Thursday, January 20, 2011

नई बोतल में पुरानी शराब


मनोहन सिंह मंत्रिमंडल का विस्तार आखिरकार हो गया। इसमें तीन नये चेहरों को शामिल किया गया है। अधिकतर मंत्रियों के विभाग परिवर्तन किए गए हैं...लेकिन किसी भी मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाया नही गया है। साथ इस विस्तार में मिशन यूपी 2012 की झलक खूब देखने को मिली। ढेड़ साल पुरानी मनमोहन सरकार के मंत्रिमंडल में पहला फेरबदल बुधवार शाम को किया गया। इसमें एक स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री और दो राज्यमंत्रियों समेत कुल तीन नए चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल किए गए। जबकि तीन राज्यमंत्रियों को प्रमोट करके कैबिन मंत्री का दर्जा दिया गया है। इसके अलावा कई मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया गया है। इस मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए सरकार ने नई बोतल में पुरानी शराब डाल दी है। और साथ ही उत्तर प्रदेश में 2012 में होनें वाले विधान सभा चुनाव पर निशाना साधते हुए यूपी से बेनी प्रसाद वर्मा को मंत्रिमंडल में जगह दे दी है। सलमान खुर्शीद और श्री प्रकाश जयसवाल का प्रमोशन भी दिया गया ताकि अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग के वोटर को रिझाया जा सके। वहीं कैबिनेट में बदलाव के साथ मनमोहन ने एक बार फिर महंगाई पर काबू पाने की बात कही....और एक बार फिर आश्वासन का झुनझुना पकड़ा कर जोर का झटका धीरे से देते हुए कहा कि...वो कोई ज्योतिषी नहीं हैं जो महंगाई कब तक रूकेगी इसका ठीक समय बता दें। इसके अलावा कैबिनेट विस्तार से आम जनता को उम्मीद थी कि कैबिनेट से दागी मंत्रियों का पत्ता साफ हो जायेगा....लेकिन शहरी विकास मंत्री एस. जयपाल रेड्डी को पेट्रोलियम मंत्रालय सौंपा गया। वहीं खेलमंत्री रहे एम.एस. गिल को भी सांख्यिकी एवं क्रियान्वयन मंत्रालय सौंपकर मंत्रिमंडल में बरकार रखा गया...परफोर्मेंस और पारदर्शिता की बात करने वाली सरकार ने अपने कई और दागी और नाकाम मंत्रियों को मंत्रिमंडल में बनाए रखा है...सरकार का ये भी कहना है कि बजट के बाद मंत्रीमडंल में फिर से बदलाव किए जायेंगे। बहरहाल, मनमोहन सरकार में हुए पहले फेरबदल से देश की जनता को खासी उम्मीद थी जिसपर सरकार खरी उतरती तो बेशक नजर नहीं आयी।

Wednesday, January 19, 2011

मासूमों के नाम पर कमाई


दिल्ली सरकार ने सभी नीजि स्कूलों को ये आदेश दिए हैं कि वो अपने स्कूलों में 25 फीसद सीटों पर कमजोर वर्ग के बच्चों को दाखिला दें। लेकिन इस मामले में दिल्ली के सभी बड़े स्कूल नाक भौ सिकोड़ रहे हैं। स्कूलों का कहना है कि इस तरह से उनके स्कूल का बजट खराब हो जायेगा जिसका भुगतान शेष 75 फीसद बच्चों को बढ़ी हुई फीस चुका कर पूरा करना होगा। यानी स्कूल अपने बजट से गरीब बच्चों को नहीं पढ़ायेगा। स्कूल अपनी कमाई को किसी हाल में कम नहीं होने देगा।

यानी नीजि स्कूल किसी भी हालत में देश गरीबों को शिक्षा नहीं देंगे। वहीं अगर स्कूलों के कारनामों और घोटालों पर नजर डाली जाये तो दिल्ली के अधिकतर नीजि स्कूलों ने सरकार से बाजार से आधी से कम कीमत पर स्कूल चलाने के लिए जमीन ली है... जमीन के अलावा स्कूल टैक्स में रियायत लेते हैं। गरीबों के नाम से हर साल नीजि स्कूल लाखों रुपये की डोनेशन और फंड खा जाते हैं अलग से।

