Wednesday, September 29, 2021

चरणजीत चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस ने किए एक तीर से कई शिकार !!

पंजाब में सियासी तूफान

-कैप्टन के बिना आसान नहीं है कांग्रेस की राह

पंजाब के इतिहास में चरणजीत सिंह चन्नी का नाम पहले अनुसूचित जाति के मुख्यमंत्री के रूप में लिखा जाएगा। इससे पहले 60 के दशक में बिहार में भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने थे। बिहार में दलित मुख्यमंत्री बनने के बाद भी दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया और आज भी बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े, अति पिछड़े हाशिये पर ही है। अब पंजाब में चरणजीत सिंह सिंह चन्नी को लेकर देश की सियासत में दलित नेतृत्व को लेकर बहस छिड़ी है। पंजाब की राजनीति में चरणजीत सिंह चन्नी को लेकर सियासी लोग ये कयास भी लगा रहे हैं कि मौजूदा पंजाब के सीएम सिर्फ कांग्रेस के लिए एक मोहरा हैं। 


कांग्रेस पार्टी ने एक अनुसूचित जाति का मुख्यमंत्री बना कर एक तीर से कई शिकार कर दिए हैं। अपना कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले ही कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बनी अनिश्चितता की स्थिति में कांग्रेस आला कमान ने सबसे पहले पंजाब में एक नये प्रयोग के रूप में पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व  पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ को एक हिंदू नेता के रूप में मुख्यमंत्री बनाना चाहा, उसके बाद एक और जाट सिख नेता व कैप्टन सरकार के कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के नाम पर चर्चा चली। मगर जब इन दोनों ही नेताओं के नाम पर आम सहमति ना बनी तो राहुल गांधी और आलाकमान ने तीन बार के विधायक और कैप्टन सरकार के ही दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले  एक मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी(58) को मुख्यमंत्री बना कर सबको चौंका दिया।


कांग्रेस आलाकमान का यह एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक था जिससे न केवल पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सहित उनके सभी समर्थक विधायकों व पूर्व मंत्रियों को भी चन्नी के नाम पर अपनी सहमति प्रकट करनी पड़ी बल्कि विपक्षी दलों को कांग्रेस के इस दलित कार्ड के सामने पंजाब में दलित वोटरों के लिए तैयार किया गया एक मुद्दा खोना पड़ा। 


इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा चुनाव से पहले एक जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा और पंजाब के बड़े हिंदू नेता ओम प्रकाश सोनी को भी डिप्टी सीएम बनाकर विरोधियों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।


कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के इस निर्णय से  पंजाब के 32 प्रतिशत दलित समाज को उनका मुख्यमंत्री देकर आने वाले चुनाव में अकाली बसपा और भाजपा के किसी दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने के मुद्दे पर भी सेंधमारी कर दी है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा और अकाली दल दलित को उपमुख्यमंत्री बनाने की केवल घोषणाएं ही करते हैं और कांग्रेस ने तो राज्य को पहला दलित मुख्यमंत्री देकर यह सिद्ध कर दिखाया है कि वे कितने बड़े दलित हितैषी हैं। 


पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिद्धू ने भी उनके  अपने चहेते चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कैप्टन अमरिंदर सिंह को एक करारी शिकस्त दी। वैसे भी चन्नी ने सिद्धू के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में एक अहम भूमिका निभाई है।


बीजेपी और आम आदमी पार्टी भी राज्य में हिंदू मतदाताओं को अपना वोट बैंक मानकर अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है। ऐसे में चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस ने राज्य में ओपी सोनी जैसे पांच बार विधायक रहे बड़े कद के हिंदू चेहरे को उप  मुख्यमंत्री का पद देकर विपक्षी दलों के हिंदू वोटरों को रिझाने के बड़े मुद्दे  को भी हथिया लिया है। यानी एक दलित चेहरे चन्नी को मुख्यमंत्री, जाट सिख सुखजिंदर सिंह रंधावा को उप मुख्यमंत्री व ओपी सोनी जैसे बड़े हिंदू नेता को उप मुख्यमंत्री पद देकर राज्य के सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश की है।


चन्नी के सामने हैं चुनौतियां बहुत हैं


कांग्रेस आलाकमान एक दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बना कर पंजाब में बेशक इसे अपना एक मास्टर स्ट्रोक मान रही है मगर विधान सभा चुनावों से पहले  कांग्रेस और चन्नी के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता को दरकिनार कर सिद्धू के साथ मिलकर चलने से चन्नी पंजाब कांग्रेस में होने वाली बगावत को रोक पाएंगे? इसके अलावा जैसा कि पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत ने चन्नी के नाम की घोषणा होते ही यह ऐलान कर दिया कि आने वाला चुनाव पंजाब कांग्रेस नवजोत सिद्धू के नेतृत्व में ही लड़ेगी। उनके ऐसा कहते ही पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने इसका जबरदस्त विरोध करते हुए कहा कि इससे मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी की छवि पर असर नहीं पड़ेगा। इसका यह संदेश तो लोगों के बीच नहीं जाएगा कि चन्नी केवल 6 महीने के लिए ही एक पार्टटाईम मुख्यमंत्री बनाए गए हैं, उसके बाद तो सिद्धू ही मुख्यमंत्री होंगे।


इसके अलावा कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो है कि राज्य में चुनावों में केवल छह महीने का वक्त बचा है ऐसे में चन्नी इतने कम समय में क्या कुछ कर पाएंगे और लोगों की अपेक्षाओं पर कैसे खरे उतर पाएंगे?  इसके साथ ही चरणजीत चन्नी और उनकी सरकार को पिछले पांच साल में कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए कामों और जनता से किए गए वायदों को पूरा करने के बारे में भी जनता को जवाब देना पड़ेगा जो कि इतना आसान नहीं होगा।   


कैप्टन के बिना बहुत कठिन है डगर चुनावों की

चरणजीत चन्नी के लिए कैप्टन समर्थित बागी विधायकों को संभालने के साथ-साथ चुनावों में अकाली भाजपा और आम आदमी पार्टी  जैसे प्रमुख विपक्षी दल का सामना कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे बड़े नेता के बिना करना है। अमरिंदर सिंह पहले ही कह चुके हैं कि यदि सिद्धू पंजाब के सीएम बनते हैं तो वे उसका जम कर विरोध करेंगे। सिद्धू को कैप्टन पहले ही इमरान खान और बाजवा समर्थक और राष्ट्र विरोधी तक कह चुके हैं। इसका सीधा सीधा नुकसान सिद्धू और कांग्रेस को आने वाले चुनावों में होगा। यानी कांग्रेस को भाजपा, अकाली, आम आदमी पार्टी  के साथ साथ कैप्टन का भी सामना करना पड़ेगा, जो कि इतना आसान नहीं होगा। किसान आंदोलन के कारण कांग्रेस की जो स्थिति पंजाब में मजबूत हुई थी अब वो सिद्धू कैप्टन के झगड़े के कारण बिखरी नजर आ रही है। 

 

