Monday, September 26, 2011

आखिर राजबाला ने दम तोड़ दिया



दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ योग से अपनी काया दुरुस्त करने और देश से भ्रष्टाचार खत्म करने की मुहिम में शामिल राजबाला अब हमारे बीच नहीं है...आज उनका तीन महीने चली लंबी जद्दोजेहद खत्म हो गयी..वो आम आदमी की तरह सरकार रूपी मौत के आगे हार गयी। बेहद, दुख के साथ सभी लोग एक या दो दिन बाद राजबाला को भूल भी जाएंगे...क्योंकि प्रणब की मुलाकात चिंदबरम पर कोई ना कोई रंग लाकर रहेगी...मीडिया आज इस खबर को तभी तक चलाएगा...जब तक की चिंदबरम पर कोई पुख्ता बयान सरकार की ओर से नहीं आ जाता...एक बार सरकार का बयान आया नहीं की राजबाला पुरानी खबर हो जाएगी...राजबाला के घर पर शायद ही कोई रिपोर्टर पहुंचेगा...लेकिन राजबाला ने तो अपनी जान दी है...हालांकि रामदेव उनकी मौत को शहादत मान रहे हैं...जिसपर सरकार के कानून मंत्री ने धीरे से मोटी धमकी रामदेव को दे भी डाली है...उन्होंने साफ रामदेव को चेतावनी के अंदाज में कहा है कि राजबाला पर देश में राजनीति नहीं होनी चाहिए....कानून मंत्री के हाथ क्योंकि देश का कानून है...तो शायद उनसे कोई ये बात भी ना पूछे कि आखिर क्यों देश के लोग राजबाला की बात ना करें...क्यों राजबाला की मौत की जिम्मेदारी सरकार पर क्यों ना डाली जाए...अगर राजबाला की मौत की बजह दिल्ली पुलिस की लाठियां हैं...तो क्यों सरकार ने राजबाला का इलाज अच्छे से अच्छे अस्पताल में क्यों नहीं करवाया...क्यों राजबाला को तीन महीने तक मौत का इंतजार करवाया गया...क्यों उसे तिल तिल करके मर जाने दिया गया... राजबाला जीबी पंत अस्पताल में भर्ती थीं। राजबाला की मौत के विपक्ष राजनीतिक तौर पर इसे मुद्दा भी बनायेगा....वहीं ये मामला सुप्रीम कोर्ट और आयोगों के स्तर पर भी उठाए जाने की संभावना है। 51 वर्षीय राजबाला 4 जून की रात से ही जीबी पंत अस्पताल में एडमिट थीं। उनके शरीर में कई फ्रैक्चर थे। डॉक्टरों के मुताबिक राजबाला दो दिन से वेंटिलेटर पर थीं। गहरी चोट ही उनकी मौत की वजह बनीं। बाबा रामदेव के साथ अनशन पर बैठे लोगों पर पुलिस लाठीचार्ज का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। कोर्ट ने उस रात की पुलिस कार्रवाई की सीडी तलब की है। किन हालात में, किसने पुलिस ऐक्शन के आदेश दिए और किस तरह सोते हुए लोगों पर एक्शन हुआ, यह सब सवालों के घेरे में है। मानवाधिकार आयोग में भी शिकायतें हैं। राजबाला की मौत के बाद उन शिकायतों की गंभीरता और बढ़ गई हैं खैर राजबाला चली गयी...लेकिन अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गयी जिसके सवाल आने वाले दिनों में देश की सरकार को देने ही होंगे।

Tuesday, August 16, 2011

क्या ये सरकार आम आदमी की है ?