मामला यहीं रुकता तो भी ठीक था....दिल्ली के कई नामी स्कूल हर साल गरीबों के नाम से स्पेशल क्लास देने के नाम से फंड खा रहे हैं....इसमें दिल्ली का डॉन बॉस्को स्कूल और कालका पब्लिक स्कूल जैसे नामी नाम हैं। ये दोनों स्कूल गरीब बच्चों को एक्सट्रा क्लास देते हैं और वोकेशनल कोर्सस के नाम से अलग से क्लास चलाते हैं...लेकिन ये क्लासेस महज कागजी कार्यवाही है। यहां डॉनबॉस्को में गरीबों के लिए क्लास के नाम पर खैरात बांटने का काम चलता है। शाम को स्कूल बंद होने के बाद पांच से सात बजे तक गरीब बच्चों को यहां पढ़ाया जाता है वो भी स्कूल में बने प्रगाढ़ के खुले हाल में...जहां से बच्चों को न तो स्कूल में जाने की इज्जात होती है औऱ न ही क्लास में दाखिल होने की...यहीं पर बिछे मैट पर ये बच्चे पढ़ते हैं... और स्कूल दिल्ली सरकार से गरीब बच्चों के लिए मोटा फंड लेता है...कागजों में दिखाया जाता है कि उसने इन बच्चों को साधारण स्कूल के बच्चों के साथ ही पढ़ाया है औऱ उन्ही के साथ शिक्षा दीक्षा दे रहा है। ठीक इसी तरह से कालका पब्लिक स्कूल का भी हाल है। ये स्कूल गरीब बच्चों के लिए क्लास चलाते हैं...लेकिन क्लास कहां औऱ किस समय चलती हैं...ये या तो स्कूल के मैनेंजमेंट को पता है या फिर दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग को...इसके अलावा इन कक्षाओं के किसी को जानकारी नहीं है।

Thursday, January 13, 2011

दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ


सेठ मुझे क्या तुमने बदमाश समझा हुआ है जो दस 20 लाख रुपये का रिश्वत लेगा....लेकिन में तुम्हारा दिल नहीं तोड़ेगा....एक काम करो ....वो जो बिल्डिंग तुम बना रहे हो उसमें से ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट मेरी बीबी के नाम कर दो...लेकिन इंस्पेक्टर साहब वो तो ढेड़ करोड़ रुपये का है...अबे तो क्या हुआ क्या तेरी जान से ज्यादा कीमती है। ये डायलॉग फिल्म वांटेड का है जिसमें संजय मांजेरकर एक पुलिसवाले का किरदार निभा रहे हैं और एक बिल्डर की शिकायत पर बदमाशों को इनकाउंटर करते हैं....जिसके बदले में वो बिल्डर से ये डिमांड रखते हैं। ये फिल्म की बात है लेकिन असल जिंदगी में भी पुलिस का चेहरा ठीक ऐसा ही है। दिल्ली पुलिस देश के सबसे तेज तर्रार और आधुनिक पुलिस मानी जाती है। लेकिन हाल ही में दिल्ली पुलिस के कमीश्नर वी के गुप्ता ने कहा है कि दिल्ली को सुधारने में अभी तीन साल का समय लगेगा। यानी तीन साल में दिल्ली में यूं ही कत्ले आम और मारकाट मची रहेगी। लोगों को सरेआम बदमाश लूट लेंगे और दिल्ली पुलिस तीन साल तक दिल्ली में सुधार करने के तरीकों पर विचार करती रहेगी।