अब कैप्टन के सामने क्या है रास्ता

पिछले 54 साल से राजनीति में रहे पंजाब कांग्रेस के बड़े नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनावों से पहले यूं दरकिनार करना कांग्रेस के लिए काफी नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। कांग्रेस ने सिद्धू के रूप में अमरिंदर सिंह का विकल्प चुना है जो कि उनके लिए एक जुए से कम नहीं है। क्योंकि कैप्टन शुरू से ही सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर विरोध कर रहे हैं। कैप्टन ने तो सिद्धू के इमरान खान और जनरल बाजवा के साथ संबंधों को लेकर सिद्धू को देश की सुरक्षा के लिए खतरा तक कह डाला। अब यदि कांग्रेस आगामी चुनावों में सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करती है तो कैप्टन जैसे कद्दावर नेता की बात का कुछ तो असर पंजाब की जनता पर होगा। कैप्टन  की नाराजगी का खामियाजा तो कांग्रेस को भुगतना ही पड़ेगा।


हालांकि अभी तो कैप्टन कांग्रेस में ही हैं और उन्होंने कांग्रेस और विधायक से अपना इस्तीफा नहीं दिया है। मगर उनका चुनावों में सिद्धू के साथ मिलकर चुनावों में जाना लगभग असंभव लगता है। वैसे भी कैप्टन पहले ही कांग्रेस आलाकमान को कह चुके हैं कि उन्हें बहुत अपमानित किया गया, इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी त्याग दिया। अब सवाल यह है कि यदि कैप्टन कांग्रेस के लिए प्रचार नहीं करते और कांग्रेस की ओर से चुनाव नहीं लड़ते तो उनका राजनैतिक भविष्य क्या होगा। कैप्टन पहले ही स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि वे एक सैनिक हैं और अंत तक लड़ते रहेंगे। यह लड़ाई सिद्धू ने शुरु की है और वे इसे जीत कर ही दम लेंगे। यानी संकेत स्पष्ट है कि वे सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकने में पूरी ताकत लगा देंगे। 



अब यदि कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से रोकना है तो उन्हें किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में जाना होगा। कैप्टन का कद पंजाब में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में इतना बड़ा है कि चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या आम आदमी जैसा पंजाब का प्रमुख विपक्षी दल, कोई भी पंजाब के महाराजा  कैप्टन अमरिंदर सिंह के स्वागत में पलक बिछाए तैयार है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद कैप्टन ने इस बात से कभी भी इंकार नहीं किया कि वे किसी अन्य पार्टी में जा सकते हैं। इस सवाल पर उन्होंने केवल इतना ही कहा कि वे अपने समर्थकों, शुभचिंतकों और साथियों से सलाह मशवरे के बाद ही कोई फैसला करेंगे। यानी उनका किसी भी अन्य राजनैतिक दल में जाने की संभावानाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा सीधा खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।


कौन  हैं चरणजीत सिंह चन्नी

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मोहाली जिले की खरड़ तहसील के गांव के रहने वाले हैं, इनका जन्म एक बेहद साधारण दलित परिवार में हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए व लॉ कर चुके चरणजीत चन्नी का राजनीतिक सफर 1993 में खरड़ नगर परिषद के पार्षद के रूप में हुआ। वे पंजाब के श्री चमकौर साहिब विधानसभा से तीन बार विधायक रहे। 2015 से 2016 तक उन्हें अकाली भाजपा सरकार के दौरान विपक्षी दल का नेता भी नियुक्त किया गया। मार्च 2017 में उन्हें कैप्टन सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर टेक्निकल एजुकेशन व इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग मंत्री बनाया गया। चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब विश्वविद्यालय से   पीएचडी भी कर रहे हैं। चरणजीत चन्नी की पत्नी डॉ..कमलजीत कौर खरड़ में ही एसएमओ के पद पर तैनात हैं।





Tuesday, August 3, 2021

मध्य प्रदेश के बाद अब पंजाब में फूट डालो राज करो का इतिहास दोहरायेगी बीजेपी

मध्य प्रदेश में कांग्रेस चुनाव जीती। चुनाव के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए। लेकिन कांग्रेस की आपसी फूट, गुटबाजी और कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के अहम के आगे मध्यप्रदेश में सरकार एक साल 93 दिन में ही औंधे मुंह गिर गयी।

बीजेपी की मध्य प्रदेश में सरकार बनी और ज्योतिरादित्य अपने विधायकों के साथ आज बीजेपी के साथ हैं। कुछ ऐसा ही होते होते रह गया राजस्थान में। लेकिन, असम में बीजेपी ने कांग्रेस की गुटबाजी और फूट का फायदा उठाकर फिर एक बार मास्टरस्ट्रोक खेलकर सरकार बना ली।

अब बारी पंजाब की है। पंजाब में राहुल गांधी आगामी विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन के सहारे पंजाब में हेडलाइन बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

कैप्टन अमरेन्द्र सिंह किसान आंदोलन के साथ अपने आप को जोड़ नहीं पाये और पार्टी वर्कर भी कैप्टन के महाराजा स्टाइल से


 

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का पंजाब के बागी सिपाही नवजोत सिंह सिद्धू  से मिलना और उसका जोरशोर से प्रचार करना और फिर पंजाब अध्यक्ष की कमान सौंप देना आखिर हेडलाइन बदलना नहीं तो और क्या है। अब पंजाब में सिद्धु की पंजाब कांग्रेस की ताजपोशी इस बात की तस्दीक है कि कांग्रेस अब पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धु के साथ ही आगमी विधानसभा चुनाव की पारी भी खेलना चाहती है।

लेकिन, क्या बीजेपी कांग्रेस में चल रही इस रस्साकस्सी को समझना नहीं चाहती या फिर वो एक मौके की तलाश में है। और बीजेपी पंजाब को भी मध्य प्रदेश की तर्ज पर लाकर एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेलकर पंजाब में कैप्टन को अपने पाले में ले आए।

बीजेपी की चुप्पी के मायने क्या हो सकते हैं

कांग्रेस के दो मौजूदा मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिनके खिलाफ बीजेपी बोलने से परहेज बरतती है, या कम बोलती है - कैप्टन अमरिंदर सिंह और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल।

देखा जाये तो ये दोनों ही मुख्यमंत्री बीजेपी के निशाने पर होने के साथ साथ कांग्रेस आलाकमान के सामने भी - सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट के फॉर्मूले पर भी अव्वल ही नजर आते हैं। खासकर, अगर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से तुलना करके देखें तो - और दोनों में भी देखें तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कहीं ज्यादा मजबूत नजर आते हैं।

कैप्टन राजनीति के पुराने धुरंधर हैं। वो जानते हैं कि गुगली पर कब पीछे हटना है या कब आगे आकार बॉल को बॉउन्ड्री वॉल से बाहर निकालना है। वो शायरी नहीं करते और तुक्कबंदी भी नहीं करते। लेकिन, उनके दांव कट जाये ऐसा उनके कैरियर के ग्राफ में देखने को नहीं मिलता। 

सैम पित्रोदा थ्योरी के हिसाब से देखें तो मध्य प्रदेश में जो 'हुआ तो हुआ' - और राजस्थान में जो 'होगा तो होगा', लेकिन अगर पंजाब में कुछ ऐसा वैसा होता है तो वो वो पंजाब और राजस्थान से भी बुरा हो सकता है। कांग्रेस पंजाब के राजनीतिक एक्सप्रेसवे पर रफ्तार तो भर रही है, लेकिन गियर नहीं बदल रही है। सामने बोर्ड पर पढ़ भी रही है, जिस पर लिखा है - आगे खतरनाक मोड़ है और मोड़ के आसपास बीजेपी नेतृत्व ही नहीं, अरविंद केजरीवाल और बादल परिवार भी मौके के इंतजार में बैठा है।

