Friday, April 16, 2010

सोशल नेटवर्किंग -2

आज मैं सोशल नेटवर्किंग भाग -2 आपक सामने रखने जा रहा हूं। कल इस कहानी का पहला भाग मैंने अपने ब्लाग पर दिया था। उसपर एक मित्र की प्रतिक्रिया ने मुझे इसके दूसरे भाग को लिखने की प्रेरणा दी है। कहानी वहीं पुरानी है। ये कहानी हमारी धार्मिक पुस्तकों और अक्सर घर के बुजुर्गों के माध्यम से सुनाई जाती रही है। इसके लेखक कौन हैं इसकी जानकारी मुझे नहीं हैं, लेकिन आप इस कहानी को पढ़कर ये अवश्य समझ पायेंगे कि ये मेरी पहली कहानी का आगे का हिस्सा है और क्योंकि मेरी पहली कहानी पर कल थोड़ी बहस हुई थी तो उसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए ये दूसरी कहानी लिख रहा हूं।
हां, एक बात और मैं कहानी अपने तरह से कहने में विश्वास रखता हूं और साधारण शब्दों में कहता हूं इसलिए कहानी को थोड़ा तोड़ता मरोड़ता हूं। उम्मीद है आप मेरी इस गलती को माफ करके कहानी का आनंद अवश्य लेंगे।
बड़ा कौन ?

एक बार गणेश भगवान और उनके बड़े भाई कार्तिक खेल रहे थे। खेलते खेलते कोई बात चली और कार्तिक भगवान ने गणेश जी से कहा की तू मुझसे छोटा है, छोटे के तरह रहा कर। गणेश जी ने कहा भाई इस दुनिया में कोई बड़ा या छोटा नहीं है, जिसकी जितनी ज्यादा मांग इस दुनिया में है यानी जिसका सोशल नेटवर्क जितना बड़ा है वह उतना ही बड़ा है। यानी जिसकी ज्यादा पहुंच जिसका ज्यादा प्रचार वही महान। ये बात कार्तिक को बुरी लग गई। उन्होंने कहा अरे गणेश भाई कैसी बात करते हो। क्या आयु, शिक्षा और ज्ञान का आधार कुछ नहीं है। इसपर गणेश जी मुस्कुराये और बोले भाई में ज्ञान, आयु और शिक्षा की नहीं मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूं कि जिसकी बाजार में जितनी मांग होगी वह उतना ही बड़ा होगा। जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा होगा वह बड़ा होगा। अब धरती पर मौजूद हाल का ही उदहारण ले लीजिए। सानिया और शोहेब की शादी दंतेबाड़ा के नक्सली नरसंहार से बड़ी हो गई। हमारे यहां मौजूद यमदूत भी पहले सानिया के यहां दावत खाने पहुंचे औऱ बाद में दंतेबाड़ा पहुंचे। मीडिया ने भी जो नारद जी से भी तेज खबर देने का दावा करती है। वह भी पहले वहीं पहुंचे और दंतेबाड़ा पर चिंदबरम की बाइट चला कर अपना पल्ला झाड़ लिया। तो जो मार्किट में बिक रहा है और जिसका सोशल नेटवर्क ज्यादा है वह बड़ा हुआ या नहीं। इस पर कार्तिक का चेहरा तम तमा गया। वह गुस्सें में गये और जा पहुंचे सीधे हाई कमान भगवान शिव के पास और बोले पिता जी ये गणेश मुझसे कहता है कि मैं बड़ा नहीं ये बड़ा है। ऊपर से धरती के उल्टे सीधे तर्क दे रहा है। भोले नाथ ये बात सुनकर पहले चुप्पी साध गये, लेकिन कार्तिक कहा मानने वाले थे। उन्होंने उनकी बाजू पकड़ कर हिलाया और कहा पिता जी आप आंखे मत मूंदो और मुझे जवाब दो। भोले नाथ ने आंखे खोली और धीरे से कहा पुत्र आप लोगों का आपसी मामला है आप ही निपटा लो काहे मुझ योगी को इस लफड़े में डालते हो। कार्तिक फिर बोले पिता जी आप क्यों अपना पल्ला झाड़ रहे हो। मुझे जवाब चाहिए नहीं तो मैं आपका पीछा नहीं छोड़ने वाला। अब भोले नाथ समझ गये कि मामला कुछ ज्यादा ही सनसेटिव हो गया है। उन्होंने नंदी को आवाज देकर बुलाया और कहा जाओं गणेश को ले आओं। गणेश जी हाथ में अपना मोदक लिए भगवान शिव के दरवार में उपस्थित हो गये। भगवान शिव ने पूछा बेटा ये कार्तिक से आपका किस बात पर झगड़ा हो रहा है। इस पर गणेश पहले थोड़ा मुस्कुराये और फिर बोले। बाबा कार्तिक भाई को मैं समझा रहा था कि इस दुनिया में वही बडा़ है जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा है। लेकिन ये भाई है कि मानते ही नहीं और कह रहे हैं मैं बड़ा हूं, क्योंकि मैं आयु में बड़ा हूं। अब मैंने इन्हें समझाया की आयु में तो बह्रमा भी बड़े हैं लेकिन उनका सोशल नेटवर्क स्ट्रोंग नहीं है तो उनका कोई नाम नहीं लेता और चाचा जी यानी विष्णु जी का सोशल नेटवर्क बड़ा है तो उनका नाम बड़ा हो गया उनकी डिमांड ज्यादा हो गयी। लेकिन ये मेरी बात को मानने के लिए ही तैयार नहीं है। इस पर फिर से कार्तिक भन्ना गये, उन्होंने आव देखा ना ताव औऱ गणेश को चैलेंज दे कर कहा। अच्छा तू बहुत देर से बक बक कर रहा है। चल तू मुझसे दौड़ लगा और साबित कर की तू मुझसे बड़ा है। जो जितेगा वही बड़ा होगा। ये सुनकर भगवान शिव के दरबार में मौजूद सभी देवतागण चुप हो गये। इस पर वहां मौजूद नंदी ने कहा भगवन आप काहे इस छोटे बड़े के चक्कर में फंस रहे हैं। छोड़िये और अपने मोर पर बैठकर आकाश की परिक्रमा कीजिए और आनंद लिजिए। गणेश जी का क्या है ये तो ऐसे ही कहते रहते हैं। लेकिन कार्तिक जी तो जैसे अपनी बात पर अड़े बैठे थे। उन्होंने जैसे ठान ही लिया था कि आज फैसला करना है औऱ गणेश को जवाब देना है। कार्तिक ने कहा नहीं आज दौड़ होगी मतलब दौड़ होगी। इसपर गणेश जी ने कहा भाई ठीक है अगर आप नहीं मानते तो मैं दौड़ लगाने के लिए तैयार हूं लेकिन तैयारी करने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए। कार्तिक ने कहा दौड़ पूरे ब्राहमांड की लगानी होगी और जो पहले यहां वापस आयेगा वहीं विजयी होगा। गणेश जी ने बात मान ली और कहा ठीक है मुझे एक सप्ताह का समय दीजिए तैयारी के लिए। कार्तिक ने समय दे दिया। कार्तिक उसी समय से अपने मोर की सेवा में लग गये और लगे दंड मारने की अब ब्राहमांड विजयी करना है। वहीं दूसरी ओर गणेश जी सभी देवताओं से मंत्रणा करने लगे और सभी देवताओं, नर, नारी, पशु, पक्षी और इन तीनों लोको के प्राणियों को जमकर मौज करवाई, सभी के लिए मीठे मोदक और जिसकी जो पसंद थी वह पहुंचाया गया। भगवान शिव को भी भांग धत्तूरा और पार्वती जी को चंदन का खास उबटन दिया गया। एक सप्ताह तीनों लोकों में जश्न का माहौल रहा ऐसा लग रहा था कि भारत देश का लोकसभा का इलेक्शन हो रहा हो। दारू, मुर्गा, रैव पार्टी सभी कुछ हुआ। आखिर प्रतियोगिता का समय ही गया। प्रतियोगिता का निर्णय का हक भगवान शिव और पार्वती मां को दिया गया, लेकिन वोटिंग्स के आधार पर। वोट सभी देवी देवताओं औऱ तीनों लोकों के प्राणियों को करने का अधिकार दिया गया। वोट इंटरनेट औऱ मोबाइल के माध्यम या फिर एक ध्वनी मत के द्वारा दी जाने की घोषणा की गई। खैर प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। सीटी बजी और कार्तिक महाराज ने अपने मोर को ऐढ़ लगाई और चल दिये ब्राहमांड की सैर करने। जबकि गणेश जी वहीं रहे और भगवान शिव औऱ पार्वती की सेवा करते रहे और पूरे सप्ताह हर रोज उन्ही के सात सात चक्कर लगाने लगे। एक सप्ताह के बाद कार्तिक पसीना पसीना होते वापस आये और जैसे ही भगवान शिव के दरबार मे पहुंचे गणेश को वहीं पाकर जोर से हंसे और बोले देख मैं ब्राहमांड का एक चक्कर लगा कर भी गया और तू यहीं बैठा है। इतने में ही भगवान शिव के यहां मौजूद स्कोर बोर्ड़े पर डिस्प्ले हुआ कार्तिक - एक चक्कर, गणेश - 49
स्कोर देखकर कार्तिक का सर भन्ना गया और वहां मौजूद सारे दर्शकों ने अब गणेश को अपने कंधों पर उठा लिया और जोर से एक ध्वनी में कहा। हमारे विध्नहरता, कष्टहरता, दुख दूर करता कौन ? इतने में ही शिव पार्वती बोले भगवान गणेश।

Thursday, April 15, 2010

अब बाबा किसके ?