ये कैसा बयान है और इस बयान के माध्यम से कमीश्नर साहब क्या कहना चाहते हैं। हालांकि ये बात ठीक है कि दिल्ली में लगातार भीड़ बढ़ रही है और यहां की कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए दिल्ली पुलिस को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन दिल्ली में पुलिस की तैनाती और कार्यकुशलता की अगर बात की जाये तो दिल्ली पुलिस देश की सबसे हाईटेक और भरोसेमंद पुलिस मानी जाती है। इसके पास वो सभी नयी तकनीक है जो आधुनिक पुलिस के पास होनी चाहिए। लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस बदमाशों के पीछे लकीर पिटती नजर आती है। इसका पहला कारण ये भी है कि दिल्ली पुलिस में कई सालों से सिपाहियों को नई तकनीकों की ट्रेनिग नहीं दी गयी है। वहीं दिल्ली पुलिस अभी भी पुराने ढर्रे पर चलकर बदमाशों को पकड़ने के लिए मुखबिरों पर ही आश्रित है। हालांकि मुखबिर हमेशा से ही एक अच्छा सोर्स ऑफ इंफोर्मेशन रहे हैं...लेकिन यहां दिल्ली पुलिस की हाईटेक तकनीक पर अगर गौर डाले तो दिल्ली पुलिस के पास लोकल एरिया पर चौंकसी ना के बराबर है। पुलिस का लोकल नेटवर्क कमजोर है। लोकल स्तर पर पुलिस केवल हफ्ता और महीने की पत्ती पर ही जोर देती है। किस थाने से कितना आ रहा है इसका पूरा ब्यौरा सिपाही थानेदार और फिर थानेदार अपने से ऊपर और ऊपर से और ऊपर तक पहुंचाता है। थानों की नीलामी होती है और हर थाने से महीना फिक्स्ड होता है। अगर आपको यकीन नहीं है तो दिल्ली पुलिस के सिपाहियों और उनके अफसरों के घर जाकर देखिए... आपको यकीन हो जायेगा कि कम समय में तरक्की कैसे पायी जाती है। दिल्ली के किसी भी सिपाही के पास कम से कम एक करोड़ रुपये की संपत्ति है। ये सिपाहियों की संपत्ति है....अगर ठीक इसी तरह से अगर अफसरों की कमाई का ब्यौरा मांगा जाये तो साधारण आदमी के होश फाख्ता हो जाएंगे। दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों की आजतक किसी ने आय का ब्यौरा नहीं मांगा न ही अफसरों की कमाई की जांच की गई। हां इक्का दुक्का अफसर जरूर छोटे मोटे घपले में आता रहा जिसे यूं ही रफा दफा कर दिया गया।

Saturday, December 18, 2010

‘सेवा एवं समर्पण के 125 वर्ष’


कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भले ही अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी के तारीफ में दिन रात कसीदे पढ़ते न थकते हों...और उनकी मौजूदगी को...पार्टी की परंपरा का मजबूत आधार मानते हों...लेकिन असल कहानी कुछ और ही है...आप ये बात सुनकर थोड़ा हैरान जरूर होंगे...लेकिन ये हकीकत है। हम आपको बताते हैं कि सोनिया की अध्यक्षता में कांग्रेस क्या वाकई परंपरा को निभा पा रही है। कांग्रेस में ये परंपरा रही है कि पार्टी के ब्लाक स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन दो साल में एक बार हो...लेकिन सोनिया गांधी ने जब से पार्टी की कमान संभाली...ये अधिवेशन तीन साल में एक बार होना तय हुआ...लेकिन पार्टी इस परंपरा को कायम नहीं रख पाई...और पहली बार ऐसा हो रहा है कि...कांग्रेस का महाअधिवेश जो दिल्ली में चल रहा है....पांच साल बाद आयोजित किया जा रहा है। यही नहीं, पहली बार ऐसा होगा जब कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित इस महाअधिवेश में पार्टी कार्यकर्ता ही अपनी ही पार्टी के बडे़ नेताओं से नहीं मिलेंगे। कांग्रेस महाधिवेशन की परंपरा रही है कि, पार्टी के बड़े नेता महाअधिवेश स्थल पर बडे़ मुद्दों की चर्चा पार्टी कार्यकर्ताओं से पहले सत्र में करें। लेकिन ये पहली बार होगा....जब बड़े नेता किसी भी कार्यकर्ता से बात नहीं करेंगे...यही नहीं सोनियां गांधी के अध्यक्ष रहते कांग्रेस की एक और परंपरा खत्म हो गई है...पीसीसी, एआईसीसी, और कांग्रेस की दूसरी बड़ी मिटिंग जो साल में तीन या चार बार हुआ करती थी...लगभग समाप्त हो चुकी हैं....हलांकि एक बार फिर कांग्रेस को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने के लिए.....सोनिया गांधी महाअधिवेश में भ्रष्टाचार, महंगाई, और दूसरे बड़े मद्दों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुखातिब होंगी.....लेकिन ये बात गौर करने वाली होगी कि....क्या सोनियां गांधी असल में कांग्रेस और उसकी परंपराओं को मजबूती प्रदान कर पाएंगी...वो भी तब जब कि सरकार को कई मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को जवाब देना है।