अन्ना हजारे को सात दिनों की हिरासत में भेजने के बाद दिल्ली पुलिस कमीश्नर वी के गुप्ता का ये कहना उन्होंने अन्ना हज़ारे और उनके कुछ समर्थकों को शांति भंग होने की आंशका की वजह से गिरफ़्तार किया है। बेहद ही शर्मनाक और हास्यपद वाकया प्रतीत होता है। हालांकि गिरफ्तारी से पहले अन्ना हजारे को विशेष अदालत में पेश किया गया है जहां निजी मुचलका देने से इनकार करने के बाद उन्हें सात दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। जबकि दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन कर रहे क़रीब 1400 लोगों को हिरासत में लिया गया।
ये वो खबर है...जो मीडिया के लोग चिल्ला चिल्ला कर चैनलों पर गा रहे थे....उन्हें टीआरपी की रेस में रहने के लिए लगातार ऐसी खबर देनी थी...जिसपर आम और खास आदमी की लगातार नजर बनी रहे...टीवी पर दनादन खबरों के बीच में चैनल बदलता जा रहा था...तभी देश के नंबर एक चैनल पर आकार मेरा हाथ रूक गया...यहां देश के दो बड़े पत्रकार आपस में बात कर रहे थे...इनमें से एक पत्रकार ऐसे हैं...जो देश का सबसे बड़ा अखबार चलाने का दम भरते हैं...दूसरे वो है जो अखबार के दफ्तर में कम और मनमोहन सोनिया के दरबार में ज्यादा दिखाई देते हैं। यहां बीच बहस में देश के जाने माने कुछ फिल्मी कलाकार भी कोढ़ में खाज की तरह उटपटांग सवाल इनसे पूछ रहे थे...जो बेशक पेट पकड़कर हंसाने के लिए काफी थे....इनमें से एक ने दूसरे से पूछा कि अन्ना को भला इतनी क्या जल्दी थी...लोकपाल बिल को लेकर अनशन करने की...और देश की व्यवस्था बिगाड़ने की...हमने इमरजेंसी का दौर देखा है...कहां है इमरजेंसी सभी कुछ तो ठीक चल रहा है...कहां हो रहा है ऐसे भ्रष्टाचार जिसपर इतनी चीख चिल्लाहाट अन्ना मचा रहे हैं...कहां है....ऐसे हालात की जनता त्राही त्राही कर रही है...इसपर दूसरे ने हां जी हां जी में सिर हिलाते हुए कहा आप ठीक कह रहे हैं...अन्ना बेवजह ही चीख चिल्ला रहे हैं...अन्ना को चाहिए कि वो चुनाव लड़े और संसद में आये और उसके बाद अपनी बात पटल पर रखे....पहले ने इसपर रियेक्ट करते हुए कहा...अगर वो चुनाव भी नहीं लड़ना चाहते तो देश के संविधान पर भरोसा रखे...और एक बहस हो जाने दें...जिसके बाद वो अपनी बात रखे...वाह रे हमारे देश के बुढ़े गिद्दों...तुम्हारी मां.......सालों...
खैर ये तो रही उन लोगों की बात जो समाज के ठेकेदार बनने का दावा करते हैं...अब जरा दिल्ली पुलिस का पूरा बयान पर भी गौर कर लेते हैं......दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता ने पत्रकारों को बताया कि किसी संज्ञेय अपराध की आशंका और शांति भंग की आशंका को देखते हुए अन्ना हज़ारे
, अरविंद केजरीवाल और उनके पांच अन्य सहयोगियों को धारा 107, 151 के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। कमिश्नर बीके गुप्ता के अनुसार किरण बेदी और शांति भूषण सहित क़रीब 14 सौ लोगों को धारा 65 के तहत हिरासत में लिया गया।
क्या अजीब बात है...एक समाजसेवी को दिल्ली पुलिस इसलिए गिरफ्तार कर लेती है...क्योंकि वो आम आदमी की आवाज उठाना चाहता है....उसके साथ आम जनता को इसलिए गिरफ्तार किया जाता है...क्योंकि वो अन्ना की आवाज बुलंद करके देश में एक ऐसा कानून लाना चाहते हैं...जो भ्रष्टाचार को खत्म करने का माद्दा रखता है.....वहीं कांग्रेसी नेता अन्ना को समाज का दुश्मन बताकर अपनी बांहों की आस्तीनों को ऊपर चढ़ाकर कामयाबी का दंभ भर रहे हैं....किसका देश है...ये कौन है ये कुछ लोग...जिन्हें इतने अधइकार मिल गए कि देश में कौन सही कर रहा है कौन गलत....ऐसा क्या कह दिया अन्ना ने जिसपर सरकार के कारिंदों को इतना गुस्सा है...खैर अन्ना अब तिहाड़ में हैं...और मैं यहीं सोच रहा हूं...कि आजादी के 64 साल बाद भी क्या ये देश आम आदमी का देश बन पाया है।

Monday, March 28, 2011

कुत्ता


एक दिन अचानक मेरे ऊपर एक कुत्ता भौंकते हुए झपटा

पहले मुझे गुस्सा आया और फिर अचानक ही एक ख्याल

मैंने सोचा कि यार कुत्ता आदमी का वफादार है...

