Saturday, June 19, 2010

कब आएंगे मेरे द्वापर के कृष्ण

एक दोस्त था मेरा कहता था सुख दुख का साथी हूं मैं तेरा

रहता था कृष्ण की तरह वह भी द्वाराका में एक राजा की तरह

थे उसके भी कई द्वारपाल और सिपहेसलार।

रहता था हमेशा एक नशे में वो

कहता सभी को था वो चोर

सुनता नहीं जो उसकी बात था

उसके लिए वहीं सबसे बड़ा गुनहगार था।

एक दिन अचानक मैं ये सोचकर उसके दरवाजे चला गया

कि है अगर वो कृष्ण तो मैं भी सुदामा हूं।

रखेगा वो मेरी उस भूल को ठोकर पर

जिसके लिए मैं कई जन्मों से शर्मसार हूं।

द्वार पहुंचा सुदामा... हुआ आदार सत्कार

भूल गया सुदामा अपने गुनाह।

कृष्ण ने सुदामा को पहले लगाया गले

और कुछ याद आते ही

शिशुपाल सा गरजा वो

देता रहा गालिया किया 100 का भी आंकड़ा पार

सुनता रहा सुदामा और मुस्कुराता रहा

रोता रहा मन ही मन और कोसता रहा

अपने आप को, अपने भाग्य को

कि क्यों भूल गया वो कि अभी नहीं आये हैं द्वापर के कृष्ण

जो सुदामा की भूल को भूल जाते और लगा लेते गले

दोस्ती निभाते, मेरे दुखों को हरते और मेरा जहर अपने प्यार से धो डालते।

लौटा सुदामा फिर अपनी कुटियां में

टकटकी लगा देखता रहा अपने भूखे नंगे बच्चों को कई घंटे

और सोचता रहा कि कब आयेंगे मेरे द्वापर के कृष्ण... कब आएंगे मेरे द्वापर के कृष्ण।

Thursday, June 17, 2010

‘दूसरों को शिक्षा दे और अपनी खाट भीतरी ले’




फेसबुक पर एक So Called पत्रकार द्वारा अपने पेज पर एक पार्टी के कुछ फोटोज ने अचानक ही मुझे झकझोर दिया। इस फोटो में देश के कुछ नामी पत्रकार हाथ में दारू के गिलास लिए किसी बात पर ठहका लगा रहे हैं। पहले मुझे लगा कि शायद ये मेरी आंखों को धोखा है क्योंकि इनमें से कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं जो अपने आपको इस देश का नहीं दुनिया में सबसे ईमानदार आदमी कहते हैं।

ये टेलिविजन स्क्रीन पर अपने आपको देश का ऐसा नागरिक दिखाते है जो रिस्पॉनसेविल के साथ-साथ ऐसा व्यक्ति है जिसका काम ही देश की सेवा करना है। लेकिन जैसा हर बार होता है हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। एक वो जो दिखाई देता है और एक वो जो हमें दिखाई नहीं देता। असल में साधारण लोगों को शायद पता नहीं होगा कि देश के अधिकतर पत्रकार नंबर एक के दारूबाज और लड़की बाज होते हैं।

देश के अधिकतर बड़े पत्रकारों के लड़कीबाजी के किस्से आए दिन हम लोग डिस्कस करते हैं। अपनी पहली बीबीयों से ये कई बार मार खा चुके हैं और दूसरी के चक्कर में आकार जपानी तेल और मद्रासी जैल टाइप दवाओं पर अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर चुके होते हैं। इस बात पर हमारे देश के कुछ पत्रकार भाईयों की आंख भौह टेढ़ी हो सकती हैं, लेकिन असलियत यही है। यहां अगर मैं अपने भाईयों की पोल खोलने लग जाऊं तो हो सकता है कि मेरा ब्लॉग तक ये लोग बंद करवा दे लेकिन जब बात चली है तो दूर तक तो जानी ही चाहिए। हालांकि कुछ भाई ये भी कह सकते हैं कि ये इनका प्राइवेट मामला है। अरे भाई इन सालों का ये प्राइवेट मामला है और जो ये.......देश के नेताओं को लेकर स्क्रीन पर आकार पूरे दिन भौंकते हैं तो वो क्या होता है। इनका ये कैसे नीजि मामला हो सकता है। इनका सरोकार देश से जुडा़ है। ये लोग देश के चौथे स्तंभ हैं। इनका कोई भी मामला देश की आम जनता को प्रभावित करता है। लेकिन ये लोग कभी अपने गिरेवान में नहीं झांकने वाले। मुझे इस बात की इनसे शिकायत नहीं है कि ये लोग दारू पीकर क्यों अपना गला तर कर रहे हैं, मुझे कोफ्त होती ये देखकर कि ये वही लोग है जो दूसरों को सीख देते हैं। एक कहावत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत प्रचलित है। शायद यहां कुछ बड़े बिहारी पत्रकारों को ये समझ में न आए लेकिन अगर वो हिंदी जानते हैं तो मतलब तो जरूर ही निकाल लेंगे।



