दलित नेतृत्व को लेकर बहस छिड़ी है। पंजाब की राजनीति में चरणजीत सिंह चन्नी को लेकर सियासी लोग ये कयास भी लगा रहे हैं कि मौजूदा पंजाब के सीएम सिर्फ कांग्रेस के लिए एक मोहरा हैं। 


कांग्रेस पार्टी ने एक अनुसूचित जाति का मुख्यमंत्री बना कर एक तीर से कई शिकार कर दिए हैं। अपना कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले ही कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बनी अनिश्चितता की स्थिति में कांग्रेस आला कमान ने सबसे पहले पंजाब में एक नये प्रयोग के रूप में पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व  पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ को एक हिंदू नेता के रूप में मुख्यमंत्री बनाना चाहा, उसके बाद एक और जाट सिख नेता व कैप्टन सरकार के कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के नाम पर चर्चा चली। मगर जब इन दोनों ही नेताओं के नाम पर आम सहमति ना बनी तो राहुल गांधी और आलाकमान ने तीन बार के विधायक और कैप्टन सरकार के ही दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले  एक मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी(58) को मुख्यमंत्री बना कर सबको चौंका दिया।


कांग्रेस आलाकमान का यह एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक था जिससे न केवल पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सहित उनके सभी समर्थक विधायकों व पूर्व मंत्रियों को भी चन्नी के नाम पर अपनी सहमति प्रकट करनी पड़ी बल्कि विपक्षी दलों को कांग्रेस के इस दलित कार्ड के सामने पंजाब में दलित वोटरों के लिए तैयार किया गया एक मुद्दा खोना पड़ा। 


इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा चुनाव से पहले एक जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा और पंजाब के बड़े हिंदू नेता ओम प्रकाश सोनी को भी डिप्टी सीएम बनाकर विरोधियों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।


कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के इस निर्णय से  पंजाब के 32 प्रतिशत दलित समाज को उनका मुख्यमंत्री देकर आने वाले चुनाव में अकाली बसपा और भाजपा के किसी दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने के मुद्दे पर भी सेंधमारी कर दी है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा और अकाली दल दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने की केवल घोषणाएं ही करते हैं और कांग्रेस ने तो राज्य को पहला दलित मुख्यमंत्री देकर यह सिद्ध कर दिखाया है कि वे कितने बड़े दलित हितैषी हैं। 


पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिद्धू ने भी उनके  अपने चहेते चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कैप्टन अमरिंदर सिंह को एक करारी शिकस्त दी। वैसे भी चन्नी ने सिद्धू के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में एक अहम भूमिका निभाई है।


बीजेपी और आम आदमी पार्टी भी राज्य में हिंदू मतदाताओं को अपना वोट बैंक मानकर अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है। ऐसे में चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस ने राज्य में ओपी सोनी जैसे पांच बार विधायक रहे बड़े कद के हिंदू चेहरे को उप  मुख्यमंत्री का पद देकर विपक्षी दलों के हिंदू वोटरों को रिझाने के बड़े मुद्दे  को भी हथिया लिया है। यानी एक दलित चेहरे चन्नी को मुख्यमंत्री, जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा को उप मुख्यमंत्री व ओपी सोनी जैसे बड़े हिंदू नेता को उप मुख्यमंत्री पद देकर राज्य के सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश की है।


चन्नी के सामने हैं चुनौतियां बहुत हैं


कांग्रेस आलाकमान एक दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बना कर पंजाब में बेशक इसे अपना एक मास्टर स्ट्रोक मान रही है मगर विधान सभा चुनावों से पहले  कांग्रेस और चन्नी के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता को दरकिनार कर सिद्धू के साथ मिलकर चलने से चन्नी पंजाब कांग्रेस में होने वाली बगावत को रोक पाएंगे? इसके अलावा जैसा कि पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत ने चन्नी के नाम की घोषणा होते ही यह ऐलान कर दिया कि आने वाला चुनाव पंजाब कांग्रेस नवजोत सिद्धू के नेतृत्व में ही लड़ेगी। उनके ऐसा कहते ही पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने इसका जबरदस्त विरोध करते हुए कहा कि इससे मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी की छवि पर असर नहीं पड़ेगा। इसका यह संदेश तो लोगों के बीच नहीं जाएगा कि चन्नी केवल 6 महीने के लिए ही एक पार्टटाईम मुख्यमंत्री बनाए गए हैं, उसके बाद तो सिद्धू ही मुख्यमंत्री होंगे।