इस देश में दलित एजेंडा वोट बैंक पर कितना हावी हो सकता है यह इस बार बाबा भीमराव अंबेडकर जयंती पर देखने को मिला। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर कांग्रेस दलित महापुरूषों का सम्मान करती तो उनकी मूर्तियां और उनके नामों से बनने वाले पार्कों और स्मारकों का कार्य नहीं रूकवाती।
14 अप्रैल के दिन बाबा भीमराव अंबेडकर को याद करने पहुंचा दलित जनसमूह धूप में बैठकर ये सोच रहा था कि शायद इस बार बहन मायावती दलितों के उत्थान के लिए किसी योजना या फिर कोई ऐसा मसौदा पेश करेंगी जिससे उनका और राज्य के साथ देश का हित हो, लेकिन अब शायद मायावती जी ये भूल गयी हैं। उनका एक ही एजेंडा दिखाई देता है और वो है वोट बैंक को बनाये रखना। क्योंकि अब वह दलित और पिछड़ी नहीं हैं, बाल कटवा कर और कान, गले, नाक में हीरे के जेबर पहनकर वह दलितों को भी मुंह चिढ़ाने लगी हैं। उनके स्टाइल से ऐसा लगता है जैसे वह इंग्लैड की महारानी हैं और वह यहां देश के दलितों पर राज करने आयी हैं। ये कुछ दलितों को बुरा अवश्य लग सकता है, क्योंकि दलित उनसे बेपनाह प्रेम करता है और देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखता है। लेकिन अब दलितों के नजरिये से मायावती दलितों की कम और कुर्सी की ज्यादा सोचती हैं। ये ठीक हो सकता है क्योंकि जब तक कुर्सी रहेगी तभी तक वह दलितों के लिए कुछ कर भी सकती हैं, लेकिन अब तो वह सत्ता में हैं। केन्द्र में दलित सरकार न सही, लेकिन राज्य में तो है। राज्य में अभी तक दलितों की हत्या हो रही हैं। दलितों के घर फूंके जा रहें हैं। अभी हाल का ही उदहारण लिया जाये तो ग्रेटर नोयडा में एक दलित को घोड़ी पर चढ़कर बरात नहीं ले जाने दी गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चमी उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है। दलितों की मसीहा मायावती जी को ये बात पता नहीं कब समझ में आयेगी की दलितों को पार्क नहीं रोजगार और रोटी चाहिए। बाबा साहब ने कहा था कि जाओं जमीनों पर हल जोतो, सरकारी नौकरियां करो। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मेरी मूर्ति लगाकर मेरी पूजा करना। उन्होंने कभी नहीं कहा मेरे नाम से पार्क बनवाओं, हां ये जरूर कहा की सभी दलित एक होकर राष्ट्र निर्माण में ज्यादा से ज्यादा सहयोग दो। राजनीति में प्रवेश करो और दलितों को सहयोग प्रदान करो। जबकि बीएसपी सुप्रीमो के यहां दलित कम और स्वर्ण ज्यादा काम करते हैं। उनका सलाहकारों में इका दुक्का ही दलित है। बेचारा दलित तो बहन जी के कानों में हीरे के कुंडल देखकर ही मन ही मन ये सोचता रह जावे हैं कि भाई बहन जी म्हारी अमीर हो ली, अब तेरी बारी है। लेकिन बहन जी को नोट और वोट इतने अच्छे लगते हैं कि वह इनसे बाहर ही निकलना नहीं चाहती।
खैर इस साल हमने सोचा बहनजी कोई आवास की या फिर रोजगार की योजना दलितों के लिए लायेंगी तो कुछ काम धंधा और घर मकान का सपना दलितों का पूरा होगा। चकबंदी और रोजगार पर कुछ बहनजी कहेंगी। लेकिन बहनजी ने तो सारा भाषण ही कांग्रेस के सर दे मारा। वहीं दूसरी ओर बाबा के नाम पर राहुल बाबा ने बाबा के समर्थन में जमकर कांग्रेस के दलित हित में किये गये कार्यों की विवेचना की। एक और बहन जी दूसरी ओर बाबा बीच में दलितों के मसीहा बाबा साहब अंबेडकर और उनके दलितों जनों के सपने। दोनों राजनीति की चक्की में इस तरह से पीसे की दोनों की आत्माएं एक साथ बोली की ‘अब बाबा किसके’?

सोशल नेटवर्किंग


आपने खरगोश और कछुये की कहानी जरूर सुनी होगी। जिसमें धीरे धीरे चलने वाला कछुआ तेज दौड़ने वाले कछुए से जीत जाता है। कहानी का सार कुछ इस तरह से है कि एक दिन कछुए और खरगोश में शर्त लगती है कि इन दोनों में से कौन तेज है। कछुआ कहता है मैं तेज हूं। खरगोश अनाड़ी को ये बात हजम ही नहीं होती। वह कहता है भला धीरे धीरे चलने वाला कछुआ कैसे तेज हो सकता है। खरगोश गलतफहमी का शिकार होता है औऱ वह कछुए से शर्त लगा बैठता है। जंगल के सभी जानवरों को जब इस बात का पता चलता है तो सभी लोग कछुए और खरगोश की दौड़ देखने के लिए आते हैं। कछुए औऱ खरगोश के बीच प्रतिस्पर्धा का निर्णय लेने का हक कछुए के मुंह बोले मामा शियार को दिया जाता है। दौड़ आरंभ होती है। खरगोश औऱ कछुआ भागते हैं, खरगोश काफी आगे निकल जाता है और पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता है कि कछुआ अभी धीरे धीरे आ रहा है क्यों न थोड़ा सा आराम कर लिया जाये और वह छांव में जाकर सो जाता है। खरगोश सो जाता है लेकिन अपने निरंतर प्रयास से कछुआ चलता रहता है चलता रहता है और दौड़ जीत जाता है। ये तो थी वह कहानी जो हमने आजतक पढ़ी और सुनी अब सुनिये बाबा पोलखोल की जुबानी नयी खरगोश और कछुए की कहानी.............

कछुआ और खरगोश दो दोस्त थे। कछुए का सोशल नेटवर्क बड़ा ही स्ट्रोंग था वही खरगोश को ये लगता था कि वह काम करने और मेहनत करने में तेज है इसलिए वह सारी दुनिया में सबसे अच्छा औऱ गुणवान व्यक्ति है। खरगोश को अपनी मेहनत करने औऱ तेजी पर गलत फहमी हो जाती है। जबकि खरगोश उसे बार बार समझता था कि भाई तेजी से नहीं समझदारी, जुगा़ड़ और सोशल नेटवर्किंग कामयाबी का रास्ता हैं। इसपर एक दिन दोनों दोस्तों में ठन गई। खरगोश को आ गया ताब उसने कछुए को चैलेंज करते हुए दौड़ लगाने के लिए कह दिया साथ ही कहा जो इस जंगल का एक चक्कर सबसे पहले लगा देगा वहीं तेज औऱ मेहनतकश होगा। कछुए ने खरगोश को बहुत समझाया कि भाई आप नहीं जीत पायेंगे इस जंगल में मुझसे, लेकिन खरगोश नहीं माना और लगा ली शर्त।
खरगोश ने एक सप्ताह का समय कछुए को तैयारी का भी दे दिया। कछुए ने शर्त स्वीकार कर ली। यहां तो खरगोश दिन रात एक करके दौड़ की तैयारी करने लगा जबकि दूसरी ओर कछुआ जंगल के हर जानवार और अपने मामा शियार से मीटिंग्स में व्यस्त रहा। कछुए ने एक सप्ताह जंगल में दावते दी जानवारों को उनकी पसंद का भोजन करवाया शराब पिलवाई और मुम्बई से बार बालाओं को बुलवा कर रैव पार्टी का आयोजन भी किया। जंगल के सारे जानवर खुश जबकि खरगोश पूरे सप्ताह दंड पैलने में लगा रहा औऱ अपनी टांगों को मजबूत करने में लगा रहा। दौड़ का समय आ गया। शियार भाई आंखों पर काला चश्मा लगा कर झंडी लिये ट्रेक पर आ गया। खरगोश ने अपने नाईकी के स्पाइक शू कस लिये और अपना स्पोर्टर कसकर अपनी कमर कस ली। वहीं दूसरी ओर खरगोश सफेद कुर्तें पयजामा पहन कर साधारण चप्पल में ट्रेक पर उतरे। कछुए को इन कपड़ों में देखकर खरगोश बोला भाई दौड़ लगाने आये हो या राजनीति करने। कछुआ बोला भाई कुछ भी समझों अपुन ऐसे ही दौड़ेगे। खैर खरगोश ने एक बार कछुए को देखा और अपनी मंजिल की ओर देखकर ट्रैक की ओर देखने लगा। शियार ने गोली दागी औऱ दोनों प्रतियोगियों के बीच दौड़ होने लगी। खरगोश जंगल में नदी नाले पेड़ पौधे सभी को कूदता फांदता भागा जा रहा था। जबकि खरगोश अपनी मस्त होकर चल रहा था। जब खरगोश ने आधे से ज्यादा जंगल पार कर लिया तो उसने सोचा कि देखा जाये कछुआ भाई कहा हैं उसने इधर उधर देखा लेकिन दूर दूर तक कहीं कछुआ दिखाई नहीं दिया। खरगोश ने सोचा शायद भाई पीछे रह गये हैं। वह अपनी मंजिल की ओर चलता गया और न तो कही रूका और न ही कही सोया वह तेज दौड़ा और मंजिल तक पहुंच गया। लेकिन उसने देखा की उससे पहले वहां कछुआ मौजूद है और जंगल के सभी जानवार उसका स्वागत फूल मालाओं से कर रहे हैं। खरगोश ने जब ये देखा तो उसका सर भन्ना गया उसे चक्कर आ गये। वह कछुए के पास गया और बोला अबे साले न तो तू मेरे साथ दौड़ा न ही तू भागा फिर मुझसे पहले यहां कैसे पहुंच गया। इस पर कछुआ धीरे से मुस्कुराया और अपने कुर्तें के आस्तीनों को ऊपर करते हुए बोला अबे मैंने तुझसे कहा था न की इस दुनिया की कोई भी दौड़ दौड़ने से नहीं सोशल नेटवर्किंग से जीती जाती है। इतना सुनते ही खरगोश सन्न रह गया और जंगल के सारे जानवर कछुए की जयघोष करते उसे अपनी पीठपर बैठाकर उसकी जय जयकर करते जंगल में चले गये। अब कछुआ उनका नया चैंपियन था।