फिर ये क्यों मुझपर भौंका क्यों मुझे काटने दौड़ा....

ये सोचते सोचते मैं घर पहुंचा

हाथ मुंह धोए, खाना खाया और सो गया...

लेकिन कहीं ना कहीं ये ख्याल मेरे दिमाग में घूमता ही रहा...

फिर दूसरे दिन दफ्तर जाते वक्त मैंने फिर से उसी कुत्ते को देखा

आज कुत्ता अपनी पूछ दवाएं बैठा था...

उसकी आंखों में जब मैंने झांक कर देखने की कोशिश की

तो पाया आंखें भी उसकी नम थी...

हिम्मत जुटाई पास गया...

बीती रात मुझपर भौंकने वाला कुत्ता आज शांत था...

देखकर मुझे पूछ हिलाता कुत्ता मेरे पैर चाटने लगा...

मुझे पहले हैरानी हुई...लेकिन तभी एक बदबू का भवका मेरे नाथुनों से टकराया

पास ही में एक मरे हुए कुत्ते के बच्चे का शव था...

जिसे कोई मोटर चालक कुचल गया था..

Thursday, January 20, 2011

नई बोतल में पुरानी शराब


मनोहन सिंह मंत्रिमंडल का विस्तार आखिरकार हो गया। इसमें तीन नये चेहरों को शामिल किया गया है। अधिकतर मंत्रियों के विभाग परिवर्तन किए गए हैं...लेकिन किसी भी मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाया नही गया है। साथ इस विस्तार में मिशन यूपी 2012 की झलक खूब देखने को मिली। ढेड़ साल पुरानी मनमोहन सरकार के मंत्रिमंडल में पहला फेरबदल बुधवार शाम को किया गया। इसमें एक स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री और दो राज्यमंत्रियों समेत कुल तीन नए चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल किए गए। जबकि तीन राज्यमंत्रियों को प्रमोट करके कैबिन मंत्री का दर्जा दिया गया है। इसके अलावा कई मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया गया है। इस मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए सरकार ने नई बोतल में पुरानी शराब डाल दी है। और साथ ही उत्तर प्रदेश में 2012 में होनें वाले विधान सभा चुनाव पर निशाना साधते हुए यूपी से बेनी प्रसाद वर्मा को मंत्रिमंडल में जगह दे दी है। सलमान खुर्शीद और श्री प्रकाश जयसवाल का प्रमोशन भी दिया गया ताकि अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग के वोटर को रिझाया जा सके। वहीं कैबिनेट में बदलाव के साथ मनमोहन ने एक बार फिर महंगाई पर काबू पाने की बात कही....और एक बार फिर आश्वासन का झुनझुना पकड़ा कर जोर का झटका धीरे से देते हुए कहा कि...वो कोई ज्योतिषी नहीं हैं जो महंगाई कब तक रूकेगी इसका ठीक समय बता दें। इसके अलावा कैबिनेट विस्तार से आम जनता को उम्मीद थी कि कैबिनेट से दागी मंत्रियों का पत्ता साफ हो जायेगा....लेकिन शहरी विकास मंत्री एस. जयपाल रेड्डी को पेट्रोलियम मंत्रालय सौंपा गया। वहीं खेलमंत्री रहे एम.एस. गिल को भी सांख्यिकी एवं क्रियान्वयन मंत्रालय सौंपकर मंत्रिमंडल में बरकार रखा गया...परफोर्मेंस और पारदर्शिता की बात करने वाली सरकार ने अपने कई और दागी और नाकाम मंत्रियों को मंत्रिमंडल में बनाए रखा है...सरकार का ये भी कहना है कि बजट के बाद मंत्रीमडंल में फिर से बदलाव किए जायेंगे। बहरहाल, मनमोहन सरकार में हुए पहले फेरबदल से देश की जनता को खासी उम्मीद थी जिसपर सरकार खरी उतरती तो बेशक नजर नहीं आयी।