इसके अलावा कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो है कि राज्य में चुनावों में केवल छह महीने का वक्त बचा है ऐसे में चन्नी इतने कम समय में क्या कुछ कर पाएंगे और लोगों की अपेक्षाओं पर कैसे खरे उतर पाएंगे?  इसके साथ ही चरणजीत चन्नी और उनकी सरकार को पिछले पांच साल में कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए कामों और जनता से किए गए वायदों को पूरा करने के बारे में भी जनता को जवाब देना पड़ेगा जो कि इतना आसान नहीं होगा।   


कैप्टन के बिना बहुत कठिन है डगर चुनावों की

चरणजीत चन्नी के लिए कैप्टन समर्थित बागी विधायकों को संभालने के साथ-साथ चुनावों में अकाली भाजपा और आम आदमी पार्टी  जैसे प्रमुख विपक्षी दल का सामना कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता के बिना करना है। अमरिंदर सिंह पहले ही कह चुके हैं कि यदि सिद्धू पंजाब के सीएम बनते हैं तो वे उसका जम कर विरोध करेंगे। सिद्धू को कैप्टन पहले ही इमरान खान और बाजवा समर्थक और राष्ट्र विरोधी तक कह चुके हैं। इसका सीधा सीधा नुकसान सिद्धू और कांग्रेस को आने वाले चुनावों में होगा। यानी कांग्रेस को भाजपा, अकाली, आम आदमी पार्टी  के साथ साथ कैप्टन का भी सामना करना पड़ेगा, जो कि इतना आसान नहीं होगा। किसान आंदोलन के कारण कांग्रेस की जो स्थिति पंजाब में मजबूत हुई थी अब वो सिद्धू कैप्टन के झगड़े के कारण बिखरी नजर आ रही है। 

 

अब कैप्टन के सामने क्या है रास्ता

पिछले 54 साल से राजनीति में रहे पंजाब कांग्रेस के बड़े नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनावों से पहले यूं दरकिनार करना कांग्रेस के लिए काफी नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। कांग्रेस ने सिद्धू के रूप में अमरिंदर सिंह का विकल्प चुना है जो कि उनके लिए एक जुए से कम नहीं है। क्योंकि कैप्टन शुरू से ही सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर विरोध कर रहे हैं। कैप्टन ने तो सिद्धू के इमरान खान और जनरल बाजवा के साथ संबंधों को लेकर सिद्धू को देश की सुरक्षा के लिए खतरा तक कह डाला। अब यदि कांग्रेस आगामी चुनावों में सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करती है तो कैप्टन जैसे कद्दावर नेता की बात का कुछ तो असर पंजाब की जनता पर होगा। कैप्टन  की नाराजगी का खामियाजा तो कांग्रेस को भुगतना ही पड़ेगा।


हालांकि अभी तो कैप्टन कांग्रेस में ही हैं और उन्होंने कांग्रेस और विधायक से अपना इस्तीफा नहीं दिया है। मगर उनका चुनावों में सिद्धू के साथ मिलकर चुनावों में जाना लगभग असंभव लगता है। वैसे भी कैप्टन पहले ही कांग्रेस आलाकमान को कह चुके हैं कि उन्हें बहुत अपमानित किया गया, इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी त्याग दिया। अब सवाल यह है कि यदि कैप्टन कांग्रेस के लिए प्रचार नहीं करते और कांग्रेस की ओर से चुनाव नहीं लड़ते तो उनका राजनैतिक भविष्य क्या होगा। कैप्टन पहले ही स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि वे एक सैनिक हैं और अंत तक लड़ते रहेंगे। यह लड़ाई सिद्धू ने शुरु की है और वे इसे जीत कर ही दम लेंगे। यानी संकेत स्पष्ट है कि वे सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकने में पूरी ताकत लगा देंगे। 