Tuesday, April 13, 2010

क्या हमारे बुजुर्गों ने हमें नहीं पढ़ाया


आपने टोपी वाले की कहानी अवश्य सुनी होगी जिसमें एक आदमी टोपियों का कारोबार किया करता था। एक दिन वह शहर से टोपियां बेच कर अपने घर वापस आ रहा था। दोपहर का समय था टोपी वाले ने सोचा अभी गांव थोड़ा दूर है और दोपहर हो चली है। क्यों न किसी पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाया जाये इस बहाने थोड़ा सुस्ता भी लिया जायेगा। ये सोचकर टोपीवाला एक घने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया और खाना खाने के बाद टोपियों का झोला एक ओर ऱखकर सुस्ताने के लिए लेट गया। पेड़ की ठंडी छांव में व्यापारी को नींद आ गयी। वह सो गया। एक घंटे के बाद उसकी आंख कुछ शोर सुनकर खुली। वह उठकर बैठ गया। उसने देखा की उसके झोले से टोपियां गायब थी। इधर उधर देखने पर भी उसे अपनी टोपियों का पता नही चला, लेकिन पेड़ पर ऊपर देखने से उसे पता चला कि ऊपर मौजूद बंदरों ने उसकी टोपियां उठा ली हैं। वह उन्हें देखकर चिल्लाया और अपनी टोपियां वापस करने के लिए इशारा किया लेकिन बंदर तो बंदर थे नहीं समझे। तभी व्यापारी को एक उपाय सुझा उसने अपनी टोपी जमीन पर दे मारी। ये देखकर नकलची बंदरों ने भी ऐसा ही किया औऱ इस तरह से व्यापारी को अपनी सारी टोपियां वापस मिल गई। ये वो कहानी थी जो आज तक हमने पढ़ी और समझी की बंदर नकलची होते हैं, और परेशानी में संयम और बुद्धिमता से हर परेशानी का हल निकल आता है।

लेकिन अब आगे सुनिये.............

एक लंबे अंतराल के बाद इसी व्यापारी का पोता फिर से इसी रास्ते से गुजरा। क्योंकि वह भी टोपियों के कारोबार में था। सभी कुछ वैसा ही हुआ जैसा उसके दादा जी के साथ हुआ। शहर से वापसी में दोपहर हुई, पेड़ आया उसने खाना खाया आराम के लिए आंखें बंद की औऱ सो गया। वह किसी आवाज की वजह से जागा देखा टोपियां गायब।
इधर उधर देखा टोपियां नहीं मिली। फिर उसे अपने दादा जी की बात याद आयी।
सर उठा कर ऊपर पेड़ पर देखा.... बंदर के सर टोपी देखकर युवक मुस्कुराया और पहले टोपी वापस देने की गुजारिश सी की। बंदर फिर बंदर कहां कहने से टोपी देने वाले थे। युवक को अपने दादा की बात याद आयी। युवक ने वही तरकीब लगाई और जोर से अपनी टोपी जमीन पर दे मारी।
फिर क्या हुआ.............
युवक ने ऊपर देखा, बंदरों की ओर से कोई रिस्पोंस नहीं आया।
युवक ने फिर अपनी टोपी जमीन पर मारी........ फिर रिस्पोंस नहीं।
एक बार, दो बार, तीन बार लगातार कई कोशिश करने के बाद भी बंदरों का कोई रिस्पोंस नहीं आया।
युवक झल्ला गया और चीखकर बोला अबे ओ बंदरों क्यों मेरी टोपियां जमीन पर नहीं फेंकते।
ये सुनकर पहले बंदर मुस्कुराये और फिर कहकहा लगाकर जोर से हंसे और बोले.... अबे मानवजात क्या कुछ सीखाने या पढ़ाने का जिम्मा तुम्हारे बुजुर्गों ने ही लिया हुआ है हमारे बुजुर्गों ने हमें कुछ नहीं सीखाया। हमें भी तो वह कुछ पढ़ा कर सीखाकर गये होंगे।
समय के साथ परिस्थितियां बदलती है।

Wednesday, March 31, 2010

पुराने दिन फिर लौट आये

हाल ही में हमारे पुराने कालेज ने हमें याद किया। ये वो पल थे जिन्होंने मेरी पोस्ट ग्रेजुएट कालेज की यादों को एक बार फिर से ताजा कर दिया। मैं रात में ये सोच कर सो भी नहीं पाया कि कहीं मुझे सुबह कालेज पहुंचने में देर न हो जाये, क्योंकि मैं दस साल के बाद यहां जा रहा था तो मन में एक डर होना स्वाभाविक भी था। डर था, अगर किसी ने पूछा की दस साल के बाद आज आपने क्या पाया तो शायद मेरे पास एक ही जवाब था कि 'जिंदगी में मैंने कमाया बहुत कुछ, इस जिंदगी में मैंने गवाया बहुत कुछ, और सच कहूं तो इस जिंदगी ने मुझे सिखाया बहुत कुछ'। लेकिन शायद ये लफ्ज उन नये छात्रों के लिए ना काफी है जो अपना जीवन आरंभ कर रहे हैं।
खैर मैं अपने परिवार के साथ अपने कालेज पहुंचा। वहां पहुंच कर मेरे बेटे ने मुझ से बड़ी ही प्यारी बात कही, उसने मुझसे अपनी तोतली जुबान में कहा पापा आपका स्कूल बहुत बड़ा है। आप इस स्कूल में पढ़ते हो। उसकी ये बात सुनकर मुझे लगा कि वाकई मेरा स्कूल बहुत बड़ा है क्योंकि ये मेरा स्कूल ही है जिसने मुझे पार्थ, किश्लय (मेरा बेटे) और पत्नी को दिया। ये वही स्कूल है जिसने मुझे जीवन को जीने का अंदाज दिया। मैंने सर उठाकर और भरे गले से अपने बेटे के सर पर हाथ रखकर कहा 'हां बेटा वाकई मेरा स्कूल बहुत बड़ा है'।
इसके अलावा भी एक बात और है जो मेरे स्कूल यानी कालेज को बड़ा बनाती है। हम स्कूल में मात्र किताबों से रटारटाया ज्ञान लेते हैं, तोते की तरह हम रटा मारते हैं और परीक्षा में अच्छे अंक लाकर कालेज की दहलीज तक पहुंच जाते हैं। मेरा कालेज क्योंकि इस लिए भी मेरे लिए महत्व रखता है क्योंकि ये इसने मुझे एक अलग पहचान दी। दुनिया दारी को समझने की ताकत और समाज में रहने का तरीका समझाया। बेशक मैं अभी वह पहचान नहीं बना पाया हूं जो मुझे बना लेनी चाहिए थी. लेकिन मैं अपने घर से पहला पोस्ट ग्रेजुएट लड़का रहा, जो अपने गांव जब जाता था ( आजकल वो कस्बा हो गया है, जहांगीरपुर) तब मैं रास्ते में ही अपनी कमीज की आस्तीने ऊपर कर लिया करता था। मैं जैसे ही अपने गांव के बस स्टैड पर पहुंचता था तो मेरे जानने वाले मुझसे बड़े ही अदब से पेश आते थे। अब वो मुझे "अबे ओ फलाने के लौंडे" नहीं कहते थे। वो कहते थे भइया दिल्ली से आ गया। भइय़ा शब्द दिल्ली वालों के लिए छोटा हो सकता है लेकिन उस आदमी के लिए बहुत बड़ा शब्द है जो गांव देहात और कस्वों में रहने वाला है। भइय़ा का मतलब परिवार का सबसे समझदार और होनहार लड़का जिसे उसका बाप भी भइया ही कहता है। उसमें इतनी प्यार की चाशनी होती है जिसे बयान करना बेहद मुश्किल काम है। खैर मैं भइया हो गया, घर के मामलों पर मेरी राय ली जाने लगी और परिवार में सम्मान की नजर से भी देखा जाने लगा। हालांकि सम्मान पहले भी मिलता रहा लेकिन ये दूसरे तरह का सम्मान है।
हालांकि कालेज में अब बहुत से परिवर्तन हो चूके हैं और यहां के पेड़ और सड़कों के अलावा और कोई हमारी पहचान करने वाला भी बाकी नहीं बचा। हां एक ऑफिस के पुराने कर्मचारी हैं श्री प्रदीप बुद्धिराजा जिनके बाल सफेद हो चले हैं। मैं जब कालेज पहुंचा तो सभी कुछ वही था। कालेज की मंजिले आज भी लड़के लड़कियों की खिलखिलाहट से गूंज रही थी। आज भी कैंटिन में चाय और समोसा पहले लेने की होड़ थी। आज भी पार्कों में युवक युवतियां अपने आने वाले कल के लिए क्यारियों में लगे पौधों से अपने लिए सपनों के पुष्प तोड़कर अपनी अपनी झोली में रख रहे थे। आज भी कुछ लोग अपने सीनीयर्स को अपने हाथ की रेखा दिखा कर अपने भविष्य की बातों को जानने में उत्सुक दिखाई दे रहे थे। सभी कुछ वहीं था जो दस साल पहले था, नहीं था तो वह चेहरा जिसे में कालेज के दिनों में चोरी छिपे अपनी क्लास की ओर आने वाली सीढ़ीयों के ऊपर बने बरामदे में से झांककर देखा करता था और जब वह चेहरा मेरे पास आ जाया करता था तो में शर्मा कर अपनी आंखे झुकाकर उसे मुस्कुरा कर हैलों कहा करता था। मेरी आंखों ने उस चेहरे को कई बार खोजा लेकिन वो चेहरा आज मुझे नहीं दिखाई दिया हां उसका अहसास जरूर हुआ और होता भी क्यों नहीं क्योंकि वह चेहरा आज भी मेरी यादों में ताजा तो है ही।