यानी पंजाब में हर मोड़ पर खतरनाक कट है। 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी' अलर्ट को नजरअंदाज किया तो पंजाब में असम का इतिहास दोहराते बीजेपी को देर नहीं लगेगी। और अगर बीजेपी ने जरा भी अधिक दिलचस्पी लेने शुरू कर दी तो कैप्टन को ज्योतिरादित्य सिंधिया बनते भी देर नहीं लगेगी। 

कैप्टन और ज्योतिरादित्य में फर्क है

कैप्टन कट्टर कांग्रेसी है। इस बात में दो राय नहीं है। लेकिन, जिस तरह का घटनाक्रम पंजाब में पिछले एक साल के दौरान देखने को मिला है। उससे कैप्टन अनिभिज्ञ भी नहीं है।

सिद्धू की ताजपोशी में कैप्टन शामिल बेशक हुए। लेकिन, सिद्धु का मंच से एक बार भी कैप्टन की निगरानी में कांग्रेस को आगे बढ़ाने की बात उन्होंने नहीं की। हां, इतना जरूर कहा कि मैं पंजाब के अपने सभी सीनियर्स लीडर्स की देखरेख में ही पंजाब कांग्रेस को आगे लेकर चलूंगा।  

कैप्टन को इस बात का भी अहसास है कि सिद्धु सिर्फ पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष तक ही रूकने वाला खिलाड़ी नहीं है। और मौजूदा हाल में पंजाब के मामले में सोनिया गांधी के फैसले की घड़ी आने तक राहुल गांधी को सिद्धू और कैप्टन दोनों को संभालना ही होगा - और आगे तो चुनौतियां हजार दिखती हैं।

हाल फिलहाल एक-दो मीडिया रिपोर्ट के जरिये राहुल गांधी की आशंका भी सूत्रों के हवाले से सामने आयी है - राहुल गांधी ने, एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब से मिलने आये असंतुष्‍ट कांग्रेस नेताओं से बातचीत में पूछा था कि कैप्‍टन अमरिंदर सिंह को अगर अगले विधानसभा चुनाव में चेहरा न बनाया जाये तो कितने विधायक बगावत करेंगे? अब तक ये बात सामने नहीं आयी है कि राहुल गांधी के मन में नवजोत सिंह सिद्धू को लेकर कभी ऐसी कोई आशंका रही है या अब तक भी है या नहीं?

जिस तरह से सिद्धू अपने राजनीतिक कॅरिअर को पटरी पर लाने के लिए परेशान हैं। ठीक उसी तरह से बीजेपी भी पंजाब में अपने वर्चस्व खोज रही है। अकालियों से बीजेपी का तलाक हो गया है। आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से बीजेपी की पटरी मेल नहीं खाती। ऐसे में बीजेपी की सीधी टक्कर कांग्रेस से है। कैप्टन अमरिंदर सिंह मौजूदा समय में बीजेपी को एक अच्छा अवसर प्रदान कर सकते हैं। क्योंकि पंजाब में अभी भी कैप्टन की राजनीतिक पकड़ मजबूत है।

इस बात को मजबूती तब ज्यादा मिलती दिखती है जब मुख्यमंत्री के कट्टर विरोधी प्रताप सिंह बाजवा ने भी कैप्टन अमरिंदर सिंह से हाथ मिलाया। ऐसे में कैप्टन के विरोधी विधायक बाजवा के साथ तो जा सकते हैं, लेकिन सिद्धू का सपोर्ट करें ऐसा नहीं लगता।

क्या नवजोत सिंह सिद्धु भी गुगली फेंक सकते हैं

सवाल ये है कि क्या नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी में लौट सकते हैं? बड़ा सवाल ये है कि क्या बीजेपी सिद्धू को बीजेपी वापस लेगी? लेकिन क्यों नहीं? ममता बनर्जी मुकुल रॉय की घरवापसी के लिए खुशनुमा माहौल बना सकती हैं तो बीजेपी के लिए सिद्धू में क्या खराबी है?

सिद्धू की तरफ से अब तक एक ही शर्त सामने आयी है। चाहे जो हो जाये, सिद्धू पंजाब की राजनीति में ही बने रहना चाहते हैं। अगर वो सिंधिया की तरह केंद्र के लिए राजी हो जायें तो पहले की तरह बीजेपी के लिए भी कोई बड़ी दिक्कत नहीं होनी चाहिये - ज्यादा कुछ नहीं तो दिल्ली में बाबुल सुप्रियो जैसा ओहदा तो मिल ही सकता है! है कि नहीं?

ये भी है कि अगर सिद्धू फिर से बीजेपी को ये भरोसा दिला दें कि मौका मिले तो वो हिमंत बिस्वा सरमा जैसी कोशिशें कर सकते हैं, तो रास्ता काफी आसान हो सकता है। सिद्धू और बीजेपी दोनों के लिए। अभी तो अकाली दल और आम आदमी पार्टी का जो हाल है, बीजेपी आसानी से पंजाब में सत्ता हासिल कर सकती है। ये जरूर है कि बीजेपी ने पंजाब की राजनीति में दलित विमर्श पहले से घोल दिया है।

पंजाब में अकाली दल और मायावती की पार्टी बीएसपी के बीच चुनावी समझौता हो चुका है। आम आदमी पार्टी वाले अरविंद केजरीवाल भी मुफ्त बिजली-पानी के दिल्ली मॉडल के वादे का प्रचार शुरू कर चुके हैं, लेकिन बीजेपी खुल कर सामने नहीं आ रही है। दलित मुख्यमंत्री की पेशकश के बाद बीजेपी परदे के पीछे रह कर काम कर रही है। बीजेपी को तो बस कांग्रेस के खिलाफ एक मोहरे की तलाश है।

Friday, July 30, 2021

अब ये देश दलितों के रहने लायक नहीं रहेगा

अब ये देश दलितों के रहने लायक नहीं रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसतरह से 2014 से लेकर 2021 तक पूरे देश में दलितों की हत्या का आंकड़ा तेजी से उठा है शायद उतनी तेजी से दलितों की हत्या पहले कभी नहीं हुई।

 

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक पंचायत अधिकारी की हत्या महज इसलिए कर दी गयी क्योंकि उसने एक ब्राह्रमण कन्या से प्रेम विवाह कर लिया था। हालांकि इस मामले में लड़की ने अपनी मर्जी से ही लड़के से शादी की और लड़की का जात पात पर विश्वास भी नहीं है। लड़की का कहना है कि अब वो जब तक अपने गुनहगार परिवार को सजा नहीं करवा लेती तब तक वो चैन से नहीं बैठेंगी।

 