अब यदि कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकना है तो उन्हें किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में जाना होगा। कैप्टन का कद पंजाब में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में इतना बड़ा है कि चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या आम आदमी जैसा पंजाब का प्रमुख विपक्षी दल, कोई भी पंजाब के महाराजा  कैप्टन अमरिंदर सिंह के स्वागत में पलक बिछाए तैयार है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद कैप्टन ने इस बात से कभी भी इंकार नहीं किया कि वे किसी अन्य पार्टी में जा सकते हैं। इस सवाल पर उन्होंने केवल इतना ही कहा कि वे अपने समर्थकों, शुभचिंतकों और साथियों से सलाह मशवरे के बाद ही कोई फैसला करेंगे। यानी उनका किसी भी अन्य राजनैतिक दल में जाने की संभावानाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा सीधा खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।


कौन  हैं चरणजीत सिंह चन्नी

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मोहाली जिले की खरड़ तहसील के गांव के रहने वाले हैं, इनका जन्म एक बेहद साधारण दलित परिवार में हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए व लॉ कर चुके चरणजीत चन्नी का राजनीतिक सफर 1993 में खरड़ नगर परिषद के पार्षद के रूप में हुआ। वे पंजाब के श्री चमकौर साहिब विधानसभा से तीन बार विधायक रहे। 2015 से 2016 तक उन्हें अकाली भाजपा सरकार के दौरान विपक्षी दल का नेता भी नियुक्त किया गया। मार्च 2017 में उन्हें कैप्टन सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर टेक्निकल एजुकेशन व इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग मंत्री बनाया गया। चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब विश्वविद्यालय से   पीएचडी भी कर रहे हैं। चरणजीत चन्नी की पत्नी डॉ..कमलजीत कौर खरड़ में ही एसएमओ के पद पर तैनात हैं।





Tuesday, August 3, 2021

मध्य प्रदेश के बाद अब पंजाब में फूट डालो राज करो का इतिहास दोहरायेगी बीजेपी

मध्य प्रदेश में कांग्रेस चुनाव जीती। चुनाव के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए। लेकिन कांग्रेस की आपसी फूट, गुटबाजी और कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के अहम के आगे मध्यप्रदेश में सरकार एक साल 93 दिन में ही औंधे मुंह गिर गयी।

बीजेपी की मध्य प्रदेश में सरकार बनी और ज्योतिरादित्य अपने विधायकों के साथ आज बीजेपी के साथ हैं। कुछ ऐसा ही होते होते रह गया राजस्थान में। लेकिन, असम में बीजेपी ने कांग्रेस की गुटबाजी और फूट का फायदा उठाकर फिर एक बार मास्टरस्ट्रोक खेलकर सरकार बना ली।

अब बारी पंजाब की है। पंजाब में राहुल गांधी आगामी विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन के सहारे पंजाब में हेडलाइन बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

कैप्टन अमरेन्द्र सिंह किसान आंदोलन के साथ अपने आप को जोड़ नहीं पाये और पार्टी वर्कर भी कैप्टन के महाराजा स्टाइल से


 

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का पंजाब के बागी सिपाही नवजोत सिंह सिद्धू  से मिलना और उसका जोरशोर से प्रचार करना और फिर पंजाब अध्यक्ष की कमान सौंप देना आखिर हेडलाइन बदलना नहीं तो और क्या है। अब पंजाब में सिद्धु की पंजाब कांग्रेस की ताजपोशी इस बात की तस्दीक है कि कांग्रेस अब पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धु के साथ ही आगमी विधानसभा चुनाव की पारी भी खेलना चाहती है।

लेकिन, क्या बीजेपी कांग्रेस में चल रही इस रस्साकस्सी को समझना नहीं चाहती या फिर वो एक मौके की तलाश में है। और बीजेपी पंजाब को भी मध्य प्रदेश की तर्ज पर लाकर एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेलकर पंजाब में कैप्टन को अपने पाले में ले आए।

बीजेपी की चुप्पी के मायने क्या हो सकते हैं

कांग्रेस के दो मौजूदा मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिनके खिलाफ बीजेपी बोलने से परहेज बरतती है, या कम बोलती है - कैप्टन अमरिंदर सिंह और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल।

देखा जाये तो ये दोनों ही मुख्यमंत्री बीजेपी के निशाने पर होने के साथ साथ कांग्रेस आलाकमान के सामने भी - सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट के फॉर्मूले पर भी अव्वल ही नजर आते हैं। खासकर, अगर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से तुलना करके देखें तो - और दोनों में भी देखें तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कहीं ज्यादा मजबूत नजर आते हैं।