Friday, March 19, 2010

खामोशी शोर मचाती है


मेरे जीवन में खामोशी शोर मचाती है।
मेरे कान झन्ना जाते हैं सर चकरा जाता है।
मेरे जीवन की खामोशी चीखचीख कर मुझे रूलाती है।
वह कहती है, आखिर क्यों हार गये तुम इस जीवन से।
तुम तो वही युवा थे जो दुनिया बदलने का मादा रखता था। हौसलें बुलंद थे तुम्हारे। फिर क्या हुआ। क्या तुम भी हार गये उनकी तरह जो जीतने के लिए चले तो थे लेकिन जीतने से पहले ही हार गये।
मेरे लाख जतन करने पर भी मेरे मन की खामोशी शांत नहीं होती। वह चीखती ही रही चिल्लाती ही रही।
फिर एक दिन खामोशी टूटी।
खामोशी बोली।
जीतना या हारना मेरे बस की बात नहीं।
वह नियती के हाथ है।
लेकिन ये सही है कि एक साया जो था मेरे साथ वह आज मेरे साथ नहीं है।

Wednesday, March 17, 2010

प्रतिस्पर्धा

जीवन की दौड़ में अनवरत चलने वाली प्रतिस्पर्धा को समर्पित मैं दौड़ा चला जा रहा था। बगैर ये सोचे की ये रेसिंग ट्रैक कहा समाप्त होगा।
मैं दौड़ रहा था उस ट्रैक पर जिसका कोई आदि और अंत नहीं था।
मैं जितना तेज दौड़ता उतनी ही प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती।
मेरे साथी गोली की आवाज के साथ भागे थे मेरे साथ ही, उनमें से कुछ मेरे साथ अब भी दौड़ में शामिल थे और कुछ को मैं पीछे मुड़कर देख नहीं सकता था।
लेकिन दौड़ से पहले सभी दावेदार शानदार थे, सभी दावेदार एक से बढ़कर एक थे।
किसी के भी दौड़ में पीछे छुटने की कोई गुजाइश ही नहीं थी।
हमारे आकाओं को (बॉस) हम पर विश्वास (नौकरी देकर हमें प्रतिस्पर्धा में शामिल किया) था।
आंखों पर बड़े बड़े काले चश्में (लालच) लगाकर हमारी हौसला अफजाई कर रहे थे।
हमें ये लगा की वह हमारी जीत पर हमारे कंधे थपथपा कर हमारी कामयाबी का जश्न मनायेंगे।
जश्न तो वह मना ही रहे थे, क्योंकि हम उनके लिए वह प्यादे थे जिनके सर देकर राजा जंग जीतकर ‘मसीहा’ बनता है।
मैं लगातार अपनी जीतपर खुश था, मुझे लग रहा था कि वह मेरी जीत पर हंस रहा है। लेकिन वह इस बात पर खुश था कि उसका 100 का काम मैं 10 में कर रहा था। वह इस बात पर भी खुश था कि उसका धंधा फलफूल रहा है।
वह ट्रैक के गलियारे में से सिगार फूंकता अपने दांतों को भीचकर हंसता और मेरा नाम लेकर मुझे और तेज दौड़ने को कहता।
वह चीखता कभी चिल्लाता और मुझे अनवरत दौड़ने का हुक्म देता।
मैं भी दौड़ रहा था क्योंकि इस दौड़ से मेरा परिवार चल रहा था।
मेरे बच्चे इस दौड़ के सट्टे से स्कूल जा रहे थे, मेरी पत्नी रोज सिंगार करके मेरे पसीने से लथपथ चेहरे को अपने अंचाल से पूछा करती थी।
सभी कुछ ठीक था लेकिन मेरे शरीर की धमानियां फूलने लगी थी, दिमाग पीछे रह गये साथियों को देखने की कोशिश कर रहा था।
क्योंकि प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलने का डर जो था और उम्र के साथ मेरी धमानियां फूल रही थी सांसे टूट रही थी।
मैं अभी सोच ही रहा था कि अचानक ही मेरा आका चिल्लाया (जब पहली बार मैं कामयाब नहीं रहा)।
अबे तेरा ध्यान किधर है ‘हरामखोर’ गधे उल्लू के पठ्ठे।
मैं भौचक्का था अपने आका का ये चेहरा देखकर।
वह अभी भी आंखों पर बड़ा सा काला चश्मा लगाकर मुझे धूर रहा था, उसका सिगार अभी भी जल रहा था। लेकिन इस बार वह अपना जबड़ा भीचकर मुझपर चिल्ला रहा था।
मैंने हाथ उठाकर जब उससे कहा की मेरी धमानियां फूल रही है तो वह तिलमिला गया और मुझपर और तेज चिल्लाने लगा।
मेरी समझ में इससे पहले कुछ आता इससे पहले मैंने अपने पैरों के नीचे कुछ चिपचिपाहट महसूस की।
मैंने ट्रैक को ध्यान से देखा तो एक बदबू मेरे नाथूनों को भेदती हुई मेरे दिमाग को झकझोर गई।
‘मानव रक्त’ ये सोचते ही मेरा दिमाग फटने को हुआ।
मैंने देखा मैं जिस ट्रैक पर दौड़ रहा था वह तो कहीं समाप्त ही नहीं होता था वह गोल था और उसके चारों और मेरे ही जैसे प्रतिस्पर्धियों के आका विराजमान हैं।
इस दौड़ में शामिल हुआ जा सकता था लेकिन बाहर जाने का रास्ता ही न था।
मैं दौड़ रहा था अब भी, मेरा सांस फूल रही थी, मैंने अंतिम बार बगैर ये सोचे की मेरा अंत क्या होगा। मैं फिर दौड़ा पूरा जोर लगाकर।
मैं अभी दौड़ा ही थी कि मेरे पैरों के नीचे कुछ फंसा और फंसता ही चला गया।
मैंने जैसे ही अपने पैरों की ओर देखा, डर से मेरे मुंह से सिसकी निकल आयी और आंखों में खौफ से आंसू।
मेरे पैरों के तले मेरा ही एक साथी रौंदा जा रहा था।
वह प्रतिस्पर्धा में निरंतर दौड़ने से थक गया था और गिर गया था।
वह उठता इससे पहले ही मैंने उसके ‘पेट’(नौकरी) पर अपना पैर रख दिया था।
वह चीखकर कह रहा था कि भाई मुझे बचा लो, लेकिन अपने को विजयी रखने के लिए मैंने उसकी बात ही नहीं सुनी।
वह थककर लहूलुहान होकर ट्रैक पर निढाल होकर गिर पड़ा।
उसके गिरते ही एक के बाद एक प्रतिस्पर्धियों ने उसकी छाती पर पैर रखना आरंभ कर दिया और झुंड उसे रौंदता हुआ आगे निकल आया।
ये झुंड मेरे भी पीछे था, और लगातार मेरी ओर बढ़ रहा था।
मैं उन्हें अपनी ओर इस झुंड को आता देखकर और तेज दौड़ा, लेकिन झुंड के एक युवा प्रतिस्पर्धी ने मुझे पीछे पछाड़ दिया और उसके पीछा आता झुंड अब मुझे रौंदने ही वाला है, मैंने ट्रैक को अब अपने नाथुनों से महसूस किया।
ट्रैक पर मेरे जैसे अनगिनत प्रतिस्पर्धियों का लहू पड़ा था जो ट्रैक को पोषित कर प्रतिस्पर्धा को मजबूती दे रहा था।
वह लहू ही था जो ट्रैक पर फिसलन पैदा करता था और ट्रैक पर मौजूद हर्डल प्रतिस्पर्धियों को टूटे फूटे क्षतविक्षित शरीर थे ।
मेरी जैसे ही ये बात समझ में आयी पीछे की भीड़ ने मुझे रौंदा और मैं कुछ ही पलों में ट्रैक पर बिखर गया।
मुझे प्रतिस्पर्धियों ने रौंद डाला।
मैंने अंतिम दफा अपने आकाओं से हाथ उठाकर मदद मांगी, मेरा हाथ ऊपर उठका देख मेरे आका ने मुझपर गुर्राते हुए देखा और कहा, नालायक हमने तभी से तुझपर से अपनी दया हटा ली जिसदिन तूने पहली दफा ट्रैक पर देखा।
मैं कुछ समझता इससे पहले ही मुझे इस दुनिया की आवाजें आनी बंद हो गयी।
अब मुझे केवल अपने परिवार की आवाजें आ रही थी। मेरा चार साल का बेटा ‘पार्थ’ (अर्जुन जिसने महाभारत युद्ध में अहम भूमिका निभाई) जिसे मैं अपने जीवन के महाभारत के लिए तैयार कर रहा था, वह मेरे आकाओं के रहमों करम पर था। वह उसपर हंस रहे थे और उसके हाथों में गांडीव (कलम) की जगह अपना अध पिया व्हिस्की का प्याला दे रहे थे।
मेरी पत्नी उनके पैरों में थी जिसकी छाती पर उनकी निगाहे गढ़ी थी।
मैं अभी अंतिम सांसे ले ही रहा था कि मेरे आकाओं ने मुझपर रहम किया।
जोर का ठहका लगा कर उन्होंने मुझसे कहा, देखों मेरे गुलाम हमने तुमपर रहम किया।
आज तुम्हारा सपना (हमारा सपना) ये पूरा करेगा।
उन्होंने मेरे बड़े बेटे को जो अभी तक दुनिया के तौर-तरीकों से अनभिज्ञ था उसे ट्रैक पर उतार दिया।
और तभी एक गोली की आवाज ने भारी सन्नाटा कर दिया।
सन्नाटा जो फैलता ही गया मेरी आंखों की तरह। क्योंकि फिर एक प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गयी थी, नया प्रतिस्पर्धी, शायद नहीं क्योंकि वह भी तो मेरा ही लहू है।