लड़की जिस हालात में है, उसके पीछे उसके परिवार के लोगों की वो मानसिकता है जो जातिवाद में डूबी हुई है। और इस कद्र कुंठा के घेरे में है कि उसने इंसानियत तक को ताक पर रखकर अपनी ही बेटी का परिवार उजाड़ दिया। 17 लोग हिरासत में है। आप सोचिये, जातिवाद की जड़ों से जकड़ा ये परिवार किस तरह से दलितों से घृणा करता रहा होगा। अपने आप को शिक्षित सभ्य कहलाने वाला परिवार किस तरह से दलित परिवारों और दलितों के साथ सल्लुक किया करता होगा।

 

लड़का लड़की एक ही कॉलेज में पढ़ रहे थे। लड़का भी अच्छे ही परिवार से था। धन दौलत की दोनों ही परिवार में कोई समास्या नहीं है। लेकिन, जाति एक ऐसा फैक्टर बनकर सामने आयी की दोनों ही परिवार बर्बादी की कगार पर पहुंच गये। लड़की विधवा हो गयी वो अलग और साथ ही बदले की भावना लेकर जियेगी सो अलग।

 

एक दूसरा मामला उत्तर प्रदेश का ही है। प्रयागराज के इस मामले ने तो पूरे  सियासी माहौल को गरमा या है। प्रयागराज ज़िला मुख्यालय से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर कौंधियारा थाने में एक बेहद पिछड़ा गांव है- कठौली कंचनवा। गांव के बीच में एक मजरा है जुगल का पुरवा, जहां खेतों से घिरे चार-पांच घर दिखते हैं। सबसे पहले एक कच्चा और खपरैल का बना हुआ घर रामराज यादव का है, उससे आगे एक घर छोड़कर मिट्टी और खपरैल से बने दो छोटे घर हैं जो भगवती सिंह और उनके भाई के हैं। रामराज यादव और भगवती सिंह के घर के बीच महज़ पचास मीटर की दूरी होगी।

दोनों परिवारों के बीच अच्छा संबंध रहा है, घर वालों को एक-दूसरे के साथ उठना-बैठना रहा है। लेकिन सोमवार को संबंधों में ऐसी खटास आई कि दोनों परिवारों के बीच मार-पीट हुई और भगवती सिंह के घर के लोगों ने रामराज यादव के बेटों- सोनू यादव और संदीप यादव को पीट-पीटकर लहू-लुहान कर दिया।

दोनों परिवारों की स्थिति यह है कि एक के यहां मातम पसरा है जबकि दूसरे परिवार के चार लोग जेल में हैं और बचे हुए लोग घर में ताला लगाकर कहीं चले गए हैं।

 

सोनू यादव के पिता रामराज यादव बताते हैं, "शाम को साढ़े सात बजे हम लोग बाहर बैठे थे। उस दिन हमारे घर पूजा हुई थी। ठाकुर लोग भी प्रसाद लेकर गए थे। वो लोग अक्सर बच्चों के साथ यहां बैठते थे।" "लेकिन अचानक हम लोग देखे कि प्रियम सिंह और प्रीतम मेरे बेटों संदीप और सोनू को लाठी से पीट रहे हैं। जब तक हम लोग वहां पहुंचते तब तक सोनू को काफ़ी चोट आ गई थी और संदीप भागकर घर की ओर आ गया था।"

 

रामराज बताते हैं कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे और दूसरे लोग उन्हें पीट रहे थे। सोनू के सिर में काफ़ी चोटें आईं।

"उसे पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर ज़िला चिकित्सालय पहुंचाया गया, लेकिन अगले दिन उसकी मौत हो गई।" रामराज का कहना है कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे

रामराज का कहना है कि भगवती सिंह अपने बच्चों को मना करने की बजाय "और मारने" की बात कह कर उकसा रहे थे

 

23 वर्षीय सोनू की अभी कुछ महीनों पहले शादी हुई थी। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। पत्नी और मां को समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर एक छोटी सी बात के लिए सोनू को इतना क्यों पीट दिया गया कि उसकी मौत हो गई।

सोनू की मां कहती हैं, "हम लोग बचाने को पहुंचे, लेकिन उन लोगों के ऊपर जैसे ख़ून सवार था। मुझे और मेरी बहू के ऊपर भी कई लाठियां पड़ीं। फिर जब आदमी लोग आए, तब कहीं जाकर वो लोग यहां से भागे।" इस लड़ाई के पीछे सोनू के भाई संदीप का एक व्हाट्सऐप स्टेटस माना जा रहा है जिसे उसने एक दिन पहले पोस्ट किया था।

 

यह स्टेटस प्रियम सिंह इत्यादि को नागवार गुज़रा और उन्होंने उससे उस स्टेटस को हटाने की बात कही, लेकिन संदीप ने स्टेटस नहीं हटाया।

 

चार अभियुक्तों की गिरफ़्तारी

संदीप के परिजनों का कहना है कि यह स्टेटस समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए तैयार किए गए एक गीत का वीडियो था जबकि गांव के लोगों का कहना है कि इस वीडियो में अजीत सिंह नाम के एक बिरहा गायक का वो गीत था जिसमें वो 'यूपी के सभी ठाकुरों को अहिरों का सार (साला)' बताते हैं।

 

इसी बात से नाराज़ प्रीतम सिंह इत्यादि के साथ पहले सोनू और उनके भाई संदीप की कहासुनी हुई और फिर बात मार-पीट तक आ गई। सोनू यादव के परिजनों की तहरीर पर चार लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई और गुरुवार को पुलिस ने चारों अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया।

प्रयागराज के पुलिस अधीक्षक (यमुनापार) सौरभ दीक्षित ने मीडिया को बताया, "प्रीतम सिंह, प्रियम सिंह, उनके पिता शिशुपाल सिंह और चचेरे भाई भगवती सिंह को ग़िरफ़्तार कर लिया गया है। विवादित स्टेटस लगाने को लेकर ही झगड़ा हुआ था, जिसमें चार लोग नामजद किए गए थे। चारों की गिरफ्तारी हो गई है।" अस्पताल में सोनू की मौत के बाद गांव में तनाव पैदा हो गया। प्रशासन ने बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी ताकि कोई अप्रिय घटना न होने पाए।

 

दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर

सोनू यादव गांव में ही खेती और दूध का व्यवसाय करते थे और समाजवादी पार्टी से भी जुड़े हुए थे। गांव वालों के मुताबिक, अभियुक्तों का परिवार भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा था। दोनों ही परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर है।

 

भगवती सिंह के घर पर उनकी एक बेटी सुधा मिलीं जिनके पति इस घटना के बाद उन्हें अपने साथ ले चलने के लिए आए थे। सुधा ने बताया, "चाचा के घर पर कोई नहीं है। जो लोग नामज़द थे उन्हें जेल भेज दिया गया। औरतें और बच्चे डर के मारे कहीं दूसरी जगह चले गए हैं। मैं भी अपनी बच्ची के साथ अपनी ससुराल प्रतापगढ़ जा रही हूं।"

 

सुधा सिंह इससे ज़्यादा बात नहीं करतीं और उनका कहना है कि उन्हें इससे ज़्यादा कुछ और मालूम भी नहीं है कि क्या हुआ था। समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता संदीप यादव ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के लोगों के प्रति नफ़रत घोल दी गई है

समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता संदीप यादव ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के लोगों के प्रति नफ़रत घोल दी गई है

 

समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया

सोनू की मौत के बाद ही समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं का भी वहां जमावड़ा शुरू हो गया। इससे पहले समाजवादी पार्टी की ओर से ट्वीट करके घटना की निंदा की गई थी।

 

समाजवादी पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया था, "सपा कार्यकर्ता की श्री अखिलेश यादव जी का गीत बजाने पर सत्ता संरक्षित गुंडों द्वारा सोनू यादव की हत्या घोर निंदनीय। हत्यारों को मिले कठोरतम सज़ा।"

 

गुरुवार को सपा नेता संदीप यादव भी अपने कई साथियों के साथ वहां मौजूद थे। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "विपक्षी दलों के लोगों के प्रति इतनी नफ़रत घोल दी गई है और सत्ता पक्ष के लोगों को इतना संरक्षण दिया जा रहा है कि वो कुछ भी कर दे रहे हैं।"

 

"पिछले दिनों पंचायत चुनाव में आपने देखा होगा कि किस तरह विपक्षी दलों के लोगों के घर गिराए गए, एफ़आईआर दर्ज की गई, उन्हें मारा-पीटा गया। यह घटना भी ऐसी ही मानसिकता का नतीजा है।"

प्रयागराज ज़िले के कठौली कंचनवा गांव में किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए पुलिस की तैनाती कर दी गई है गांव के लोगों की मानें तो दोनों परिवारों के लोग अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति आस्था ज़रूर रखते थे, लेकिन इसकी वजह से उनके बीच न तो कभी कोई रंज़िश रही और न ही कभी कोई विवाद हुआ।

 

गांव के ही रहने वाले महेंद्र यादव कहते हैं, "वो लोग भी यहीं आकर बैठते थे। रामराज के घर के सामने भगवती सिंह का खेत है। दोनों ही लोग ग़रीब हैं। राजनीति से न तो इन्हें कुछ मिल रहा था, न उन्हें। यह तो सोशल मीडिया वाला मामला पता नहीं कैसे इतना बढ़ गया कि आवेश में आकर उन लोगों ने हमला कर दिया।"

 

कठौली कंचनवा गांव की आबादी क़रीब 2800 है जिसमें ज़्यादा संख्या दलितों की है। यादव समुदाय के लोगों की संख्या क़रीब चार सौ है जबकि ठाकुर समुदाय के लोगों की आबादी भी तीन सौ के आस-पास है। यह गांव और यह पूरा इलाक़ा बेहद पिछड़ा है।

 

गांव की प्रधान अनीता देवी के पति शिव प्रसाद बताते हैं कि उनके गांव में जातीय संघर्ष कभी नहीं हुआ। शिव प्रसाद कहते हैं, "आपस में कहा-सुनी और छोटे-मोटे विवाद को छोड़ दिया जाए तो एक जाति की दूसरे जाति से लड़ाई जैसा मामला कभी नहीं हुआ है। इस घटना से हमारा पूरा गांव स्तब्ध है।"

 

'विवाद अचानक नहीं था'

पुलिस का कहना है कि दोनों ही परिवारों के लोगों का न तो कोई क्राइम रिकॉर्ड है और न ही किसी अपराध में संलिप्त रहने की कोई जानकारी है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मार-पीट की नौबत अचानक आ गई।

 

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "संदीप और प्रियम इत्यादि के बीच मोबाइल पर पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर बातचीत हो रही थी। उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह विवाद अचानक नहीं था बल्कि इसकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार हो रही थी। हमारे पास चैट्स के स्क्रीनशॉट्स हैं और उन सबके आधार पर ही जांच की जा रही है।"

 

वहीं कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जुगल का पुरवा की घटना लोगों के लिए एक सबक है कि कैसे उन राजनीतिक मुद्दों को लोग आपसी विवाद का कारण बना लेते हैं जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है।

 मुद्दें की बात

प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी का कहना है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए वो हर संभव कदम उठायेंगे और मुजरिमों को सलाखों के पीछे पहुंचायेंगे। लेकिन बात जब जाति आधारित अपराधों की आती है तब सूबे के मुख्यमंत्री भी जांच पड़ताल की बात करते ही नजर आते हैं। दूसरी बड़ी बात ये भी है कि देश में मौजूदा दौर में दलितों की हत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आप आये दिन अखबारों की खबरों को देखकर इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में दलितों का हाल क्या है। कुल मिलाकर देखा जाये तो मौजूदा दौर में ये देश अब धीरे धीरे दलितों के रहने लायक नहीं रहा है। और यहीं मंशा इस देश के ब्राह्मण और सवर्ण की है कि देश का दलित धीरे धीरे इतना कमजोर और इतना क्षीण हो जाये कि या तो वो अपनी आवाज किसी भी अन्याय के खिलाफ उठाये नहीं और अगर उठाये भी तो इतने धीरे की उसे न्याय मिल ही ना पाये।

 


Saturday, May 29, 2021


Modi Ji के रोने की पॉलिटिक्स क्या है मोदी जी अक्सर ही मंच पर रोने लगते हैं. या यूं कहें कि अक्सर ही आप देश के प्रधानमंत्री को संवेदनशील होते देख सकते हैं. संवेदनशील होना अच्छा है. बेहतर इंसान होने की निशानी है. लेकिन जब यही संवेदनशीलता देश की बदनामी दुनिया में करवाने लगे तो इसे फिर आप क्या कहेंगे. और सवाल ये भी उठने लगे कि मोदी जी अक्सर तभी रोते हैं जब इसके पीछे उनकी कोई बड़ी मंशा हो. और ऐसा अक्सर ही उनके रोने के बाद देश की राजनीति में देखा भी गया हो. #Modicrying #Moditears


 

Padwoman of Srinagar Jammu&Kashmir


 #padman #padwoman #sanitrypad

दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो कुछ अलग कर गुजरने की चाहत रखते हैं। ऐसी ही हैं भारत के श्रीनगर में रहने वाली ये महिला, जो अपने खर्चें से श्रीनगर की गरीब औरतों की सेहत का ना सिर्फ ख्याल रख रही हैं बल्कि उन्हें हर महीने होने वाली समास्या के प्रति भी जागरूक कर रही हैं। 


Friday, September 20, 2019

आंकड़ों के खेल में फंस रही है देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था


देश में उच्च शिक्षा को लेकर काफी समय से बहस चल रही है. इस साल द हायर एजुकेशन की रिपोर्ट में एक बार फिर देश के उच्च संस्थान को लेकर एक रिपोर्ट आयी है. जिसमें भारत एक बार फिर दुनिया की टॉप 300 यूनिवर्सिटी में शामिल नहीं हो पाया है. 

नई दिल्ली (New Delhi): दुनिया में भारतीय संस्कृति और शिक्षा की अलग पहचान है. देश के आईआईटी और मेडिकल कॉलेज में दुनिया के कई देशों से छात्र उच्च शिक्षा हासिल करने पहुंचते हैं. 

दुनिया भर के शिक्षण संस्थानों पर शोध करने वाली संस्था द हायर एजुकेशन (The Higher Education) ने भारत की उच्च शिक्षा को लेकर एक आंकड़ा जारी किया है. ये आंकड़ा दुनिया की उच्च शिक्षण संस्थानों को रैंकिग प्रदान करता है. रैंकिग के आधार पर शिक्षण संस्थानों का विश्वपटल पर शिक्षा का स्तर यानी रैंकिग का निर्धारण होता है.