कैप्टन राजनीति के पुराने धुरंधर हैं। वो जानते हैं कि गुगली पर कब पीछे हटना है या कब आगे आकार बॉल को बॉउन्ड्री वॉल से बाहर निकालना है। वो शायरी नहीं करते और तुक्कबंदी भी नहीं करते। लेकिन, उनके दांव कट जाये ऐसा उनके कैरियर के ग्राफ में देखने को नहीं मिलता। 

सैम पित्रोदा थ्योरी के हिसाब से देखें तो मध्य प्रदेश में जो 'हुआ तो हुआ' - और राजस्थान में जो 'होगा तो होगा', लेकिन अगर पंजाब में कुछ ऐसा वैसा होता है तो वो वो पंजाब और राजस्थान से भी बुरा हो सकता है। कांग्रेस पंजाब के राजनीतिक एक्सप्रेसवे पर रफ्तार तो भर रही है, लेकिन गियर नहीं बदल रही है। सामने बोर्ड पर पढ़ भी रही है, जिस पर लिखा है - आगे खतरनाक मोड़ है और मोड़ के आसपास बीजेपी नेतृत्व ही नहीं, अरविंद केजरीवाल और बादल परिवार भी मौके के इंतजार में बैठा है।

यानी पंजाब में हर मोड़ पर खतरनाक कट है। 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी' अलर्ट को नजरअंदाज किया तो पंजाब में असम का इतिहास दोहराते बीजेपी को देर नहीं लगेगी। और अगर बीजेपी ने जरा भी अधिक दिलचस्पी लेने शुरू कर दी तो कैप्टन को ज्योतिरादित्य सिंधिया बनते भी देर नहीं लगेगी। 

कैप्टन और ज्योतिरादित्य में फर्क है

कैप्टन कट्टर कांग्रेसी है। इस बात में दो राय नहीं है। लेकिन, जिस तरह का घटनाक्रम पंजाब में पिछले एक साल के दौरान देखने को मिला है। उससे कैप्टन अनिभिज्ञ भी नहीं है।

सिद्धू की ताजपोशी में कैप्टन शामिल बेशक हुए। लेकिन, सिद्धु का मंच से एक बार भी कैप्टन की निगरानी में कांग्रेस को आगे बढ़ाने की बात उन्होंने नहीं की। हां, इतना जरूर कहा कि मैं पंजाब के अपने सभी सीनियर्स लीडर्स की देखरेख में ही पंजाब कांग्रेस को आगे लेकर चलूंगा।  

कैप्टन को इस बात का भी अहसास है कि सिद्धु सिर्फ पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष तक ही रूकने वाला खिलाड़ी नहीं है। और मौजूदा हाल में पंजाब के मामले में सोनिया गांधी के फैसले की घड़ी आने तक राहुल गांधी को सिद्धू और कैप्टन दोनों को संभालना ही होगा - और आगे तो चुनौतियां हजार दिखती हैं।

हाल फिलहाल एक-दो मीडिया रिपोर्ट के जरिये राहुल गांधी की आशंका भी सूत्रों के हवाले से सामने आयी है - राहुल गांधी ने, एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब से मिलने आये असंतुष्‍ट कांग्रेस नेताओं से बातचीत में पूछा था कि कैप्‍टन अमरिंदर सिंह को अगर अगले विधानसभा चुनाव में चेहरा न बनाया जाये तो कितने विधायक बगावत करेंगे? अब तक ये बात सामने नहीं आयी है कि राहुल गांधी के मन में नवजोत सिंह सिद्धू को लेकर कभी ऐसी कोई आशंका रही है या अब तक भी है या नहीं?

जिस तरह से सिद्धू अपने राजनीतिक कॅरिअर को पटरी पर लाने के लिए परेशान हैं। ठीक उसी तरह से बीजेपी भी पंजाब में अपने वर्चस्व खोज रही है। अकालियों से बीजेपी का तलाक हो गया है। आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से बीजेपी की पटरी मेल नहीं खाती। ऐसे में बीजेपी की सीधी टक्कर कांग्रेस से है। कैप्टन अमरिंदर सिंह मौजूदा समय में बीजेपी को एक अच्छा अवसर प्रदान कर सकते हैं। क्योंकि पंजाब में अभी भी कैप्टन की राजनीतिक पकड़ मजबूत है।