Wednesday, January 19, 2011

मासूमों के नाम पर कमाई


दिल्ली सरकार ने सभी नीजि स्कूलों को ये आदेश दिए हैं कि वो अपने स्कूलों में 25 फीसद सीटों पर कमजोर वर्ग के बच्चों को दाखिला दें। लेकिन इस मामले में दिल्ली के सभी बड़े स्कूल नाक भौ सिकोड़ रहे हैं। स्कूलों का कहना है कि इस तरह से उनके स्कूल का बजट खराब हो जायेगा जिसका भुगतान शेष 75 फीसद बच्चों को बढ़ी हुई फीस चुका कर पूरा करना होगा। यानी स्कूल अपने बजट से गरीब बच्चों को नहीं पढ़ायेगा। स्कूल अपनी कमाई को किसी हाल में कम नहीं होने देगा।

यानी नीजि स्कूल किसी भी हालत में देश गरीबों को शिक्षा नहीं देंगे। वहीं अगर स्कूलों के कारनामों और घोटालों पर नजर डाली जाये तो दिल्ली के अधिकतर नीजि स्कूलों ने सरकार से बाजार से आधी से कम कीमत पर स्कूल चलाने के लिए जमीन ली है... जमीन के अलावा स्कूल टैक्स में रियायत लेते हैं। गरीबों के नाम से हर साल नीजि स्कूल लाखों रुपये की डोनेशन और फंड खा जाते हैं अलग से।

मामला यहीं रुकता तो भी ठीक था....दिल्ली के कई नामी स्कूल हर साल गरीबों के नाम से स्पेशल क्लास देने के नाम से फंड खा रहे हैं....इसमें दिल्ली का डॉन बॉस्को स्कूल और कालका पब्लिक स्कूल जैसे नामी नाम हैं। ये दोनों स्कूल गरीब बच्चों को एक्सट्रा क्लास देते हैं और वोकेशनल कोर्सस के नाम से अलग से क्लास चलाते हैं...लेकिन ये क्लासेस महज कागजी कार्यवाही है। यहां डॉनबॉस्को में गरीबों के लिए क्लास के नाम पर खैरात बांटने का काम चलता है। शाम को स्कूल बंद होने के बाद पांच से सात बजे तक गरीब बच्चों को यहां पढ़ाया जाता है वो भी स्कूल में बने प्रगाढ़ के खुले हाल में...जहां से बच्चों को न तो स्कूल में जाने की इज्जात होती है औऱ न ही क्लास में दाखिल होने की...यहीं पर बिछे मैट पर ये बच्चे पढ़ते हैं... और स्कूल दिल्ली सरकार से गरीब बच्चों के लिए मोटा फंड लेता है...कागजों में दिखाया जाता है कि उसने इन बच्चों को साधारण स्कूल के बच्चों के साथ ही पढ़ाया है औऱ उन्ही के साथ शिक्षा दीक्षा दे रहा है। ठीक इसी तरह से कालका पब्लिक स्कूल का भी हाल है। ये स्कूल गरीब बच्चों के लिए क्लास चलाते हैं...लेकिन क्लास कहां औऱ किस समय चलती हैं...ये या तो स्कूल के मैनेंजमेंट को पता है या फिर दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग को...इसके अलावा इन कक्षाओं के किसी को जानकारी नहीं है।

Thursday, January 13, 2011

दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ


सेठ मुझे क्या तुमने बदमाश समझा हुआ है जो दस 20 लाख रुपये का रिश्वत लेगा....लेकिन में तुम्हारा दिल नहीं तोड़ेगा....एक काम करो ....वो जो बिल्डिंग तुम बना रहे हो उसमें से ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट मेरी बीबी के नाम कर दो...लेकिन इंस्पेक्टर साहब वो तो ढेड़ करोड़ रुपये का है...अबे तो क्या हुआ क्या तेरी जान से ज्यादा कीमती है। ये डायलॉग फिल्म वांटेड का है जिसमें संजय मांजेरकर एक पुलिसवाले का किरदार निभा रहे हैं और एक बिल्डर की शिकायत पर बदमाशों को इनकाउंटर करते हैं....जिसके बदले में वो बिल्डर से ये डिमांड रखते हैं। ये फिल्म की बात है लेकिन असल जिंदगी में भी पुलिस का चेहरा ठीक ऐसा ही है। दिल्ली पुलिस देश के सबसे तेज तर्रार और आधुनिक पुलिस मानी जाती है। लेकिन हाल ही में दिल्ली पुलिस के कमीश्नर वी के गुप्ता ने कहा है कि दिल्ली को सुधारने में अभी तीन साल का समय लगेगा। यानी तीन साल में दिल्ली में यूं ही कत्ले आम और मारकाट मची रहेगी। लोगों को सरेआम बदमाश लूट लेंगे और दिल्ली पुलिस तीन साल तक दिल्ली में सुधार करने के तरीकों पर विचार करती रहेगी।