Thursday, March 4, 2010

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मगरमच्छ

मीडिया में अनगिनत मगरमच्छ हैं, इनमें से कुछ तो मीडिया के भीतर ही है और कुछ खुले में विचरण कर रहें हैं। जो भीतर हैं वह नये लोगों को हिकारत की नजर से देखते हैं और जो बाहर हैं वह अपनी नयी नौकरी की तलाश में हैं।

यह लोग नये लोगों के द्वारा की गई इज्जत को चापलूसी समझकर उनका जमकर शोषण करते हैं। ये दोनों तरह के मगरमच्छ ज्यादातर वह पत्रकार हैं जो कुछ नाम कमा चुके हैं और ये समझते हैं कि अब वह इस फील्ड के 'बाबा' हो गये हैं।इनमें चालीस की दहलीज पार कर चुके अधिकतर वह पत्रकार हैं जो युवा महिला पत्रकारों पर अधिक और पुरुष पत्रकारों से थोड़ी सी कन्नी काटते हैं। लेकिन जब इन्हें पता चलता है कि आज शाम की दारु का जुगाड़ लोंडे के पास हैं तो वे इससे भी प्यार से बात कर ही लेते हैं। इस तरह के जीव आपको आईएनएस(INS) के सामने के पार्क और अधिकतर प्रैस क्लब में विचरण करते मिल जायेंगे। आईएनएस के सामने वाले पार्क में शाम के समय आठ दस झुंड में ये लोग मिल जाते हैं। इनमें से अधिकतर वह बेरोजगार पत्रकार होते हैं जो यहां काम कर रहें पत्रकारों से अपनी नौकरी की सिफारिश या फिर किसी अखबार अथवा इलैक्ट्रोनिक मीडिया के दफ्तर में अपनी गोटी सैट करने आये हुय़े होते हैं।
यहां पर इन्हें ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो नये होते हैं और जिनके लिये आईएनएस किसी हज से कम नही होता। नये लोगों को लगता है कि आईएनएस ही एक मात्र ऐसी जगह है जहां से उन्हें काम या फिर इस क्षेत्र में ऊभर रही नयी संभावनाओं की जानकारी मिलेगी। ये ठीक भी है, लेकिन पुराने लोग इसी बात का फायदा उठाकर नये युवा पत्रकारों का शिकार यहां करते हैं। पहले ये उसे अपनी जेब से एक दो बार चाय पिलाते हैं। पत्रकारिता पर लंबे लंबे भाषण देते हैं। चूंकि इन्हें कोई और काम तो होता नहीं है इसलिये ये अपनी तारीफ के कसीदें भी गढ़ने से यहां पर बाज नही आते। इसके बाद इनका नये लोगों को फंसाने का काम आरंभ होता है। ये पहले उससे उसका फोन नंबर और फिर धीरे धीरे बड़े ही प्यार से उससे अपनी चापलूसी करवाते हैं। वह इससे कुछ इस तरह से बात करते हैं जैसे सारी दुनिया के पत्रकार इनके चेले हैं और ये गुरू। अब ये गुरू घंटाल इन नये लोगों से कुछ छोटी स्टोरी करने के लिए या फिर कोई रिसर्च का काम करने के लिए कहते हैं। युवा पत्रकार को लगता है कि उसकी परीक्षा शुरू हो गयी। वह लाइब्रेरी में घंटों बैठकर रिसर्च करता है और एक दो दिन बाद गुरू घंटाल को सौप आता है। बस फिर क्या गुरू खुश, दे डालते हैं चेले को आर्शीवाद। बेटा आपने काम बढ़िया किया। देखना ये जल्द ही छपेगा। फिर वह छपता भी है, लेकिन गुरू घंटाल के नाम से। ऐसे गुरू घंटालों ने अपने घरों में भी एक दो पीसी लगाकर अपनी प्रैस खोली हुई है।

ये नये लड़को से काम करवाते हैं और उसे अपने नाम से धड़ाधड़ छपवा कर मोटा पैसा कमाते हैं बदले में ये युवा पत्रकार को ये कहकर की अभी तो आप काम ही सीख रहें हैं। इसे ये प्रत्येक लेख के सौ या फिर ज्यादा से ज्यादा दो सौ रुपये थमा देते हैं। इन गुरू घंटालों में वह पत्रकार हैं जिनका काम फ्रीलांसर के रूप में देश के कुछ प्रमुख अखबारों में छपता रहता है। ऐसे लोग अगर आपको मिल जाये तो इनके सामने से ऐसे गायब हो जाना जैसे गधे के सिर से सिंग। इसी तरह से कुछ मोटे दारूबाज पत्रकार आपको शाम के समय अपनी 'गोटी सैट' करने प्रैस क्लब आते हैं। ये वह पत्रकार होते हैं, जो इधर उधर से कमा चुके हैं और मोटा कमाने की चाह में यहां आते हैं। ये दारूबाज यहां बैठकर ये सुनिश्चित करते हैं कि किस चैनल में हमारी दाल ठीक से गल सकती है और कौन से चैनल का मालिक साल दो साल के लिये उनके द्वारा ठीक प्रकार से बेवकूफ बन सकता है। यह प्रैस क्लब में बैठकर ये भी तय करते हैं कि किस चैनल के मालिक को उसी के दफ्तर में बैठकर कितना 'काटा' जा सकता है। ये वह लोग होते हैं जो अक्सर अपने आप को थोड़ा सा बेकार में ही व्यस्त रखते हैं। ये आपको दिल्ली की हर उस पार्टी में मिल सकते हैं जहां मुफ्त की दारू और मुर्गा मिलता हो। इनका दिल महिलाओं के प्रति नरम होता है। इन्हें अगर कोई महिला युवा पत्रकार बात कर लें तो ये उनसे चिपक ही जाते हैं। इनका एक ही उद्देश्य होता है जीवन में मैक्सिमम एन्जाय और वह भी फोकट में।ये नये लोगों को उपदेश खूब देते हैं लेकिन कभी सही रास्ता नही बताते।