इस बात को मजबूती तब ज्यादा मिलती दिखती है जब मुख्यमंत्री के कट्टर विरोधी प्रताप सिंह बाजवा ने भी कैप्टन अमरिंदर सिंह से हाथ मिलाया। ऐसे में कैप्टन के विरोधी विधायक बाजवा के साथ तो जा सकते हैं, लेकिन सिद्धू का सपोर्ट करें ऐसा नहीं लगता।

क्या नवजोत सिंह सिद्धु भी गुगली फेंक सकते हैं

सवाल ये है कि क्या नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी में लौट सकते हैं? बड़ा सवाल ये है कि क्या बीजेपी सिद्धू को बीजेपी वापस लेगी? लेकिन क्यों नहीं? ममता बनर्जी मुकुल रॉय की घरवापसी के लिए खुशनुमा माहौल बना सकती हैं तो बीजेपी के लिए सिद्धू में क्या खराबी है?

सिद्धू की तरफ से अब तक एक ही शर्त सामने आयी है। चाहे जो हो जाये, सिद्धू पंजाब की राजनीति में ही बने रहना चाहते हैं। अगर वो सिंधिया की तरह केंद्र के लिए राजी हो जायें तो पहले की तरह बीजेपी के लिए भी कोई बड़ी दिक्कत नहीं होनी चाहिये - ज्यादा कुछ नहीं तो दिल्ली में बाबुल सुप्रियो जैसा ओहदा तो मिल ही सकता है! है कि नहीं?

ये भी है कि अगर सिद्धू फिर से बीजेपी को ये भरोसा दिला दें कि मौका मिले तो वो हिमंत बिस्वा सरमा जैसी कोशिशें कर सकते हैं, तो रास्ता काफी आसान हो सकता है। सिद्धू और बीजेपी दोनों के लिए। अभी तो अकाली दल और आम आदमी पार्टी का जो हाल है, बीजेपी आसानी से पंजाब में सत्ता हासिल कर सकती है। ये जरूर है कि बीजेपी ने पंजाब की राजनीति में दलित विमर्श पहले से घोल दिया है।

पंजाब में अकाली दल और मायावती की पार्टी बीएसपी के बीच चुनावी समझौता हो चुका है। आम आदमी पार्टी वाले अरविंद केजरीवाल भी मुफ्त बिजली-पानी के दिल्ली मॉडल के वादे का प्रचार शुरू कर चुके हैं, लेकिन बीजेपी खुल कर सामने नहीं आ रही है। दलित मुख्यमंत्री की पेशकश के बाद बीजेपी परदे के पीछे रह कर काम कर रही है। बीजेपी को तो बस कांग्रेस के खिलाफ एक मोहरे की तलाश है।

Friday, July 30, 2021

अब ये देश दलितों के रहने लायक नहीं रहेगा

अब ये देश दलितों के रहने लायक नहीं रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसतरह से 2014 से लेकर 2021 तक पूरे देश में दलितों की हत्या का आंकड़ा तेजी से उठा है शायद उतनी तेजी से दलितों की हत्या पहले कभी नहीं हुई।

 

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक पंचायत अधिकारी की हत्या महज इसलिए कर दी गयी क्योंकि उसने एक ब्राह्रमण कन्या से प्रेम विवाह कर लिया था। हालांकि इस मामले में लड़की ने अपनी मर्जी से ही लड़के से शादी की और लड़की का जात पात पर विश्वास भी नहीं है। लड़की का कहना है कि अब वो जब तक अपने गुनहगार परिवार को सजा नहीं करवा लेती तब तक वो चैन से नहीं बैठेंगी।

 

लड़की जिस हालात में है, उसके पीछे उसके परिवार के लोगों की वो मानसिकता है जो जातिवाद में डूबी हुई है। और इस कद्र कुंठा के घेरे में है कि उसने इंसानियत तक को ताक पर रखकर अपनी ही बेटी का परिवार उजाड़ दिया। 17 लोग हिरासत में है। आप सोचिये, जातिवाद की जड़ों से जकड़ा ये परिवार किस तरह से दलितों से घृणा करता रहा होगा। अपने आप को शिक्षित सभ्य कहलाने वाला परिवार किस तरह से दलित परिवारों और दलितों के साथ सल्लुक किया करता होगा।

 