Friday, November 26, 2010

दोस्त

कुछ तो रहा ही होगा उसके दिल में
रिश्तों में खटास यूं ही आया नहीं करती।

वक्त लगता है बीज को वृक्ष होने में
यूं ही कोई किसी को छाया दिया नहीं करता।

था वो सैंकड़ों लाखों परिंदों का घर
यूं ही कोई पेड़ काटकर किसी का घर उजाड़ा नहीं करता।

सीने में खंजर इस दुनिया में दुश्मन कहां उतारते हैं
अपने बनकर ही पीठ में खंजर अक्सर लोग उतारा करते हैं।

वो दोस्त ही था मेरा ऐसा वो अक्सर कहता था।
एक रोज उसने हाथ भी रखा था पार्थ किश्लय के सर पर
कहा था मेरी पत्नी को अपनी बहू भी खुले में....

फिर अचानक एक कहानी फिर खुद को दोहरा गई...
सुना थी जो बचपन में अपने पिता से मैंने कई बार

पिता जी कहते थे दो दोस्ती थी राजा और रंक के बीच
बड़ी अजीज

रहते न था एक दूसरे के बगैर

फिर एक दिन एक शैतान ने तोड़ी उनकी दोस्ती

फुसफुसाकर कान में गरीब के कुछ कहने का बहाना किया
अमीर देखता रहा.. पास आया और गरीब को उल्हाना दिया।
गरीब चाह कर भी सफाई में कुछ न कह पाया
अमीर का पारा आसमान पर चढ़ा
और दोस्ती जमीन पर निढाल पड़ी रह गई।

Monday, October 4, 2010

राम हो गये लीगल


अयोध्या पर आये फैसले के बाद भले ही देश के दो समुदाय सुप्रीम कोर्ट जाने का मन बना रहे हो, लेकिन भगवान राम को एक बात का आराम अवश्य ही हो गया होगा। और वो ये है कि अब राम लीगल हो गए हैं। यानी ये तो कम से कम तय हुआ कि अयोध्या में ही राम का जन्म हुआ था। चाहे वह आस्था के नाम पर हुआ या फिर किसी और आधार पर, लेकिन राम को अब ये आराम है कि वह इस देश में एक टुकड़े के कानूनी रूप से मालिक हो गए हैं। वैसे तो राम सभी के हैं और उनका निवास हर उस आदमी के दिल में है जो उनका स्मरण करता है। राम को किसी जमीन की भी आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पिछले पांच सौ सालों से राम का जिस तरह से हिंदुओं के दिल से अस्तित्व मिटाने का कार्य हुआ उसके चलते ये आवश्यक हो चला था कि राम को जमीन मिले। दुनिया भर के कुछ बुद्धिजीवी लगातार इस बात की फिराक में थे कि वह राम का अस्तित्व मिटा दें। वह लगातार तर्क दे रहे थे कि राम मात्र एक कथा है राम एक सोच है। और इससे ज्यादा कुछ नहीं। यहां तक की राम को बदनाम करने के लिए ये तक कह दिया गया कि ये किसी छोटे से राज्य या प्रदेश की कोई छोटी मोटी कथा है जिसे गढ़ दिया गया है। बावजूद इसके राम इन सभी से ऊपर राम राज्य की स्थापना और प्रेम भाईचारे का संदेश देते रहे।
शांति के पथ पर चलते हुए राम हमेशा की तरह हर तरह की बुराईयों को मात देते हुए फिर एक बार विजयी हुए। राम को अधिकार भी मिला और उन्हें मानने वालों को ये परिणाम की राम सिर्फ एक विचार ही नहीं है वह एक ऐसी विरासत है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर आगे बढ़ती रहेगी और जब तक इस दुनिया का अस्तित्व रहेगा राम भी हमारे सांसों में रहेंगे।