यह हमेशा अपने जुगाड़ में रहते हैं और नये लोगों को हमेशा आत्मबल गिराते रहते हैं। उनका विश्वास तोड़ते रहते हैं। ऐसी बाते सुनाते हैं कि कोई कमजोर दिल का युवा हो तो बेचरा आत्महत्या ही कर ले। ये नये लोगों को इतना डिप्रैस करते हैं कि वह या तो इस फील्ड को छोड़ने का मन बना लेता है या फिर ये मानने लगता है कि उसने जीवन की सबसे बड़ी गलती पत्रकारिता में आकार कर दी। इनमें से कुछ लोग जो चैनलों में काम करते हैं महिलाओं की इज्जत से भी खूब खेलते हैं। अभी हाल की ही मैं बात करू तो कुछ ही समय पहले लगभग छह महीने पहले देश के एक प्रमुख चैनल के रिपोर्टर के खिलाफ एक युवा पत्रकार ने आरोप लगाया कि, फलां आदमी ने मुझे पिछले छह महीने से यहां नौकरी का झंसा दिया हुआ है और वह पिछले छह महीने से मेरी आबरू से खेल रहा है। इस बात को सुनकर चैनल के बड़े अधिकारियों को बोलती बंद हो गयी। क्योंकि भाई जान पहले भी कई बार ऐसे मामलों में नाम कमा चुके थे। इस बात को जो भी कोई सुनता वह यही कहता, भाई जान के लिये ये कौन सा नया काम है। यह तो वह हर छह महीनें में करते हैं। लेकिन युवा महिला पत्रकार भी हार मानने वाली नही थी। उसने भाई जान के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करवाने के कोशिश की, लेकिन भाई जान का नाम ऐसा है कि अपने देश की पुलिस भी नाम सुनकर सन्न रह गयी। मामला चैनल के प्रमुख लोगों तक पहुंचा, लेकिन ऊपर के लोग अगर रिपोर्टर के खिलाफ जाये तो उनके चैनल से एक ऐसा चेहरा कम होता है जिसके बल पर चैनल पूरे बाजार में एक टांग पर कूदता फिरता है। अब चैनल क्या करे, तो उसने वही किया जो अक्सर होता है। जब शिकारी शेर का शिकार नही कर पाता तो अपनी झेप मिटाने के लिए साले गधे का शिकार कर देता है। इससे दो फायदे होते हैं, एक तो गधे को मुक्ति दिलाने का भाग्यफल शिकारी को मिलता है। दूसरा गधे का शिकार करने पर कोई कुछ नही कहता। इसे एक्सीडेंट या गधे की शोर मचाने की आदात के बदले दी जाने वाली सजा के प्रावधान में जोड़ा जा सकता है। बाद में यह भी कहा जा सकता है कि साला गधा था, काम करना आता ही नही था। हम तो डंडे से काम करवाया करते थे। अब साले को सही रास्ता दिखा दिया। इस तरह से चैनल की खाल भी बच गयी और रिपोर्टर की शान को भी बट्टा नही लगा। कुछ दिनों की गहमा गहमी रही फिर सभी कुछ शांत, मामला रफा दफा।हालांकि बाद में सुनने में आया कि इस पीड़ित पत्रकार को एक नये चैनल में भाई जान ने काम भी दिलवा दिया। लेकिन काम के बदले युवा महिला पत्रकार को कितना अपमान सहना पड़ा इसका अंदाजा हम तो कम से कम नही लगा सकते। लेकिन भाई जान हैं कि मानते ही नही। अब सुना है कि भाई जान एक और युवा एंकर के साथ जीभर कर प्रेम का पान कर अपनी आत्म को तृप्त कर रहें हैं। इन्हें अक्सर चैनल की लिफ्ट में देखा जा सकता है। वैसे ऐसे किस्से हर एक चैनल में होते हैं। यहां भी है तो हमें क्या परेशानी है भाई। लेकिन एक बात तो है कि 'मीडिया का लुच्चा और घर का चोर' साला कभी हाथ नही आता। कारण बड़ा ही साफ है, ये दोनों ही ऊंची आवाज में बात करते हैं। असल में तो बात यह है कि मीडिया में जो एक बार चल गया वह अपने आपको "बाबा" मानता है।तो भाईयों आप को और बड़े मगरमच्छों की जानकारी देते हुए मैं आगे बताता हूं कि मीडिया में केवल ऐसे ही लोग नही है जो महिलाओं की इज्जत से खेलते हैं ऐसे भी लोग हैं जो समाज का खुले में चीर हरण कर देते हैं। यह लोग ऐसे हैं जिन्हें आप एक नजर से पहचान नही पायेंगे।

ये ऐसे लोग हैं जो मीडिया में हैं ही केवल गंद फैलाने के लिए। ये वह लोग हैं जो शार्टकट से उंची जगह पहुंचे हैं औऱ वहां रहने के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते हैं। यहां ऐसे भी लोग है जो आपको दिखने में बेहद सभ्य लग सकते हैं, लेकिन वह इतने कमीने हैं कि आप उनकी सोच तक पहुंच ही नहीं पायेगें। अब हाल ही का एक वाक्य में आपको सुनाता हूं। मेरे एक दोस्त हैं। अच्छा मेरे बहुत से दोस्त हैं इनमें ज्यादातर वह हैं जिनका जिक्र में यहां जरूर करने वाला हूं। ये दोस्त मेरा ऐसा है जो दिखने में बिल्कुल सतीश कौशिक जैसा है। फर्क केवल इतना है कि सतीश कौशिक मात्र कलाकार है और ये कलाकारों का भी कलाकार है। इन दिनों आप इन्हें आजतक के कार्बनकापी चैनल पर देख सकते हैं। अब यार हम से ये मत पूछना कि आजतक की कार्बनकापी कौन सा चैनल है। पहले ही हम इतने पंगे ले रहें हैं अब कुछ से तो पंगा नही ही लेंगे। खैर ये यहीं पर पाये जाते हैं और देखा गया है कि ये चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिये आरूषि का मोऱफ्ड किया हुआ एमएमएस चलवा रहें थे। मेरी समझ में ये नही आता कि बगैर किसी सबूत और ठोस प्रमाण के ये आदमी किसी के
आत्मा पर कैसे चोट मार सकता है। पहले ये चैनल के वरिष्ठ लोगों से एक्सक्लूसिव खबरें देने का झांसा देता रहा। यह कोई अच्छी खबर तो कर नही पाया हां आरूषि की हत्या को जरूर भुना गया। शर्म आनी चाहिए ऐसे पत्रकारों को जो अपने अधकचरे ज्ञान से इस क्षेत्र में गंदगी फैला रहें हैं। ये साले वह मगरमच्छ हैं जो समाज को भी गंदा कर रहें हैं और पत्रकारिता को भी।अब भाई लोग लगता है मैं तो भावूक हो गया। क्या करुं भाई लोगों इन दिनों कुछ चैनलों के द्वारा जो बदतमीजी मैंने आरूषि के मामले में होती देखी है इससे तो ये लगता है कि कुछ ही दिनों में ये 'बाइट सोल्जर' साले हम जैसे नये लोगों की बजा देने वाले हैं। क्योंकि इन्हीं को देखकर आने वाला समाज इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की भूमिका तैयार करेगा। वैसे भी आजकल पत्रकारों को 'दलाल' का पद तो मिल ही गया है। अब तो ये देखना है कि इस तमगे पर और कितने तमगे लगने बाकी हैं।