लड़का लड़की एक ही कॉलेज में पढ़ रहे थे। लड़का भी अच्छे ही परिवार से था। धन दौलत की दोनों ही परिवार में कोई समास्या नहीं है। लेकिन, जाति एक ऐसा फैक्टर बनकर सामने आयी की दोनों ही परिवार बर्बादी की कगार पर पहुंच गये। लड़की विधवा हो गयी वो अलग और साथ ही बदले की भावना लेकर जियेगी सो अलग।

 

एक दूसरा मामला उत्तर प्रदेश का ही है। प्रयागराज के इस मामले ने तो पूरे  सियासी माहौल को गरमा या है। प्रयागराज ज़िला मुख्यालय से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर कौंधियारा थाने में एक बेहद पिछड़ा गांव है- कठौली कंचनवा। गांव के बीच में एक मजरा है जुगल का पुरवा, जहां खेतों से घिरे चार-पांच घर दिखते हैं। सबसे पहले एक कच्चा और खपरैल का बना हुआ घर रामराज यादव का है, उससे आगे एक घर छोड़कर मिट्टी और खपरैल से बने दो छोटे घर हैं जो भगवती सिंह और उनके भाई के हैं। रामराज यादव और भगवती सिंह के घर के बीच महज़ पचास मीटर की दूरी होगी।

दोनों परिवारों के बीच अच्छा संबंध रहा है, घर वालों को एक-दूसरे के साथ उठना-बैठना रहा है। लेकिन सोमवार को संबंधों में ऐसी खटास आई कि दोनों परिवारों के बीच मार-पीट हुई और भगवती सिंह के घर के लोगों ने रामराज यादव के बेटों- सोनू यादव और संदीप यादव को पीट-पीटकर लहू-लुहान कर दिया।

दोनों परिवारों की स्थिति यह है कि एक के यहां मातम पसरा है जबकि दूसरे परिवार के चार लोग जेल में हैं और बचे हुए लोग घर में ताला लगाकर कहीं चले गए हैं।

 

सोनू यादव के पिता रामराज यादव बताते हैं, "शाम को साढ़े सात बजे हम लोग बाहर बैठे थे। उस दिन हमारे घर पूजा हुई थी। ठाकुर लोग भी प्रसाद लेकर गए थे। वो लोग अक्सर बच्चों के साथ यहां बैठते थे।" "लेकिन अचानक हम लोग देखे कि प्रियम सिंह और प्रीतम मेरे बेटों संदीप और सोनू को लाठी से पीट रहे हैं। जब तक हम लोग वहां पहुंचते तब तक सोनू को काफ़ी चोट आ गई थी और संदीप भागकर घर की ओर आ गया था।"

 

रामराज बताते हैं कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे और दूसरे लोग उन्हें पीट रहे थे। सोनू के सिर में काफ़ी चोटें आईं।

"उसे पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर ज़िला चिकित्सालय पहुंचाया गया, लेकिन अगले दिन उसकी मौत हो गई।" रामराज का कहना है कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे

रामराज का कहना है कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे

 

23 वर्षीय सोनू की अभी कुछ महीनों पहले शादी हुई थी। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। पत्नी और मां को समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर एक छोटी सी बात के लिए सोनू को इतना क्यों पीट दिया गया कि उसकी मौत हो गई।

सोनू की मां कहती हैं, "हम लोग बचाने को पहुंचे, लेकिन उन लोगों के ऊपर जैसे ख़ून सवार था। मुझे और मेरी बहू के ऊपर भी कई लाठियां पड़ीं। फिर जब आदमी लोग आए, तब कहीं जाकर वो लोग यहां से भागे।" इस लड़ाई के पीछे सोनू के भाई संदीप का एक व्हाट्सऐप स्टेटस माना जा रहा है जिसे उसने एक दिन पहले पोस्ट किया था।

 

यह स्टेटस प्रियम सिंह इत्यादि को नागवार गुज़रा और उन्होंने उससे उस स्टेटस को हटाने की बात कही, लेकिन संदीप ने स्टेटस नहीं हटाया।

 

चार अभियुक्तों की गिरफ़्तारी

संदीप के परिजनों का कहना है कि यह स्टेटस समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए तैयार किए गए एक गीत का वीडियो था जबकि गांव के लोगों का कहना है कि इस वीडियो में अजीत सिंह नाम के एक बिरहा गायक का वो गीत था जिसमें वो 'यूपी के सभी ठाकुरों को अहिरों का सार (साला)' बताते हैं।