Monday, September 27, 2010

दिल्ली का कोढ़ रंगीन पट्टियों में बंद


एक सर्वे के मुताबिक जो 2004-05 में हुआ था उसके मुताबिक दिल्ली में 635 middle schools, 2,515 primary schools, 1,208 senior secondary schools और 504 secondary schools हैं। दिल्ली के इन स्कूलों में तकरीबन 15 लाख विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं।

इनमें प्राइवेट स्कूल शामिल नहीं हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली के सभी स्कूल बंद रहेंगे और इनमें पढ़ने वाले बच्चे पूरे 15 दिन शिक्षा से वंचित रहेंगे। यहां सवाल ये उठता है कि आखिर खेलों के दौरान स्कूल बंद करने की क्या आवश्यकता थी। स्कूलों के बच्चों का इसमें क्या कसूर था कि वह स्कूल ही न जाए। पहले खेलों के मद्देनजर बच्चों के मध्य सालाना इम्तहान पहले हो गए। जबरदस्ती बच्चों को स्लैबस दो महीने पहले ही पढ़ा दिया गया।

दूसरा सवाल ये है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिकतर गरीब घरों से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में परिवार के लोग बच्चों को सरकारी स्कूलों में इसलिए भी भेजते हैं कि उन्हें वहां एक समय का अच्छा भोजन मिलता है जिससे उनके बच्चों की शिक्षा के साथ पालन पोषण ठीक हो रहा है। कम से कम बच्चों को पढ़ाई के साथ एक समय का भोजन तो मिल ही रहा है।

अब 15 दिन इन बच्चों को न तो भोजन ही मिलेगा और न ही शिक्षा। चलो ये भी मान लिया जाए कि अगर 15 दिन भोजन नहीं भी मिला तो क्या फर्क पड़ने वाला है, लेकिन पढ़ाई अगर समय पर नहीं हुई तो उसका असर तो पड़ेगा ही। अब यहां दिल्ली सरकार ये भी कह सकती है कि हम दिल्ली के शिक्षकों को सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं लेने के लिए कहेंगे। चलो ठीक है सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं हो जाएगी लेकिन क्या उससे पढ़ाई अपने ट्रेक पर आ जाएगी।

ठीक इसी तरह से दिल्ली मजदूरों को 15 दिन तक दिल्ली में फेरी करने पर रोक होगी। इसमें रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेताओं और रेहड़ी वालों को 15 दिन घर में ही बंद रहना होगा। यानी की रोज कुंआ खोदकर पानी पीने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान या तो भूखे मरेंगे या फिर हर दिन पानी पी पीकर दिल्ली सरकार को कोसते रहेंगे। ठीक ऐसा ही दिल्ली के भीखारियों के साथ होने वाला है। दिल्ली के भीखारी 15 दिन सड़कों पर नहीं दिखाई देंगे। यानी कुल मिलाकर दिल्ली के कोढ़ सरकार रंगीन पट्टी लगाकर ढांप देना चाहती है।