आंखों देखी -3

यूं तो उन दिनों की आंखों देखी में ऐसा बहुत कुछ था जिसे में अपने आने वाले उन पत्रकार साथियों का बताना चाहूंगा जो आंखों देखी संस्था में जाना चाहते हैं। लेकिन मैं यहां केवल उन घटनाओं को सामने रखना चाहूंगा जो मेरी आंखों के सामने ही घटित हुईं। हमारे असाइनमेंट इंचार्ज होते थे श्री दुष्यंत कुमार जी, वह इन दिनों दैनिक हिंदुस्तान में कार्यरत हैं। आंखों देखी में हमारे एक और इमिडियेट बॉस होते थे जो स्टोरी फाइनल किया करते थे और उन दिनों शायद प्रोग्राम हेड भी थे। अनंत मित्तल साहब। मेरी अनंत मित्तल जी से ज्यादा बातचीत नहीं हुई और ना ही उन दिनों भी होती थी। लेकिन स्टोरी चूंकि वही फाइनल किया करते थे तो एक दो बार उनसे भी मैंने डांट खाई है। खैर वह सीखने के दिन थे और उन दिनों सभी सीनियर अपने जूनियर्स को डांटते ही है जैसा कि दुनिया का दस्तूर भी है और नियम भी। अनंत मित्तल और दुष्यंत उन दिनों एक दूसरे के काफी गहरे दोस्त हुआ करते थे शायद अभी भी हैं। आंखों देखी में चूंकि ये दोनों ही बड़े पद पर थे तो मैडम का प्यार भी और दुत्कार भी इन्ही पर ज्यादा था। मुझे याद है दुष्यंत जी और मित्तल साहब को जब तनख्वाह नहीं दी गई और उन्हें आंखों देखी से रूखसत किया गया तो शहजाद के चेहरे पर बड़ी ही कुटिल हंसी थी। वह हमसे बोला कि चले गये 'साले' अपने आप को बहुत बड़े पत्रकार समझते थे। मैं यह बात इस दावे से भी बोल रहा हूं क्योंकि उस दिन दिनेश पाठक जो आज तक आंखों देखी में अपनी ऐढ़िया रगड़ रहें हैं वहीं मौजूद थे। दिनेश पाठक का तारुफ ये है कि दिनेश पाठक जी आज से छह साल पहले तक गंजे हुआ करते थे। इनके मुख के भीतर कुबेर की गोली हमेशा लगी रहा करती थी और जब भी मौका मिल जाया करता था यह फ्री की चाय जो अक्सर शहजाद मंगवाया करता था पी लिया करते थे। दिनेश पाठक ने अभी दो साल पहले शादी के बाद ही अपने सर पर नकली बालों की खेती करवायी है। सुना है उनकी बीबी को उनका गंजा सर अच्छा नही लगा करता था तो उन्होंने इसी के चलते अपने सर पर बालों की खेती करवा ली। खैर हम बात कर रहें थे दिनेश के तारूफ की तो दिनेश मेरा अच्छा दोस्त हुआ करता था लेकिन मुझे हमेशा से ऐसा क्यों लगता रहा कि दिनेश के शरीर में पहले कभी रीढ़ थी और ही आज है। वह शहजाद का जाने कैसे और कब इतना बड़ा चेला बन गया कि पूरी मीडिया को आज तक कभी चमचों की मिसाल देनी होती है तो वह दिनेश पाठक की दी जाती है। कहा जाता है साला चमचा हो तो दिनेश पाठक जैसा हो जिसे जितना भी दुत्कारों शाम को आकर मालिक के पैर चाटेगा ही चाटेगा। अब इस लेख को पढ़ने के बाद बेशक वो मेरा दोस्त तो रहेगा नही लेकिन कम से कम उसे अपनी छवि जरूर दिखाई देगी। अगर ऐसा हो जाये तो मेरे लिये ये भी संतोष की बात होगी क्योंकि उसे कम से कम अपनी असल शख्सियत का तो अहसास हो जायेगा और वह आंखों देखी से बाहर आकार देखने की कोशिश करेगा। अब हम वापस आते हैं दुष्यंत और अनंत पर। दुष्यंत जी और मित्तल साहब की नौकरी छोड़ दी या छुड़वा दी गई। मैडम का कहना था कि इन दोनों आदमियों को काम करना नहीं आता यानी स्टोरी लिखनी नहीं आती। ये मैडम ने किस आधार पर कहा ये बात वहीं अच्छी तरह समझा सकती है। क्योंकि मैडम के लिये कौन सी स्टोरी सही है और कौन सी गलत इसका अंदाजा आंखों देखी में आज तक कोई नही लगा पाया तो हम और हमारे ये दोनों शो-कॉल्ड बास कैसे लगाते। तो दोनों ही लोगों को रुखसत कर दिया गया और इनकी तनख्वाह भी नही दी गई। बैसे मैडम का ये रुल भी है कि वह जब कभी भी किसी से नाराज होती है तो उसकी तुनख्वाह वह किसी भी हाल में नही देती, चाहे फिर कोई उनका बीस साल से पुराना ड्राइवर हो या फिर नया रिपोर्टर। वह सभी को एक ही तराजू में तौल देती हैं। ऐसा इसलिये भी है क्योंकि मैडम को आजतक देश में कोई अपने आप से बेहतर पत्रकार दिखाई ही नही देता। दुष्यंत जी को जब जवाब दिया दिया गया तो हमने भी अपने रास्ता खोजना आरंभ कर ही दिया था। उन्हीं दिनों दुष्यंत जी और मित्तल साहब ने अपनी तनख्वाह लेने के लिए एक कोर्ट से नोटिस भी भेजा था जिसका जवाब मैडम ने आज तक नहीं दिया। अगर दिया होता तो दुष्यंत जी को अपनी सैलरी मिल गई होती। हालांकि मेरे दोनों सीनियर्स ने बाजार में यही कहा कि हमने अपने पैसे ले लिये, लेकिन शहजाद ने हमे जो बताया वो कुछ इस तरह से है। अगर ऐसे मैडम हर ऐरे गैरे नत्थू खैरे को पैसे देने लगी तो बस चल ली आंखों देखी। उन्होंने आज तक अपने बीस साल पुराने ड्राइवर को तनख्वाह समय पर नही दी वह इन्हें कल के काम करने वाले भूक्खड़ पत्रकारों को पैसें दे देंगी। मित्तल साहब तो कई बार ये भी कहते पाये गये कि उन्होंने मैडम से माफी मंगवा ली जवकि हकिकत ये है कि मैडम ने मेरे इन दोंनों सीनियर्स को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद इन लोगों से कभी फोन पर भी सही से बात नहीं की। ये बाते हमें शहजाद से ही पता चला करती थी। वहीं सुबह हमें सारी बाते बताया करता था। हालांकि इसका आज मेरे पास कोई सबूत नहीं है लेकिन ये सच है कि शहजाद हमें पल पल की खबर दिया करता था और वही हमें बताया करता था कि आज क्या हुआ कल क्या होगा। हालांकि वह तो इसलिये बताया करता था कि इसमें उसे लगता था कि ये मेरी शान है। वह इसलिये भी हमें बताया करता था कि हमें हमेशा ये याद रहे कि उससे पंगा लेने वाले का वह क्या हाल करवा सकता है। क्योंकि जिस तरह से वह मित्तल और दुष्यंत जी की बात किया करता था उससे तो यही लगता था कि मैडम फोन पर ही दोनों की ठीक तरह से क्लास ले ही लिया करती होंगी। खैर हर व्यक्ति की सोच अलग होती है स्वाद अलग होता है और पसंद अलग होती है। मैडम को शहजाद जैसे लोग चाहिए तो वह उन्हें मिल ही रहें हैं और आज तक वह काम भी कर रहें हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि हम जैसे युवा लोग जो अपने भविष्य को इन संस्थानों में खोजते हैं। उन्हें क्या ऐसे संस्थानों के बारे में और वहां के काम करने वालों के बारे में पूरी जानकारी हासिल नही कर लेनी चाहिए। मेरा ये मानना है कि कोई भी युवा पत्रकार खासकर के आजका पत्रकार इतना बेवकूफ तो हरगिज नही हो सकता जो पहले ऐसे संस्थानों के बारे में पता नहीं करना चाहेगा। अब एक दो लोग जो गांव देहात से आकार यहां शहर में किसी भी तरह से स्थापित हो जाना चाहते हैं उनके लिए पहला कोई भी अवसर अपने आप में बड़ा ही होता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि से आया साधारण युवक था और इंटर्नशिप के साथ जो भी मिल गया कबूल कर लिया। खैर मेरा मकसद केवल नये लोगों को ऐसे संस्थानों और वहां काम करने वाले लोगों से आगाह करवाने का है, इसके बाद भी मर्जी युवा लोगों की है कि वह मेरी बात माने या माने। आखिर मैं किसी के भविष्य का फैसला करने वाला होता कौन हूं। तो चलिये अब हम आपको बताते हैं कि आंखों देखी में जाने से पहले आपको क्या करना होगा और आंखों देखी जब आप जायेगे तो पहल पहल आपको क्या दिखाई देगा। दो हैली रोड़ पर मैडम ने अपना प्रोडक्शन हाउस लगाया हुआ है। हालांकि सरकारी फरमान के मुताबिक किसी भी ऐसी दो हैली रोड़ जैसी रिहायशी इलाके में बिजनेस कार्य करना अनैतिक है। लेकिन मैडम को कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि सरकार का आदमी और सरकार दोनों उनके कंट्रोल में रहती ही है। इसका अर्थ ये भी हो सकता है कि मैडम की सरकार में आज भी इतनी चलती है जितनी की एनडीए के कार्यकाल में चला करती थी। आज भी आंखों देखी दूरदर्शन पर ठीक उसी तरह से टीका हुआ है जिस तरह से संसद में महिला आरक्षण बिल, जो हर बार पास होने की कगार तक तो पहुंचता है लेकिन पास नहीं होता, ठीक बैसे ही आंखों देखी को दूरदर्शन टाटा तो कहना चाहता है लेकिन कह नही पाता। कहे भी तो कैसे मैडम का रौब और नाम से दूरदर्शन में आधे से ज्यादा अफसरों की हवा गायब रहती है। खैर कुछ भी हो आंखों देखी चल रहा है और दनदना कर चल रहा है। वहां लोग काम भी कर रहें हैं और पत्रकारिता भी सीख रहें हैं। तो भाईयों जब आप दो हैली रोड़ में कदम रखेंगे तो आपको एक पुराने से घर के आंगन में एक बूढ़ा आदमी सफेद जंधी और पयजामा पहने लकडी की कुर्सी पर बैठा मिलेगा। यह आदमी अक्सर अखबार पढ़ता या उंधता सा मिलता है कभी - कभार वह आपकी तरफ मात्र देखेगा कहेगा कुछ नही। वह आपको ऐसे देखेगा जैसे एक शिकारी किसी शिकार को जाल में आता हुआ देखता है। लेकिन उसका मकसद आपका शिकार करना नहीं होगा वह आपको देखकर कभी मुस्कुरा भी सकता है और कभी आपको अनदेखा भी कर सकता है। यह आप पर निर्भर करता है कि आपकी पर्सनल्टी कैसी है। ये सज्जन मैडम के पति है। इनका आंखों देखी और मैडम के किसी भी कार्य जो आंखों देखी से जुड़ा है किसी भी तरह से कोई लेना देना नही है। इसके बाद आपको गेट के भीतर मैडम का ड्राइवर तंबाकू खाता मिल जायेगा और एक दो बेकार के लोग भी यहां देखने को मिल सकते हैं जो केवल यहां अपने किसी परिचित से मिलने आये होते हैं। इसके बाद आप सामने एक शीशे का पुराना दरवाजा दिखेंगे जो बहुत सी जगह से टूटा हुआ होगा और इसे खोलते ही आपको एक भंयकर आवाज ------कीर्र कीर्र कीर्र सुनाई देगी जो आपके दांत यहां कदम रखते ही खट्टे करने के लिए काफी होगी। इसके बाद आपके घुसते ही उल्टे हाथ पर एक टेबल दिखाई देगी जो आपको आदिकाल की याद दिला देगी। इस टेबल पर आपको एक लाल और एक ब्राउन रंग का एमटीएनएल का फोन दिखाई देगा। यहीं पर कोई रिपोर्टर आपको अपनी स्टोरी लाइन अप करता भी दिखाई दे सकता है। यहां पर आपसे पूछा जायेगा कि आपको किससे मिलना है। यहीं से आपको ठीक सामने एक काला अधेड़ आदमी दिखाई देगा जो गंजा और एक थका थका सा दिखाई देगा। इसके मुंह के दोनों कोने से झाग निकलता रहता है और इसका पेट थोड़ा सा निकला हुआ होगा। ये आदमी आपको एक नजर में बीमार दिखाई देगा। इस आदमी का नाम नईम अख्तर है जो पिछले 15 - 16 साल से यही पाये जाते हैं। ये हर आने जाने वाले को बड़े ही ध्यान से देखते हैं। इनके पीछे कुछ नये लोग होते हैं जो बेकार की बातों में व्यस्त होते हैं क्योंकि यहां दोपहर एक बजे से पहले कोई काम ही नहीं होता। वह इधर -उधर की बाते करते हैं और उनके पीछे के एक कोने में आपको छत से कुछ ही नीचे लटकता हुआ एक ऐसा AC दिखाई देगा जो कभी नहीं चलता और ठीक उसी के नीचे आपको रद्दी का ढ़ेर दिखाई देगा। ये दफ्तर का एक हिस्सा है। यूं तो सारा ऑफिस ही बहुत शानदार है जिसमें से लगातार मछर मार दवा की बदबू आती रहती है। इसी के बीच मे आपको एक आदम काल का कम्प्यूटर दिख जायेगा जिसपर चार पांच लोग काम करते दिखेंगे। ये आपस में इसी बात पर लड़ते रहते हैं कि आज इस कम्प्यूटर का की-बोर्ड कौन प्रैस करेगा। इसपर काम शाम के समय बढ़ जाता है जब मैडम को तीन मिनट की आंखों देखी को दो मिनट मे निपटाना होता है। इसपर स्टोरी फाइनल होती है और मैडम के हाथों द्वारा लिखा गया एंकर बड़े मोटे शब्दों मे लिखा जाता है ताकि मैडम की आंखों को और उनकी आंखों पर लगे कंटेक्ट लैंस को ज्यादा मेहनत करनी पड़े। इसके बाद आपको शहजाद साहब मिलेंगे जो साथ वाले मैडम के कमरे के साथ बने एक और कमरे में रहते हैं। रहने से मेरा मतलब ये भी है कि वह अक्सर वही मिलते हैं। इन्हें देखकर आपको किसी ऐसे 70 के दशक के हीरों की याद जायेगी जो पैदा तो पचास मे हुआ था लेकिन वह 2008 तक बूढ़ा नहीं होने की कसम खाये पर्दे पर लगातार 18 साल की हीरोइन का हीरो बनकर आने पर उतारू हो। लंबे - लंबे काले किये हुए बाल, चेहरे में घंसी हुई छोटी - छोटी आंखें और गंदे से ऊंचे दांत वाला ये आदमी जैसे ही आपके सामने आयेगा पहले तो आपको इसके कपड़ो से एक डीयों की खुशबू आयेगी लेकिन जैसे ही आप इसके निकट जायेगे आपको समझ में जायेगा कि इसने अपने शरीर और कपड़ो पर डीयो क्यों लगाया हुआ है। इसका मुंह आपको सुबह-सुबह रात खाये किसी पार्टी के बदबूदार चिकन की याद दिला देगी जो सुबह तक शहजाद के जबड़ो में फंसा रहता है और रात को जब तक उस पुराने मुर्गें की जगह नया नही ले लेता वह पुराने का साथ नहीं छोड़ता। ये आपसे प्यार से बात करेगा क्योंकि वह जानता है कि आप ही वह फ्री का मुर्गा हैं जिसे वह अगले तीन चार महीने तक अराम - अराम से काटेगा और अपनी पसंद का काम करवायेगा। आपको लगेगा आपका उद्धार हो गया। आपको काम मिल गया। आप इसके बाद यहां पानी पीने की इच्छा जाहिर करेंगे तो आपको यहां रखी कुछ पुरानी बोतलों से पानी दिया जायेगा, जिनका प्रयोग मैडम ने कभी अपनी प्यास बुझाने के लिए खरीदा था लेकिन इनका पानी पीने के बाद मैडम को दफ्तर याद आयी तो उन्होंने इन बोतलो को फेंकना गवारा नहीं समझा और इन्हे दफ्तर में लाकर रख दिया। अब इन खाली बोतलों का इससे बढ़कर और अच्छा क्या प्रयोग हो सकता है। इसके बाद अगर आपका दिल थोड़ा हल्का होने का कर जाये तो फिर आपको एक कोना दिखा दिया जायेगा। वहां पर मैडम का नौकर और खानश्यमा भी रहता है। वही पर आपको एक टूटा हुआ दरबाजा दिखाई देगा जो कब गिर जायेगा किसी को नहीं पता। यही वह जगह है जहां आपको हल्का होना है। इसका हाल आपको किसी ऐसे टॉयलेट की याद जरूर दिला देगा जहां आप गये तो सांस लेते हुये थे और आये रोककर थे। यहां पर आपको पब्लिक शौचालय का पूरा आनंद मिलेगा और साथ ही प्रणायम का सूख भी क्योंकि यहां आप सांस बाबा राम देव की तरह से लेंगे और छोड़ेगे। यहां मैं आपको एक बात से अवगत और करवा देना चाहूंगा कि यही वो जगह भी है जहां से आंखों देखी के स्टाफ के लिये पीने का पानी जाता है। यही पर एक अधर में लगा नल्का है जिसमें म्यूनिसिपल्टी का पानी आता है। यहीं पानी स्टाफ को पीना होता है। इस पानी को मैडम नहीं पीती हां उनकी गाड़ी इस पानी से जरूर धुलती है। इसी पानी से पौधों और यहां काम करने वाले लोगों की सिंचाई भी की जाती है। अब जब आप यहां ही जायेगे तो चाय भी जरूर पीना चाहेंगे। चाय यहां पर बाहर से आती है। बाहर यानी दफ्तर के बाहर ही सड़क पर एक बहादुर है जो दो हैली रोड़ की दीवार के उस पार टक टकी लगाये देखता रहता है और पुरानी चाय पत्ती को उबालता रहता है कि कब आंखों देखी से कोई चाय का आर्डर आये। इस चाय का बिल दफ्तर नहीं देता आपको अपनी जेब से भरना होता है। यही पर दीवार के साथ आपको भैया जी की दुकान भी मिल जायेगी जो पान बीड़ी सिगरेट के साथ गुटखों की सप्लाई आपके लिये दफ्तर के भीतर ही कर देंगे। अगर आपके पास पैसे नहीं भी हैं तो कुछ दिन का उधार भी ये कर ही लेते हैं। तो फिलहाल की आंखों देखी में सिर्फ इतना ही