 

इसी बात से नाराज़ प्रीतम सिंह इत्यादि के साथ पहले सोनू और उनके भाई संदीप की कहासुनी हुई और फिर बात मार-पीट तक आ गई। सोनू यादव के परिजनों की तहरीर पर चार लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई और गुरुवार को पुलिस ने चारों अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया।

प्रयागराज के पुलिस अधीक्षक (यमुनापार) सौरभ दीक्षित ने मीडिया को बताया, "प्रीतम सिंह, प्रियम सिंह, उनके पिता शिशुपाल सिंह और चचेरे भाई भगवती सिंह को ग़िरफ़्तार कर लिया गया है। विवादित स्टेटस लगाने को लेकर ही झगड़ा हुआ था, जिसमें चार लोग नामजद किए गए थे। चारों की गिरफ्तारी हो गई है।" अस्पताल में सोनू की मौत के बाद गांव में तनाव पैदा हो गया। प्रशासन ने बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी ताकि कोई अप्रिय घटना न होने पाए।

 

दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर

सोनू यादव गांव में ही खेती और दूध का व्यवसाय करते थे और समाजवादी पार्टी से भी जुड़े हुए थे। गांव वालों के मुताबिक, अभियुक्तों का परिवार भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा था। दोनों ही परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर है।

 

भगवती सिंह के घर पर उनकी एक बेटी सुधा मिलीं जिनके पति इस घटना के बाद उन्हें अपने साथ ले चलने के लिए आए थे। सुधा ने बताया, "चाचा के घर पर कोई नहीं है। जो लोग नामज़द थे उन्हें जेल भेज दिया गया। औरतें और बच्चे डर के मारे कहीं दूसरी जगह चले गए हैं। मैं भी अपनी बच्ची के साथ अपनी ससुराल प्रतापगढ़ जा रही हूं।"

 

सुधा सिंह इससे ज़्यादा बात नहीं करतीं और उनका कहना है कि उन्हें इससे ज़्यादा कुछ और मालूम भी नहीं है कि क्या हुआ था। समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता संदीप यादव ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के लोगों के प्रति नफ़रत घोल दी गई है

समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता संदीप यादव ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के लोगों के प्रति नफ़रत घोल दी गई है

 

समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया

सोनू की मौत के बाद ही समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं का भी वहां जमावड़ा शुरू हो गया। इससे पहले समाजवादी पार्टी की ओर से ट्वीट करके घटना की निंदा की गई थी।

 

समाजवादी पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया था, "सपा कार्यकर्ता की श्री अखिलेश यादव जी का गीत बजाने पर सत्ता संरक्षित गुंडों द्वारा सोनू यादव की हत्या घोर निंदनीय। हत्यारों को मिले कठोरतम सज़ा।"

 

गुरुवार को सपा नेता संदीप यादव भी अपने कई साथियों के साथ वहां मौजूद थे। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "विपक्षी दलों के लोगों के प्रति इतनी नफ़रत घोल दी गई है और सत्ता पक्ष के लोगों को इतना संरक्षण दिया जा रहा है कि वो कुछ भी कर दे रहे हैं।"

 

"पिछले दिनों पंचायत चुनाव में आपने देखा होगा कि किस तरह विपक्षी दलों के लोगों के घर गिराए गए, एफ़आईआर दर्ज की गई, उन्हें मारा-पीटा गया। यह घटना भी ऐसी ही मानसिकता का नतीजा है।"

प्रयागराज ज़िले के कठौली कंचनवा गांव में किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए पुलिस की तैनाती कर दी गई है गांव के लोगों की मानें तो दोनों परिवारों के लोग अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति आस्था ज़रूर रखते थे, लेकिन इसकी वजह से उनके बीच न तो कभी कोई रंज़िश रही और न ही कभी कोई विवाद हुआ।

 

गांव के ही रहने वाले महेंद्र यादव कहते हैं, "वो लोग भी यहीं आकर बैठते थे। रामराज के घर के सामने भगवती सिंह का खेत है। दोनों ही लोग ग़रीब हैं। राजनीति से न तो इन्हें कुछ मिल रहा था, न उन्हें। यह तो सोशल मीडिया वाला मामला पता नहीं कैसे इतना बढ़ गया कि आवेश में आकर उन लोगों ने हमला कर दिया।"