कहावत है दूसरों को शिक्षा दे और अपनी खाट भीतरी ले

Wednesday, June 9, 2010

जमीर बेच कर हासिल की है दो गज जमीन

दो प्रोपर्टी डीलर कब्रिस्तान के पास आपस में बात कर रहे थे।
एक बोला दूसरे से यार हम से तो ये मुर्दें भले हैं
कम से कम ढाई बाई छह के प्लाट में तो पड़े हैं।

हम दूसरो को प्लॉट मकान दिलवाते हैं
और खुद किराए के मकान में रहते हैं।

इतने में ही एक जलजला उठा
और एक कब्र में से एक मुर्दा उठा

मुर्दा देखकर पहले डीलर घबरा गए
और फिर सहमकर बोले हम से क्या कोई गलती हो गयी
जो आप इतने खफा हो गए
अपना आराम और प्लॉट छोड़कर हमारे पास आ गए
मुर्दा पहले मुस्कुराया और सर पर हाथ रखकर
गंभीर होकर बोला
यार तुम इतना क्यों घबरा रहे हो
मैं तो सफाई देने आया हूं
तुम जिसे मेरा प्लॉट समझ रहे हो
और मुझे बड़ा ही भाग्यवान के रूप में देख रहे हो
असल में ये प्लॉट तो मैंने अपना जमीर देकर कमाया है
प्लॉट पाने के लिए पहले अपनों को धोखा दिया
और फिर खुद धोखा खाया है।
वो तो भला हो उस आंतकबादी का
जिसने मुझे गोलियों से भून दिया
और सरकार ने शहीद के रूप में मेरे परिवार को मुआवजा दे दिया
नहीं तो मेरे बच्चें तो मेरी पेंशन पहले ही खा गए थे
बचा तो घर वो बांट चूके थे।
मैंने मरने से पहले अपना जमीर बेच दिया
अंतिम सांस लेने से पहले खुद का फकीर कह दिया।

Monday, May 31, 2010

क्यों बदले रिश्ते ?


अब तक मैं सोचता था खून ही खून के काम आता है।
सुनी थी एक कहानी
अपना मारे छांव में डाले

लेकिन बदलते जीवन के परिवेश और रिश्तों के समीकरणों ने
ढाह दी है हर दीवार उस सोच की, जो मिली थी विरासत में।

क्या हुआ कैसे हुआ पता नहीं,
बदल गया सब कुछ
बचपन की कहानी
बचपन के रिश्ते।
अब बहन राखी पर मेरी कलाई पर कलावा नहीं बांधती।
न ही भैया दूज पर तिलक ही करती।
पिता भी दशहरे पर जलेवी नहीं लाते।
मां तो कभी की रूठ चुकी थी।
है उसे शिकायत की मैं अब उसका बेटा नहीं रहा।
कहती है मैं अब किसी का पति हूं, बाप हूं।
भाई भी नहीं मिलता मुझे अब कभी।
सुना है रहता है वह भी इसी शहर के किसी फ्लैट में।

मुझे याद नहीं, मैंने अंतिम बार कब देखा था अपनी मां के जन्में उस भाई को जो रहता रहता था मेरे ही साथ मेरा साया बनकर।
कैसे अलग हो गया वह
मैंने तो बस यही कहा था उसे कि घर बड़ा हो गया है उसने फिर क्या सोचकर घर ही ढाह दिया।
कहता था नया घर बनाएंगे।
लेकिन जमीन और जमीर का सौदा कर वह इस शहर में कही खो गया।
मैं रोज उसे खोजता हूं लंबी काली सड़कों पर लेकिन नहीं दिखता वो मुझे इस भीड़ में।