ये कैसा बयान है और इस बयान के माध्यम से कमीश्नर साहब क्या कहना चाहते हैं। हालांकि ये बात ठीक है कि दिल्ली में लगातार भीड़ बढ़ रही है और यहां की कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए दिल्ली पुलिस को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन दिल्ली में पुलिस की तैनाती और कार्यकुशलता की अगर बात की जाये तो दिल्ली पुलिस देश की सबसे हाईटेक और भरोसेमंद पुलिस मानी जाती है। इसके पास वो सभी नयी तकनीक है जो आधुनिक पुलिस के पास होनी चाहिए। लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस बदमाशों के पीछे लकीर पिटती नजर आती है। इसका पहला कारण ये भी है कि दिल्ली पुलिस में कई सालों से सिपाहियों को नई तकनीकों की ट्रेनिग नहीं दी गयी है। वहीं दिल्ली पुलिस अभी भी पुराने ढर्रे पर चलकर बदमाशों को पकड़ने के लिए मुखबिरों पर ही आश्रित है। हालांकि मुखबिर हमेशा से ही एक अच्छा सोर्स ऑफ इंफोर्मेशन रहे हैं...लेकिन यहां दिल्ली पुलिस की हाईटेक तकनीक पर अगर गौर डाले तो दिल्ली पुलिस के पास लोकल एरिया पर चौंकसी ना के बराबर है। पुलिस का लोकल नेटवर्क कमजोर है। लोकल स्तर पर पुलिस केवल हफ्ता और महीने की पत्ती पर ही जोर देती है। किस थाने से कितना आ रहा है इसका पूरा ब्यौरा सिपाही थानेदार और फिर थानेदार अपने से ऊपर और ऊपर से और ऊपर तक पहुंचाता है। थानों की नीलामी होती है और हर थाने से महीना फिक्स्ड होता है। अगर आपको यकीन नहीं है तो दिल्ली पुलिस के सिपाहियों और उनके अफसरों के घर जाकर देखिए... आपको यकीन हो जायेगा कि कम समय में तरक्की कैसे पायी जाती है। दिल्ली के किसी भी सिपाही के पास कम से कम एक करोड़ रुपये की संपत्ति है। ये सिपाहियों की संपत्ति है....अगर ठीक इसी तरह से अगर अफसरों की कमाई का ब्यौरा मांगा जाये तो साधारण आदमी के होश फाख्ता हो जाएंगे। दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों की आजतक किसी ने आय का ब्यौरा नहीं मांगा न ही अफसरों की कमाई की जांच की गई। हां इक्का दुक्का अफसर जरूर छोटे मोटे घपले में आता रहा जिसे यूं ही रफा दफा कर दिया गया।

Saturday, December 18, 2010

‘सेवा एवं समर्पण के 125 वर्ष’


कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भले ही अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी के तारीफ में दिन रात कसीदे पढ़ते न थकते हों...और उनकी मौजूदगी को...पार्टी की परंपरा का मजबूत आधार मानते हों...लेकिन असल कहानी कुछ और ही है...आप ये बात सुनकर थोड़ा हैरान जरूर होंगे...लेकिन ये हकीकत है। हम आपको बताते हैं कि सोनिया की अध्यक्षता में कांग्रेस क्या वाकई परंपरा को निभा पा रही है। कांग्रेस में ये परंपरा रही है कि पार्टी के ब्लाक स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन दो साल में एक बार हो...लेकिन सोनिया गांधी ने जब से पार्टी की कमान संभाली...ये अधिवेशन तीन साल में एक बार होना तय हुआ...लेकिन पार्टी इस परंपरा को कायम नहीं रख पाई...और पहली बार ऐसा हो रहा है कि...कांग्रेस का महाअधिवेश जो दिल्ली में चल रहा है....पांच साल बाद आयोजित किया जा रहा है। यही नहीं, पहली बार ऐसा होगा जब कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित इस महाअधिवेश में पार्टी कार्यकर्ता ही अपनी ही पार्टी के बडे़ नेताओं से नहीं मिलेंगे। कांग्रेस महाधिवेशन की परंपरा रही है कि, पार्टी के बड़े नेता महाअधिवेश स्थल पर बडे़ मुद्दों की चर्चा पार्टी कार्यकर्ताओं से पहले सत्र में करें। लेकिन ये पहली बार होगा....जब बड़े नेता किसी भी कार्यकर्ता से बात नहीं करेंगे...यही नहीं सोनियां गांधी के अध्यक्ष रहते कांग्रेस की एक और परंपरा खत्म हो गई है...पीसीसी, एआईसीसी, और कांग्रेस की दूसरी बड़ी मिटिंग जो साल में तीन या चार बार हुआ करती थी...लगभग समाप्त हो चुकी हैं....हलांकि एक बार फिर कांग्रेस को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने के लिए.....सोनिया गांधी महाअधिवेश में भ्रष्टाचार, महंगाई, और दूसरे बड़े मद्दों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुखातिब होंगी.....लेकिन ये बात गौर करने वाली होगी कि....क्या सोनियां गांधी असल में कांग्रेस और उसकी परंपराओं को मजबूती प्रदान कर पाएंगी...वो भी तब जब कि सरकार को कई मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को जवाब देना है।

Friday, November 26, 2010

दोस्त

कुछ तो रहा ही होगा उसके दिल में
रिश्तों में खटास यूं ही आया नहीं करती।

वक्त लगता है बीज को वृक्ष होने में
यूं ही कोई किसी को छाया दिया नहीं करता।

था वो सैंकड़ों लाखों परिंदों का घर
यूं ही कोई पेड़ काटकर किसी का घर उजाड़ा नहीं करता।

सीने में खंजर इस दुनिया में दुश्मन कहां उतारते हैं
अपने बनकर ही पीठ में खंजर अक्सर लोग उतारा करते हैं।

वो दोस्त ही था मेरा ऐसा वो अक्सर कहता था।
एक रोज उसने हाथ भी रखा था पार्थ किश्लय के सर पर
कहा था मेरी पत्नी को अपनी बहू भी खुले में....

फिर अचानक एक कहानी फिर खुद को दोहरा गई...
सुना थी जो बचपन में अपने पिता से मैंने कई बार

पिता जी कहते थे दो दोस्ती थी राजा और रंक के बीच
बड़ी अजीज

रहते न था एक दूसरे के बगैर

फिर एक दिन एक शैतान ने तोड़ी उनकी दोस्ती

फुसफुसाकर कान में गरीब के कुछ कहने का बहाना किया
अमीर देखता रहा.. पास आया और गरीब को उल्हाना दिया।
गरीब चाह कर भी सफाई में कुछ न कह पाया
अमीर का पारा आसमान पर चढ़ा
और दोस्ती जमीन पर निढाल पड़ी रह गई।