 इस साल दुनिया की 300 टॉप यूनिवर्सिटी में भारत का कोई भी   विश्वविद्यालय, उच्च संस्थान शामिल नहीं है. ये आंकड़ा बेशक   हैरान करने वाला है, क्योंकि देश में आईआईटी जैसे संस्थान तो   मौजूद हैं ही साथ ही उच्च शिक्षा के लिए दुनिया भर में मशहूर   विश्वविद्यालय और संस्थान मौजूद हैं, जिसमें आईआईएम,       मेडिकल   कॉलेज, आईआईटी शामिल
 हालांकि द हायर एजुकेशन की रिपोर्ट में ये सफाई भी दी गयी है   कि आईआईएससी संस्थान की रैकिंग के गिरने का कारण उसके   द्वारा रिसर्च पर मिले स्कोर को लेकर आई है. और ये बात भारत   के दूसरे संस्थानों पर भी लागू होती है.


                                                    देश की शिक्षा और उच्च शिक्षा की तस्वीर
ये बात जानकार आपको शायद हैरानी हो सकती है कि भारत में स्कूल की पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से एक ही कॉलेज पहुंच पाता है. भारत में उच्च शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों का अनुपात दुनिया में सबसे कम यानी सिर्फ़ 11 फ़ीसदी है.
नैसकॉम और मैकिन्से  (The NASSCOM-McKinsey report "Perspective 2020) के शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं.
वहीं, राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद, NAAC (National Assessment and Accreditation Council) एक संस्थान है जो भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों का आकलन तथा प्रत्यायन (मान्यता) का कार्य करती है. नैक का शोध बताता है कि भारत के 90 फ़ीसदी कॉलेजों और 70 फ़ीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बेहद कमज़ोर है. भारतीय शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी का आलम ये है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी प्रत्येक वर्ष 15 से 25 फ़ीसदी शिक्षकों की कमी रहती है.

कैसे बदलेंगे हालात ?
20 साल पहले मैनेजमेंट गुरू पीटर ड्रकर ने ऐलान किया था, "आने वाले दिनों में ज्ञान का समाज दुनिया के किसी भी समाज से ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक समाज बन जाएगा. दुनिया में गरीब देश शायद समाप्त हो जाएं लेकिन किसी देश की समृद्धि का स्तर इस बात से आंका जाएगा कि वहां की शिक्षा का स्तर किस तरह का है."
अब क्योंकि देश को विश्व पटल पर अगर अपनी शिक्षण व्यवस्था और उच्च शिक्षा की रैंकिग को ठीक करना है तो ये जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को अपने रिसर्च पेपर और रैंकिग से संबंधित दस्तावेजों को विश्व पटल पर रखना चाहिए.
भारत में उच्च शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों का अनुपात दुनिया में सबसे कम यानी सिर्फ़ 11 फ़ीसदी है. अमरीका में ये अनुपात 83 फ़ीसदी है. भारत को मौजूदा 11 फीसदी अनुपात को 15 फ़ीसदी तक ले जाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 2,26,410 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा जबकि 11वीं योजना में इसके लिए सिर्फ़ 77,933 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया था.

देश में पिछले  50 सालों में सिर्फ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला. पिछले 16 सालों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गयी. इसे बढ़ाने की आवश्यकता है.

इंफ़ोसिस के पूर्व प्रमुख नारायण मूर्ति ध्यान दिलाते हैं कि अपनी शिक्षा प्रणाली की बदौलत ही अमरीका ने सेमी कंडक्टर, सूचना तकनीक और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इतनी तरक्की की है. इस सबके पीछे वहां के विश्वविद्यालयों में किए गए शोध का बहुत बड़ा हाथ है. यानी देश के संपूर्ण विकास का आधार शिक्षा का ऊंचा स्तर है जिसमें शोध को ज्यादा से ज्यादा स्थान दिया जाना चाहिए. 

बहरहाल, द हायर एजुकेशन के आंकड़ों के मुताबिक भारत के उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय दुनिया के टॉप 300 उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालयों की श्रेणी में शामिल नहीं हैं. लेकिन ये बात भी सही है कि भारत का उच्च शिक्षा का स्तर एशिया के देशों में काफी ऊंचे पायदान पर है. हमारे देश के शिक्षण संस्थान दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. देश में विदेशों से उच्च शिक्षा हासिल करने छात्र भी आ रहे हैं. ऐसे में द हायर एजुकेशन का ये आंकड़ा चिंता तो पैदा करता है लेकिन, परेशानी का कारण नहीं हो सकता. क्योंकि देश में शिक्षा के स्तर के विकास के लिए सरकार निरंतर सार्थक कदम उठा रही है.

Wednesday, September 11, 2019

डूबते ऑटो सेक्टर के लिए कहां से लाएगी सरकार संजीवनी



दो साल से लगातार डूब रहा है ऑटो सेक्टर
सरकार ऑटो सेक्टर को लेकर क्यों मूंदेंरही आंखें!
क्या ओला ऊबर हैं ऑटो सेक्टर की मंदी का कारण?
क्यों सरकार कोई पुख्ता कदम उठाने से हिचक रही है.

नई दिल्ली (New Delhi) वित्त मंत्री ने डूबते ऑटो सेक्टर का ठीकरा ओला ऊबर पर तो फोड़ा ही साथ ये भी कहा है कि देश का युवा अब कार खरीदने से बच रहा है. लेकिन, क्या वाकई ये बयान डूबते ऑटो सेक्टर का कारण है? या फिर सरकार सेक्टर में छायी मंदी का कारण देश के लोगों को बताने से कतरा रहा है.
असल में ऑटो सेक्टर में मंदी अचानक तो आयी नहीं है. क्योंकि इस उद्योग से डायरेक्ट और इनडायरेक्ट तरीके से लाखों लोग जुड़ें हुए हैं. वहीं, मंदी की मार झेल रहा ये सेक्टर लगातार स्लो डाउन की ओर जा रहा है.

देश में लगातार दसवें महीने अगस्त में यात्री वाहनों की बिक्री कम हुई है. वाहन निर्माताओं के संगठन सियाम के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में यात्री वाहनों की बिक्री एक साल पहले इसी माह की तुलना में 31.57 प्रतिशत घटकर 1,96,524 वाहन रह गई. एक साल पहले अगस्त में 2,87,198 वाहनों की बिक्री हुई थी.




भारतीय आटोमोबाइल विनिर्माता सोसायटी (सियाम) के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2019 में घरेलू बाजार में कारों की बिक्री 41.09 प्रतिशत घटकर 1,15,957 कार रह गई जबकि एक साल पहले अगस्त में 1,96,847 कारें बिकी थी.

इस दौरान दुपहिया वाहनों की बिक्री 22.24 प्रतिशत घटकर 15,14,196 इकाई रह गई जबकि एक साल पहले इसी माह में देश में 19,47,304 दुपहिया वाहनों की बिक्री की गई. इसमें मोटरसाइकिलों की बिक्री 22.33 प्रतिशत घटकर 9,37,486 मोटरसाइकिल रह गई जबकि एक साल पहले इसी माह में 12,07,005 मोटरसाइकिलें बिकी थीं.