Friday, May 28, 2010

नक्सलियों का कहर


गुरुवार देर रात नक्सलियों ने ट्रेन पर हमला कर करीब 65 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले में 200 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं। बम धमाका कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस की पटरी पर किया गया, जिससे इंजन समेत 12 डिब्बे पटरी से उतर गए। आइए जानते हैं नक्सलियों ने कब और कहां किस तरह हमले को अंजाम दिया है।

तमाम अभियानों के बावजूद नक्सलियों का कहर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हावड़ा - कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस को निशाना बनाकर नक्सलियों ने सरकार को फिर से खुली चुनौती दे डाली है। इस घटना की जिम्मेदारी नक्सल समर्थक संगठन पीसीपीए ने ली है। ये कोई पहली बार नहीं हुआ है जब नक्सलियों ने ट्रेनों को अपना निशाना बनाया हो...इससे पहले भी पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में नक्सलियों ने ट्रेनों को निशाना बनाया है...आइए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के ट्रेनों पर किए गए हमलों पर.....

22 अप्रैल 2006

माओवादियों ने लातेहार में आठ घंटे तक एक यात्री ट्रेन को कब्जे में रखा।

मई 2008

माओवादियों ने लातेहार में पांच घंटे तक एक ट्रेन पर कब्जा किया।

27 अक्तूबर 2009

माओवादियों ने पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज की ओर से बुलाए गए बंद के दौरान भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को आठ घंटे तक कब्जे में रखा।

नवंबर 2009

माओवादियों ने झारखंड के सिमदेगा जिले में रेल पटरियों पर विस्फोट किया। एक यात्री ट्रेन पटरी से उतरी जिसमें दो लोगों की मौत हुई और 38 लोग जख्मी हुए।

19 मई 2010

माओवादियों ने पश्चिमी मिदनापुर जिले के झारग्राम के पास पटरियों पर बारूदी सुरंग से विस्फोट किया। एक मालगाड़ी के दो चालक जख्मी हुए और इंजन क्षतिग्रस्त हुआ।

ये वो हमले थे जिनमें ज्यादा जानमाल का नुक्सान नहीं हुआ था। लेकिन इस बार माओवादियों ने बड़े हमले को अंजाम देते हुए करीब 65 लोगों की जान ले ली। एक तरह से नक्सलियों ने सरकार के सख्त अभियान को ठेंगा दिखा दिया है। सरकार भले ही नक्सलियों से सख्ती से निपटने के दावे करे, लेकिन उनकी ताकत बढ़ती ही जा रही है। जो नक्सली कल तक आम आदमी की बेहतरी की बात करते थे अब वही नक्सली आम लोगों को ही मार रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि नक्सली अब आतंकियों का दूसरा नाम बन चुके हैं।