 

कठौली कंचनवा गांव की आबादी क़रीब 2800 है जिसमें ज़्यादा संख्या दलितों की है। यादव समुदाय के लोगों की संख्या क़रीब चार सौ है जबकि ठाकुर समुदाय के लोगों की आबादी भी तीन सौ के आस-पास है। यह गांव और यह पूरा इलाक़ा बेहद पिछड़ा है।

 

गांव की प्रधान अनीता देवी के पति शिव प्रसाद बताते हैं कि उनके गांव में जातीय संघर्ष कभी नहीं हुआ। शिव प्रसाद कहते हैं, "आपस में कहा-सुनी और छोटे-मोटे विवाद को छोड़ दिया जाए तो एक जाति की दूसरे जाति से लड़ाई जैसा मामला कभी नहीं हुआ है। इस घटना से हमारा पूरा गांव स्तब्ध है।"

 

'विवाद अचानक नहीं था'

पुलिस का कहना है कि दोनों ही परिवारों के लोगों का न तो कोई क्राइम रिकॉर्ड है और न ही किसी अपराध में संलिप्त रहने की कोई जानकारी है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मार-पीट की नौबत अचानक आ गई।

 

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "संदीप और प्रियम इत्यादि के बीच मोबाइल पर पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर बातचीत हो रही थी। उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह विवाद अचानक नहीं था बल्कि इसकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार हो रही थी। हमारे पास चैट्स के स्क्रीनशॉट्स हैं और उन सबके आधार पर ही जांच की जा रही है।"

 

वहीं कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जुगल का पुरवा की घटना लोगों के लिए एक सबक है कि कैसे उन राजनीतिक मुद्दों को लोग आपसी विवाद का कारण बना लेते हैं जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है।

 मुद्दें की बात

प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी का कहना है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए वो हर संभव कदम उठायेंगे और मुजरिमों को सलाखों के पीछे पहुंचायेंगे। लेकिन बात जब जाति आधारित अपराधों की आती है तब सूबे के मुख्यमंत्री भी जांच पड़ताल की बात करते ही नजर आते हैं। दूसरी बड़ी बात ये भी है कि देश में मौजूदा दौर में दलितों की हत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आप आये दिन अखबारों की खबरों को देखकर इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में दलितों का हाल क्या है। कुल मिलाकर देखा जाये तो मौजूदा दौर में ये देश अब धीरे धीरे दलितों के रहने लायक नहीं रहा है। और यहीं मंशा इस देश के ब्राह्मण और सवर्ण की है कि देश का दलित धीरे धीरे इतना कमजोर और इतना क्षीण हो जाये कि या तो वो अपनी आवाज किसी भी अन्याय के खिलाफ उठाये नहीं और अगर उठाये भी तो इतने धीरे की उसे न्याय मिल ही ना पाये।

 


Saturday, May 29, 2021


Modi Ji के रोने की पॉलिटिक्स क्या है मोदी जी अक्सर ही मंच पर रोने लगते हैं. या यूं कहें कि अक्सर ही आप देश के प्रधानमंत्री को संवेदनशील होते देख सकते हैं. संवेदनशील होना अच्छा है. बेहतर इंसान होने की निशानी है. लेकिन जब यही संवेदनशीलता देश की बदनामी दुनिया में करवाने लगे तो इसे फिर आप क्या कहेंगे. और सवाल ये भी उठने लगे कि मोदी जी अक्सर तभी रोते हैं जब इसके पीछे उनकी कोई बड़ी मंशा हो. और ऐसा अक्सर ही उनके रोने के बाद देश की राजनीति में देखा भी गया हो. #Modicrying #Moditears


 

Padwoman of Srinagar Jammu&Kashmir


 #padman #padwoman #sanitrypad

दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो कुछ अलग कर गुजरने की चाहत रखते हैं। ऐसी ही हैं भारत के श्रीनगर में रहने वाली ये महिला, जो अपने खर्चें से श्रीनगर की गरीब औरतों की सेहत का ना सिर्फ ख्याल रख रही हैं बल्कि उन्हें हर महीने होने वाली समास्या के प्रति भी जागरूक कर रही हैं।