सियाम के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त माह में वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री 38.71 प्रतिशत घटकर 51,897 वाहन रही. कुल मिलाकर यदि सभी तरह के वाहनों की बात की जाये तो अगस्त 2019 में कुल वाहन बिक्री 23.55 प्रतिशत घटकर 18,21,490 वाहन रह गई जबकि एक साल पहले इसी माह में कुल 23,82,436 वाहनों की बिक्री हुई थी. ये वो आंकड़े हैं जो ये दर्शातें हैं कि वाहन बिक्री में लगातार मंदी अचानक नहीं आयी बल्कि ये मंदी पिछले दो साल से जारी है. जिसपर सरकार का ध्यान शायद अब गया है. या सरकार ने इसपर ध्यान देना नहीं चाहा.

वहीं इस क्षेत्र में रोजगार की बात की जाए तो सिर्फ देश में कार शॉरूम की ही बात की जाए तो देश में करीब 15 हजार डीलर्स के पास 26 हजार ऑटोमोबाइल शोरूम हैं. इसमें से करीब 25 लाख लोग सीधे तौर से नौकरी कर रहे हैं, जबकि 25 लाख लोग अस्थायी रूप से जुड़े हुए हैं. इसका मतलब यह है कि ऑटोमोबाइल शोरूम देश में करीब 50 लाख लोगों को रोजगार दे रहा है. जिसमें लगातार हो रही छटनी, शोरूम का बंद होना और निर्माण क्षेत्र और रॉ मैटिरियल देने वाले लोगों की संख्या इससे ज्यादा है. मंदी के कारण इन सभी पर बेरोजगारी का संकट तो है ही साथ ही इस क्षेत्र के डूबने से तकरीबन 2.5 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का खतरा भी है.

हालांकि बीते हफ्ते परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ऑटो कंपनियों को भरोसा दिया था कि पेट्रोल और डीजल व्हीकल को बैन करने का कोई प्लान नहीं है.  उन्होंने कहा था कि ऑटो सेक्टर में स्लोडाउन वैश्विक आर्थिक कारणों से है. उन्होंने कहा था वित्त मंत्री जल्द इसको इसको सुलझाएंगी.

लेकिन बतौर वित्त मंत्री उनके पास भी डूबते ऑटो सेक्टर को लेकर कोई मजबूत रणनीति नहीं है. अब चलिए आपको हाल ही में आये वित्त मंत्री के बयान से रूबरू करवा देते हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि वाहन क्षेत्र में नरमी के कारणों में युवाओं की सोच में बदलाव भी है. लोग अब खुद का वाहन खरीदकर मासिक किस्त देने के बजाए ओला और उबर जैसी आनलाइन टैक्सी सेवा प्रदाताओं के जरिये वाहनों की बुकिंग को तरजीह दे रहे हैं. सीतारमण ने कहा कि दो साल पहले तक वाहन उद्योग के लिये अच्छा समय था. उन्होंने संवाददाताओं से कहा, कि निश्चित रूप से उस समय वाहन क्षेत्र के उच्च वृद्धि का दौर था. मंत्री ने कहा कि क्षेत्र कई चीजों से प्रभावित है जिसमें भारत चरण-6 मानकों, पंजीकरण संबंधित बातें तथा सोच में बदलाव शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि कुछ अध्ययन बताते हैं कि गाड़ियों को लेकर युवाओं की सोच बदली है. वे स्वयं का वाहन खरीदकर मासिक किस्त देने के बजाए ओला, उबर या मेट्रो (ट्रेन) सेवाओं को पसंद कर रहे हैं. सीतारमण ने कहा, ‘‘अत: कोई एक कारण नहीं है जो वाहन क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं. हमारी उस पर नजर है. हम उसके समाधान का प्रयास करेंगे.'' भारत चरण-6 उत्सर्जन मानक एक अप्रैल 2020 से प्रभाव में आएगा. फिलहाल वाहन कंपनियां भारत चरण-4 मानकों का पालन कर रही हैं. यानी बयान के मायने निकाले जाए तो सीधे सीधे वित्त मंत्री का कहना है कि उनका ध्यान वाहन क्षेत्र के अगले चरण पर है. यानी अब वाहन कंपनियों को अपने घाटे का कारण खुद ही खोजना है.

टैक्स कटौती पर भी सरकार की दो टूक
अब आपको यहां ये भी याद दिला दें कि इससे पहले  वित्त मंत्री ने कहा था कि उद्योग जगत और ऑटो सेक्टर अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए जिस टैक्स कटौती की मांग कर रहे हैं, वह वित्त मंत्रालय से संभव नहीं है. यह काम जीएसटी काउंसिल करेगी. ये निर्मला सीतारमण ने कहा था कि जहां तक जीएसटी का सवाल है, इस पर जीएसटी को विचार करना है, जवाब देना है या फ़ैसला करना है. कोलकाता में टैक्स अधिकारियों के साथ बैठक के बाद वित्त मंत्री ने साफ़ कर दिया कि टैक्सों में कटौती पर फ़ैसला जीएसटी काउंसिल को करना है. यानी जिस जीएसटी को लेकर ऑटो सेक्टर इस उम्मीद में था की टैक्स कटौती होगी तो शायद हालत बदलेंगे अब वैसी भी नहीं होने जा रहा है.
इससे पहले सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि वे वित्त मंत्री से अनुरोध करेंगे कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में कुछ समय के लिए जीएसटी कम कर दें. वैसे वित्त मंत्री को भी अंदाज़ा नहीं है कि अर्थव्यवस्था में सुधार कब तक आएगा. निर्मला सीतारमण ने कहा कि 'मैं इस बारे में अनुमान नहीं लगाने जा रही. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि हर क्षेत्र की चुनौतियों का सामना करें.

फिलहाल ये तो रही सरकार की बात जो मामले पर बॉल एक ऑटो सेक्टर और जीएसटी काउंसिल पर डाल रहा है. अब बात देश की सबसे बडी कार निर्माता कंपनी मारूति सुजुकी की कर लेते हैं. मारूति सुजुकी के चेयरमैन आर सी भार्गव का कहना है कि देश का बैंकिंग सिस्टम, कमजोर निर्णय शक्ति और कारों में एयरबैग्स और एबीएस जैसे सेफ्टी फीचर्स जोड़ने के कारण छोटे सेगमेंट की कारें महंगी होती चली गयी. और साधारण लोगों का इन कारों को खरीदना मुश्किल होता चला गया. जिसका असर ये रहा कि इस सेक्टर में मंदी आती चली गयी और कंपनियों को लगातार नुकसान होता चला गया.

वहीं, भार्गव का ये भी मानना है कि पेट्रोल-डीजल पर ऊंचा टैक्स, रोड और रजिस्ट्रेशन चार्ज ने मंदी को बढ़ाने में आग में घी का काम किया वहीं, भार्गव का ये भी कहना है कि लोग बेशक जीएसटी को इसका कारण मानते हो. लेकिन, जीएसटी कट करने पर भी इस ऑटो इंडस्ट्री को मंदी से बाहर नहीं लाया जा सकता.
क्योंकि ऑटो सेक्टर का एक बड़ा फायदे का सेगमेंट बाइक-स्कूटी चलाने वाले हैं. क्योंकि एंट्री लेवल पर यहीं वो लोग हैं. जो इस सेक्टर की जान हैं. और बैंक पिछले कई साल से लगातार एंट्री लेवल पर कार फाइनैंस करने से डरने लगे हैं. जिसके बाद नयी कारों की सेल में कमी आयी है.