Tuesday, May 25, 2010

खाप और गौत्र के बीच सियासत


हरियाणा, राजस्थान वेस्टर्न यूपी की राजनीति को गोत्र और खापों से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। इन क्षेत्रों में खाप पंचायत के फैसले के विपक्ष में जाने का मतलब जान से हाथ धोना भी है। अधिकतर मामलों में खाप पंचायत समगोत्र विवाह और प्रेम विवाह जो एक ही गांव में हुआ हो के खिलाफ हैं। केन्द्र सरकार ने खाप पंचायतों को झटका देते हुए हिंदु मैरिज एक्ट में संशोधन करने से इंकार किया है। सरकार का कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट अपने आप में एक परफेक्ट एक्ट है जिसमें अभी बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है। एक साक्षात्कार में केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने मुखर हो रही खाप पंचायातों पर कहा है कि किसी भी हाल में गोत्र के आधार पर ओनर किलिंग और बर्बरतापूर्ण फैसलों को कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। अगर खाप पंचायातों के फैसलों पर नजर डाली जाये तो जब भी गाँव, जाति, गोत्र, परिवार की 'इज़्ज़त' के नाम पर होने वाली हत्याओं की बात होती है तो जाति पंचायत या खाप पंचायत का ज़िक्र बार-बार होता है । शादी के मामले में यदि खाप पंचायत को कोई आपत्ति हो तो वे युवक और युवती को अलग करने, शादी को रद्द करने, किसी परिवार का समाजाकि बहिष्कार करने या गाँव से निकाल देने और कुछ मामलों में तो युवक या युवती की हत्या तक का फ़ैसला करती है। लेकिन क्या है ये खाप पंचायत और देहात के समाज में इसका दबदबा क्यों कायम है? हमने इस विषय पर और जानकारी एकत्र कर आपके सामने प्रस्तुत की है। खाप पंचायतों का 'सम्मान' के नाम पर फ़ैसला लेने का सिलसिला कितना पुराना है? ऐसा चलन उत्तर भारत में ज़्यादा नज़र आता है. लेकिन ये कोई नई बात नहीं है. ये ख़ासे बहुत पुराने समय से चलता आया है। जैसे जैसे गाँव बसते गए वैसे-वैसे ऐसी रिवायतें बनतीं गई हैं। ये पारंपरिक पंचायतें हैं।
ये खाप पंचायतें हैं क्या? क्या इन्हें कोई आधिकारिक या प्रशासनिक स्वीकृति हासिल है? रिवायती पंचायतें कई तरह की होती हैं। खाप पंचायतें भी पारंपरिक पंचायते है जो आजकल काफ़ी उग्र नज़र आ रही हैं, लेकिन इन्हें कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है। साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं. इसी तरह दलित या तो मौजूद ही नहीं होते और यदि होते भी हैं तो वे स्वतंत्र तौर पर अपनी बात किस हद तक रख सकते हैं, ये यहां कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि खाप पंचायातें जाट और गुर्जर समूह के लोगों की होती है। युवा वर्ग को भी खाप पंचायत की बैठकों में बोलने का हक नहीं होता। कैसे होता है खाप पंचायातों का गठन एक गोत्र या फिर बिरादरी के सभी गोत्र मिलकर खाप पंचायत बनाते हैं। ये फिर पाँच गाँवों की हो सकती है या 20-25 गाँवों की भी हो सकती है. मेहम बहुत बड़ी खाप पंचायत और ऐसी और भी पंचायतें हैं। जो गोत्र जिस इलाक़े में ज़्यादा प्रभावशाली होता है, उसी का उस खाप पंचायत में ज़्यादा दबदबा होता है. कम जनसंख्या वाले गोत्र भी पंचायत में शामिल होते हैं लेकिन प्रभावशाली गोत्र की ही खाप पंचायत में चलती है. सभी गाँव निवासियों को बैठक में बुलाया जाता है, चाहे वे आएँ या न आएँ...और जो भी फ़ैसला लिया जाता है उसे सर्वसम्मति से लिया गया फ़ैसला बताया जाता है और ये सभी पर बाध्य होता है.। सबसे पहली खाप पंचायतें जाटों की थीं. विशेष तौर पर पंजाब-हरियाणा के देहाती इलाक़ों में जाटों के पास भूमि है, प्रशासन और राजनीति में इनका ख़ासा प्रभाव है, जनसंख्या भी काफ़ी ज़्यादा है। इन राज्यों में ये प्रभावशाली जाति है और इसीलिए इनका दबदबा भी है। खाप पंचायतों के लिए गए फ़ैसलों को कहाँ तक सर्वसम्मति से लिए गए फ़ैसले कहा जाए? लोकतंत्र के बाद जब सभी लोग समान हैं. इस हालात में यदि लड़का लड़की ख़ुद अपने फ़ैसले लें तो उन्हें क़ानून तौर पर अधिकार तो है लेकिन रिवायती तौर पर नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है. साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं। एक गाँव जहाँ पाँच गोत्र थे, आज वहाँ 15 या 20 गोत्र वाले लोग हैं. छोटे गाँव बड़े गाँव बन गए हैं. पुरानी पद्धति के अनुसार जातियों के बीच या गोत्रों के बीच संबंधों पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उन्हें निभाना अब मुश्किल हो गया है। जब लड़कियों की जनसंख्या पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले से ही कम है और लड़कों की संख्या ज़्यादा है, तो समाज में तनाव पैदा होना स्वभाविक है। ये आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त पंचायतें नहीं हैं बल्कि पारंपरिक पंचायत हैं, इसलिए इसलिए आधुनिक भारत में यदि किसी वर्ग को असुरक्षा की भावना महसूस हो रही है या वह अपने घटते प्रभाव को लेकर चिंतित है तो वह है खाप पंचायत...इसीलिए खाप पंचायतें संवेदनशील और भावुक मुद्दों को उठाती हैं ताकि उन्हें आम लोगों का समर्थन प्राप्त हो सके और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिलती है। पिछले कुछ वर्षों में जो किस्से सामने आए हैं वो केवल भागकर शादी करने के नहीं हैं. उनमें से अनेक मामले तो माता-पिता की रज़ामंदी के साथ शादी के भी है पर पंचायत ने गोत्र के आधार पर इन्हें नामंज़ूर कर दिया। खाप पंचायतों का रवैया तो ये है - 'छोरे तो हाथ से निकल गए, छोरियों को पकड़ कर रखो.' इसीलिए लड़कियाँ को ही परंपराओं, प्रतिष्ठा और सम्मान का बोझ ढोने का ज़रिया बना दिया गया है। ये बहुत विस्फोटक स्थिति है.