Monday, October 4, 2010

राम हो गये लीगल


अयोध्या पर आये फैसले के बाद भले ही देश के दो समुदाय सुप्रीम कोर्ट जाने का मन बना रहे हो, लेकिन भगवान राम को एक बात का आराम अवश्य ही हो गया होगा। और वो ये है कि अब राम लीगल हो गए हैं। यानी ये तो कम से कम तय हुआ कि अयोध्या में ही राम का जन्म हुआ था। चाहे वह आस्था के नाम पर हुआ या फिर किसी और आधार पर, लेकिन राम को अब ये आराम है कि वह इस देश में एक टुकड़े के कानूनी रूप से मालिक हो गए हैं। वैसे तो राम सभी के हैं और उनका निवास हर उस आदमी के दिल में है जो उनका स्मरण करता है। राम को किसी जमीन की भी आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पिछले पांच सौ सालों से राम का जिस तरह से हिंदुओं के दिल से अस्तित्व मिटाने का कार्य हुआ उसके चलते ये आवश्यक हो चला था कि राम को जमीन मिले। दुनिया भर के कुछ बुद्धिजीवी लगातार इस बात की फिराक में थे कि वह राम का अस्तित्व मिटा दें। वह लगातार तर्क दे रहे थे कि राम मात्र एक कथा है राम एक सोच है। और इससे ज्यादा कुछ नहीं। यहां तक की राम को बदनाम करने के लिए ये तक कह दिया गया कि ये किसी छोटे से राज्य या प्रदेश की कोई छोटी मोटी कथा है जिसे गढ़ दिया गया है। बावजूद इसके राम इन सभी से ऊपर राम राज्य की स्थापना और प्रेम भाईचारे का संदेश देते रहे।
शांति के पथ पर चलते हुए राम हमेशा की तरह हर तरह की बुराईयों को मात देते हुए फिर एक बार विजयी हुए। राम को अधिकार भी मिला और उन्हें मानने वालों को ये परिणाम की राम सिर्फ एक विचार ही नहीं है वह एक ऐसी विरासत है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर आगे बढ़ती रहेगी और जब तक इस दुनिया का अस्तित्व रहेगा राम भी हमारे सांसों में रहेंगे।

Monday, September 27, 2010

दिल्ली का कोढ़ रंगीन पट्टियों में बंद


एक सर्वे के मुताबिक जो 2004-05 में हुआ था उसके मुताबिक दिल्ली में 635 middle schools, 2,515 primary schools, 1,208 senior secondary schools और 504 secondary schools हैं। दिल्ली के इन स्कूलों में तकरीबन 15 लाख विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं।

इनमें प्राइवेट स्कूल शामिल नहीं हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली के सभी स्कूल बंद रहेंगे और इनमें पढ़ने वाले बच्चे पूरे 15 दिन शिक्षा से वंचित रहेंगे। यहां सवाल ये उठता है कि आखिर खेलों के दौरान स्कूल बंद करने की क्या आवश्यकता थी। स्कूलों के बच्चों का इसमें क्या कसूर था कि वह स्कूल ही न जाए। पहले खेलों के मद्देनजर बच्चों के मध्य सालाना इम्तहान पहले हो गए। जबरदस्ती बच्चों को स्लैबस दो महीने पहले ही पढ़ा दिया गया।

दूसरा सवाल ये है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिकतर गरीब घरों से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में परिवार के लोग बच्चों को सरकारी स्कूलों में इसलिए भी भेजते हैं कि उन्हें वहां एक समय का अच्छा भोजन मिलता है जिससे उनके बच्चों की शिक्षा के साथ पालन पोषण ठीक हो रहा है। कम से कम बच्चों को पढ़ाई के साथ एक समय का भोजन तो मिल ही रहा है।

अब 15 दिन इन बच्चों को न तो भोजन ही मिलेगा और न ही शिक्षा। चलो ये भी मान लिया जाए कि अगर 15 दिन भोजन नहीं भी मिला तो क्या फर्क पड़ने वाला है, लेकिन पढ़ाई अगर समय पर नहीं हुई तो उसका असर तो पड़ेगा ही। अब यहां दिल्ली सरकार ये भी कह सकती है कि हम दिल्ली के शिक्षकों को सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं लेने के लिए कहेंगे। चलो ठीक है सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं हो जाएगी लेकिन क्या उससे पढ़ाई अपने ट्रेक पर आ जाएगी।

ठीक इसी तरह से दिल्ली मजदूरों को 15 दिन तक दिल्ली में फेरी करने पर रोक होगी। इसमें रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेताओं और रेहड़ी वालों को 15 दिन घर में ही बंद रहना होगा। यानी की रोज कुंआ खोदकर पानी पीने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान या तो भूखे मरेंगे या फिर हर दिन पानी पी पीकर दिल्ली सरकार को कोसते रहेंगे। ठीक ऐसा ही दिल्ली के भीखारियों के साथ होने वाला है। दिल्ली के भीखारी 15 दिन सड़कों पर नहीं दिखाई देंगे। यानी कुल मिलाकर दिल्ली के कोढ़ सरकार रंगीन पट्टी लगाकर ढांप देना चाहती है।