वहीं, GST कटौती को लेकर भार्गव के विचार ऑटो इंडस्ट्री बॉडी SIAM और अन्य कंपनियों के सीईओ से मेल नहीं खाते. इंडस्ट्री लगातार सुस्ती से निपटने को GST कट की मांग कर रही है, लेकिन भार्गव का कहना है कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला.यहां आर सी भार्गव का एक और चौंकाने वाला तर्क है. उनका कहना है कि स्ट्रक्चरल शिफ्ट से मंदी का कोई लेना देना नहीं है. ओला-ऊबर जैसी एप बेस्ट सुविधाओं का बढ़ता इस्तेमाला इसके पीछे की वजह नहीं हो सकता क्योंकि कार खरीदना और चलाना दोनों ही अलग-अलग बातें हैं. उन्होंने कहा, सख्त सेफ्टी व एमिशन के नियम, बीमा की ज्यादा लागत और करीब 9 राज्यों मेंअतिरिक्त रोड टैक्स जैसी वजहों से ऑटो सेक्टर में कन्ज्यूमर सेंटिमेंट बिगड़ा है.
इन सभी फैक्टर्स की वजह से एंट्री लेवल कारों की कीमत करीब 55,000 रुपये तक बढ़ गई है. इस बढ़ी कीमत में 20,000 रुपये का इजाफा सिर्फ रोड टैक्स की वजह से हुआ है.

लाखों नौकरियां गईं
ऑटो सेक्टर में मंदी की मार सिर्फ उत्पादन पर ही नहीं पड़ रही है. मंदी की मार में नौकरियां भी हैं. बड़े पैमाने पर नौकरियां जा रही हैं. सियाम का अनुमान है कि देशभर में कई वाहन शोरूम बंद होने से करीब 2 लाख नौकरियां गईं जबकि ऑटो कंपोनेंट निर्माता कंपनियों में 1 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं. यानी इस सेक्टर में ये अब तक की सबसे बड़ी छटनी कही जा सकती है.

पिछले दो साल से आ रहे थे संकेत
जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि ऐसा नहीं है कि यह गिरावट एकाएक आई है. प्रो अरुण कुमार का कहना है कि बीते दो तीन सालों में अर्थव्यवस्था को तीन बड़े झटके लगे हैं- नोटबंदी, जीएसटी और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का संकट, इसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ी है।
उनका कहना है कि "सीएमआई के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ थी, जो घट कर 41 करोड़ हो गई है, यानी चार करोड़ रोजगार में कमी आई. वहीं, अरुण कुमार का कहना है कि जमीनी हकीकत ये भी है कि ऑटो सेक्टर में सुस्ती की शुरुआत बहुत पहले ही हो गई थी और इस प्रक्रिया में कई कंपनियों पर ताले तल गए, हजारों नौकरियां चली गईं. हरियाणा के गुरुग्राम, मानेसर, धारूहेड़ा, बावल औद्योगिक क्षेत्र में इसके संकेत पिछले दो साल में देखे जा सकते थे.
मारुति उद्योग कामगार यूनियन (एमयूकेयू) के महासचिव कुलदीप जांगू कहते हैं कि बिक्री और उत्पादन में कमी के कारण मारुति के तीनों प्लांटों में होने वाली सीजनल भर्तियों में 25 फीसदी की कमी है. शिफ्ट कम कर दी गयी है. वे कहते हैं कि ये सुस्ती पिछले छह महीने से चल रही थी लेकिन अभी दो महीने में हालात काफी खराब हुए हैं.

शटडाउन, छंटनी, तालाबंदी- ग्राउंड रियलिटी
आईएमटी मानेसर में एक कंपनी थी एंड्योरेंस टेक्नोलाजीज, जो हीरो और होंडा जैसी दोपहिया वाहन कंपनियों के लिए ऑटो पार्ट्स बनाती थी. एंड्योरेंस कंपनी की ट्रेड यूनियन के ज्वाइंट सेक्रेटरी अमित सैनी बताते हैं कि कंपनी ने 21 दिसम्बर 2018 को शटडाउन कर दिया और एक जनवरी 2019 को लॉकआउट की घोषणा कर दी. 164 परमानेंट वर्कर एक झटके में सड़क पर आ गए. कंपनी ने सारे ठेका मजदूरों का कांट्रैक्ट खत्म कर दिया.

क्या नई तकनीक के विकास से ऊभर जाएगा ऑटो सेक्टर
कयास ये भी है कि अब क्योंकि सरकार का अगला कदम देश में इलेक्ट्रिक कार के सेगमेंट को बढ़ाने का है. ताकि इस क्षेत्र में नई तकनीक को लाया जाए और बेहतर विकल्प पेट्रोल डीजल और सीएनजी के मिलें. वहीं, जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में देश का इफ्रास्ट्रक्चर ऐसा नहीं है कि आनन फानन में इलेक्ट्रिक गाड़ियां इंटरड्यूज करने से इस सेक्टर की मंदी को खत्म कर दिया जा सकता हो. क्योंकि, हर एक नये सेगमेंट को लाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया के साथ साथ लोगों के मूढ़ को बदलने का काम भी प्रॉडक्ट को करना होता है. और क्योंकि अभी तक देश में इलेक्ट्रिक कारों को लेकर कोई ऐसा पॉजिटिव सेंटिमेंट भी नहीं है जिसके आधार पर देश की बड़ी कार कंपनियां पूरे परिवेश को ही बदलकर रख दें. क्योंकि बाजार मांग के आधार पर काम करता है. और बाजार मांग की आपूर्ति करता है. ऐसे में नई तकनीक मौजूदा मंदी को मात दे पाएगी ये दूर की कौढ़ी भर है.

लेकिन, सवाल वहीं का वहीं है, कि आखिर ऑटो सेक्टर में आयी मंदी से कैसे बाहर आया जा सकता है जबकि मौजूदा समय में ऑटो सेक्टर में सबसे ज्यादा संभावनाएं तलाशी जा रही थी. देश का ऑटो सेक्टर देश की जरूरत के हिसाब से अभी भी मोटर कारों का निर्माण नहीं कर पा रहा है. ऐसे में इस क्षेत्र की मंदी इस बात का संकेत भी है कि देश में ऑटो सेक्टर को लेकर सरकार की कोई मजबूत पॉलिसी नहीं है और इस सेक्टर को सरकार अभी तक सिर्फ कमाई का ही साधन मान रही थी. वहीं, सच ये भी है कि अब समय आ गया है क ऑटो सेक्टर से जुड़े लोगों को भी गंभीरता से सोचना होगा ताकि इस क्षेत्र का विकास तो हो ही साथ ही दुनिया के साथ कदम से कदम  मिलाकर वो देश में रोजगार उत्सर्जन के साथ साथ देश की आर्थिक ग्रोथ में भी सहायता दे सकें.