इस पूरे प्रकरण में प्रशासन और सरकार लाचार से क्यों नज़र आते हैं?
प्रशासन और सरकार में वहीं लोग बैठे हैं जो इसी समाज में पैदा और पले-बढ़े हैं. यदि वे समझते हैं कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को औरत को नियंत्रण में रखकर ही आगे बढ़ाया जा सकता है तो वे भी इन पंचायतों का विरोध नहीं करेंगे।
आधुनिकता और विकास के कई पैमाने हो सकते हैं लेकिन देहात में ये प्रगति जो आपको नज़र आ रही है, वो कई मायनों में सतही है। खतरनाक मोड़ पर खाप पंचायत पिछले कुछ समय से खाप पंचायतें सिर्फ दो वजहों से चर्चा में आई हैं। या तो किसी मुद्दे पर धरना या रास्ता जाम करने के लिए या फिर किसी प्रेमी जोड़े को सजा सुनाने के लिए। इधर वे फिर ऐसे ही कुछ कारणों से चर्चा में हैं। कुरुक्षेत्र में विभिन्न जातीय खापों ने एक स्वर में मनोज-बबली हत्याकांड के दोषियों से हमदर्दी जताते हुए अदालती फैसले की न केवल निंदा की है, बल्कि फांसी की सजा पाए लोगों का केस लड़ने के लिए हर घर से 10-10 रुपये जुटाकर हाई कोर्ट जाने का फैसला किया है। इसके अलावा उन्होंने एक ही गोत्र में शादी पर पाबंदी लगाने के लिए हिंदू मैरेज एक्ट 1955 में संशोधन करने की भी मांग की है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए हरियाणा की सभी खापें राज्य में प्रस्तावित पंचायत चुनावों के बहिष्कार का मन भी बना रही हैं। खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का प्रहरी मानने वाली ये खाप पंचायतें समानांतर न्यायिक प्रक्रिया चलाने की कोशिश में हैं। ये अनेक कानूनों, कोर्ट के फैसलों और नए रिवाजों को अपनी संस्कृति पर एक बड़ा संकट मानते हुए उनके खिलाफ लामबंद होने लगी हैं।
ऋग्वेद में उल्लेख - सबसे पहले खापों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। उस समय एक विशेष गोत्र के लोग मिलकर अपना एक चौधरी चुन लिया करते थे। एक खाप कई गांवों को मिलाकर बनती है और विभिन्न खापों को मिलाकर सर्वखाप बनती है। अब खाप के मुखिया का चयन चुनाव की बजाय वंशानुगत आधार पर होता है। यानी कि एक ही परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी खाप के मुखिया बनते हैं। जातीय खापों का उद्भव भी बहुत पुराना है। मुगलों के शासन में खापों का प्रभाव इसलिए बढ़ा क्योंकि अर्थाभाव, आवागमन के साधनों की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण गांव-समाज का हर व्यक्ति न्याय के लिए राजा के दरवाजे तक दौड़ नहीं लगा सकता था। अंग्रेजों से सहयोग
अंग्रेजी शासनकाल में भी यही व्यवस्था रही। अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने की नीति के तहत खाप मुखियाओं की पीठ पर अपना हाथ रखा। प्रथम तथा द्वितीय महायुद्ध में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से फौज में भीतर के मामलों में अधिकांश खाप मुखियाओं ने सक्रिय योगदान दिया। गांवों से अनाज तथा दूसरी वस्तुएं सौगात के रूप में अंग्रेज शासकों को मिलीं। प्रत्युत्तर में उन शासकों ने खाप और उसके मुखियाओं को जमीन-जागीरों से नवाजा। जिलों के डिप्टी कमिश्नरों के यहां और तहसीलों में अधिकांश खापों के मुखियाओं की खास खातिर होने लगी। इन संपर्कों के जरिए गांवों से स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों की सूचनाएं भी विदेशी शासन तक आसानी से पहुंचने लगीं। इस तरह ज्यादातर खाप अंग्रेजों की दास ही बनी रहीं। हालांकि कुछ ने स्वाधीनता आंदोलन में शामिल नेताओं को भी सहयोग दिया।
उस समय तक पेशावर से लेकर दिल्ली तक पंजाब था। पंजाब के क्षेत्र में मिसलों और आज के हरियाणा क्षेत्र में स्थित जातीय खापों विशेष रूप से जाट खापों ने सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। यही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में रही। यहीं से खापों ने अपने सामाजिक दायित्व के साथ अपनी राजनीतिक शक्ति को भी पहचाना। 1967 के बाद जब भारतीय चुनावों पर जातीय रंग चढ़ने लगा, राजनीतिज्ञों ने खापों की ताकत को पहचाना और पाया कि खापों के चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ाते मुखिया जो फैसला करते हैं उस पर एक नहीं बल्कि उनके अधीन 12 से लेकर 36 गांव तक अमल करते हैं। लोटे में नमक डाल कर कसम खाना बहुत बड़ी बात मानी जाने लगी। राजनेताओं ने जमकर इसका लाभ उठाना शुरू कर दिया। यहीं से खापें अपना सामाजिक दायित्व भूल कर सियासी भूमिका निभाने लगीं। राजनेताओं ने भी खाप मुखियाओं को पुरस्कृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब उन्होंने हाथ काट दो, गला रेत दो, गांव से निकाल दो, पत्नी को बहन मान लो जैसे मध्ययुगीन फैसले दिए, राजनीतिक नेतृत्व ने मौन रहना बेहतर समझा। इससे खापों का हौसला बढ़ा। इन दिनों खापों में जो हो रहा है, यह उसी का परिणाम है।
वोट की राजनीति
वोट की राजनीति के तहत खापों का खूब दोहन किया गया है। हरियाणा में सोनीपत, रोहतक, हिसार, भिवानी और जींद ऐसे जिले हैं, जहां खापों का सबसे अधिक प्रभाव है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत आदि में खापों का बहुत अधिक प्रभाव है। वेस्टर्न यूपी में जाटों की प्राचीन खाप इस इक्कीसवीं सदी में भी सामाजिक-राजनीतिक सत्ता का केंद्र बनी हुई है। इसकी मिसाल 84 गावों वाली बालियान खाप के प्रमुख महेंद्र सिंह टिकैत के रूप में देखी जा सकती है, जिन्होंने एक समय बहुत बड़ा किसान आंदोलन चलाकर सत्ता को हिलाकर रख दिया था।