Wednesday, September 22, 2010

गम ये नहीं दादी मर गई, डर ये है कि मौत घर देख गई

ये कहावत जब मैंने पहली बार अपने बॉस से एक मुद्दे पर सुनी तो सुनकर पहले तो में सन्न रह गया। कारण शायद ये था कि मेरे घर में मौत हुई थी और मैं उस मौत के गम से बाहर निकलने की कोशिश में था। लेकिन मौत घर देख गई। ये बात सुनकर मेरे एक बार को घुटने कांप गए। क्योंकि कहा जाता है मौत जब घर देख जाती है तो वापस मुढ़कर जरूर आती है।
मौत यूं तो एक सच्चाई है जिसका एक दिन सामना होना ही है। लेकिन मौत का ख्याल आते ही मन में कुछ सवाल तो उठते ही है। मरने वाला ये सोचकर खुश होता है कि चलो यार ये काम भी निपटा और जिंदा ये सोचकर खुश होता है कि चलो यार कुछ दिन औऱ। इसे खुशी कहे या गम, लेकिन ये दोनों ही दिलचस्प मामले हैं। मौत पर यूं तो इस दुनिया में जब से आदमी आया है तभी से वह कुछ न कुछ बोलता ही रहा है। किसी ने इसे अंतिम यात्रा बताया तो किसी ने इसे ही जीवन की शुरुआत कहा।
मेरे घर में मौत किसी शरीर की नहीं हुई थी, इसलिए भी शायद मैं थोड़ा ज्यादा सहम गया था। मेरे घर में मौत हुई थी मेरे अस्तित्व की, मेरे संघर्ष की और मेरे आत्मसम्मान की। मैं जिस संस्थान में कार्यरत था वहां से मुझे एक माह के लिए ये कहकर छुट्टी पर दे दी गई कि मेरी अभी दफ्तर में आवश्यकता नहीं है। लाख कोशिशें करने के बाद भी मैं इस असमायिक मौत को झेल नहीं पा रहा था। कारण चाहे कुछ भी रहा हो जिसमें ये पहला कारण हो सकता है कि मैं इस अचानक विपत्ति के लिए तैयार ही नहीं था। लेकिन विपत्ति आ गई तो मैं परेशान हो उठा। हालांकि मेरी संस्थान में वापसी भी हुई औऱ बहाली भी लेकिन मौत क्योंकि घर देख गई है तो ये सवाल मेरे मन से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर मेरे बॉस ने जिन्होंने मेरी कई आडे़ समय मदद भी की और मेरे आत्मसम्मान की रक्षा भी। उन्होंने एक बात कही कि यार मौत तय है। किसी का पहले और किसी का बाद में। नंबर सभी का आना है। आज हमारा तो कल तुम्हारी बारी है। लगी है कतार एक के बाद एक सभी की बारी है। ये सुनकर मुझे थोड़ा ढांढस तो बंधा साथ ही इस बात का अहसास भी हुआ कि आज के समय में हम हर दिन मौत से साक्षात्कार करते हैं। फर्क इतना है कभी हम जीत कर आते हैं और कभी हार कर।

सपनों के सौदागर



नोयडा एक्सटेंशन के नाम से धडल्ले से बिक रही है ग्रेटर नोयडा की जमीन। वहीं जमीन जिसपर ग्रेटर नोयडा प्राधिकरण और किसानों के बीच मामला अदालत में है। किसानों ने अभी तक इस जमीन पर प्राधिकरण को अधिकरण नहीं दिया है। वहीं दूसरी ओर प्रोपर्टी बाजार से जुड़े कारोबारी इस बात का जमकर फायदा उठा रहे हैं। वह ग्राहकों को बरगला रहे हैं और धोखे से उन्हें नोयडा एक्सटेंशन के नाम जमीन और फ्लैट बेच रहे हैं। इसका एक कारण ये भी है कि दिल्ली, गुड़गांव और बाहर के लोग जो दिल्ली के आसपास के इलाके में रहना चाहते हैं उनके लिए ग्रेटर नोयडा बेहद खुबसूरत इलाका है। प्रोपर्टी का काम करने वाले दलाल और बिल्डर इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं और उन्हें इस बात का अंदाजा भी है कि ये बेहद बढ़िया लोकेशन है जहां आकार ग्राहक फंसता ही है।
इसी बात का फायदा उठाकर यहां के दलाल ग्राहकों को फंसा रहे हैं। वह नये नये प्रोजेक्ट ग्राहकों को दिखाते हैं उन्हें मंहगी गाड़ियों में लोकेशन पर लेकर जाते हैं और उन्हें गलत तरीके से जानकारी देकर पहले एक मुश्त बयाना राशी या फिर एडवांस बुकिंग के नाम पर मोटा पैसा ऐठते हैं। एक बार ग्राहक जब इनकी पहुंच में जाता है तो उसे निर्माण के लिए समय देते हैं। ये ग्राहकों से कहते हैं कि प्रोजेक्ट की कीमत एक हजार करोड़ रुपये हैं या छोटे दलाल कहते हैं कि प्रोजेक्ट की कीमत सौ करोड़ रुपये है। जैसे ही प्रोजेक्ट की कीमत हम बाजार से उठा लेंगे हम प्रोजेक्ट पर काम करना आरंभ कर देंगे। ये बहाना एक ऐसा बहाना है जिसका ओर है छोर है। क्योंकि ग्राहक कभी इस बात का अंदाजा ही नहीं लगा पाता कि उसके प्रोजेक्टर को कितना पैसा मिल गया है। ऐसे में ग्राहक अपने आपको ठगा से महसूस करता है और जब वह अपना पैसा वापस लेने की बात करता है तो या तो प्रोजेक्टर के ऑफिस पर ताला पाता है या फिर उसके फोन की घंटी तो बजती है लेकिन फिर कभी फोन उठता नहीं है।

Saturday, September 18, 2010

एक कलाकार का अंतिम युद्ध


देश के लिए कला के क्षेत्र में एक कैनवास देने वाला शख्स आज देश से बाहर महाभारत को चित्रों के माध्यम से कैनवास पर उतारने में व्यस्त है।
फिदा और फिदा का कैनवास इस बात पर कभी नहीं झगड़ते कि कैनवास पर उतर कर कौन आ रहा है। कलाकार के मन ने कहा कि चलो ये किया जाए और कलाकार अपनी कूची ब्रश के साथ कैनवास की शान में लकीरे खीचना आरंभ कर देता है।
एम एफ हुसैन को ये अंदाजा है कि महाभारत के कुछ किरदारों पर उनकी भर्त्सना हो सकती है। इसका कारण शायद ये भी हो कि एक कलाकार जब इतिहास के ब्रश से कैनवास पर उतारता है तो वह दिल और दिमाग से किरदार के साथ होता है। वह उस किरदार के साथ जीता है और मरता है। गजगमीनी हो या फिर फिदा के घोड़े। वह आजाद विचरण करते हैं। लेकिन कुछ कला को नहीं समझने वालों को इस बात से परेशानी हो सकती है कि भला किसी किरदार में कलाकार कैसे सांस ले सकता है।
एम एफ हुसैन जब देश में थे तो लोगों को उनके होने या नहीं होने का मतलब मालूम नहीं था। देश के कुछ प्रगतिशील विचारकों को अचानक ही हुसैन की याद तब आयी जब हुसैन को देश में एक पहचान मिलनी आरंभ हुई। उनके द्वारा बनाई गई होली की पेंटिग अनूठी थी। लोगों को इस बात का शायद ही अंदाजा था कि बगैर ब्रश के लिए कैनवास पर रंगों को और प्राकृतिक रूप से पैदा हुई भावनाओं को उकेरा जा सकता है। वह होली के दिन रिक्शे पर सवार हुए और देश के गलियों में धूमने लगे। जिस किसी ने भी उनपर रंग डाला उन्होंने कैनवास को आगे कर दिया। और फिर कैनवास पर वह उतरा जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनकी इस अनूठी कोशिश से कला जगत में हड़कंप मंच गया। मचता भी क्यों नहीं, क्योंकि फिदा एक नए आइडिया के साथ आये थे। लेकिन हिंदु देवी देवताओं के साथ उनका प्रयोग उनको भारी पड़ गया। उन्हें देश के बाहर भी जाना पड़ा और देश के लोगों की भर्त्सना भी सहन करनी पड़ी। इस बार फिर फिदा हिंदुओं की भावनाओं से खेलने की कोशिश में है। इस बार वह कैनवास पर महाभारत उकेर रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा अगर कैनवास पर उन्होंने किरदारों के साथ न्याय नहीं किया तो ये महाभारत अंतिम युद्ध होगा।