हरियाणा में महम चौबीसी भी इसी तरह की प्रभावशाली खाप है। यूं तो विभिन्न जातियों की खापें हैं लेकिन मौजूदा दौर में अगर किसी ने खाप के जरिए अपनी ताकत और हैसियत का अहसास करवाने की कोशिश की है तो वह है जाट समाज। इस इलाके के सियासी स्वरूप पर नजर डालें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राजनीति में भी जाटों का ही वर्चस्व रहा है। यानी खाप और उसके पीछे खड़ा जनमानस वोट में तब्दील होकर सत्ताओं में भागीदारी करता आया है।

लेकिन इन खापों की समानांतर अदालतें और उनके मध्ययुगीन फैसले आज इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी के बल पर आगे बढ़ती दुनिया को मंजूर नहीं हैं। साफ बात है कि अगर राजनेता इन जातीय खापों को अपने वोटों की पेटी मानना छोड़ दें तो मामला पटरी पर आ सकता है। पानी सिर से निकलने को है। तत्काल कोई गंभीर कदम उठाने की जरूरत खाप पंचायातों के नाम पर सिकती राजनैतिक रोटियां मनोज बबली हत्याकांड में दोषियों को सजा होने के बाद चर्चा में आयी खाप पंचयात अब राजनीति का आखड़ा बनती जा रही है। जहां एक ओर खाप पंचायत इसे षडयंत्र मानकर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने का मन बना चुके हैं, वही अब खाप पंचायतों को लेकर हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, गुर्जर बाहुल इलाकों में इन पंचायतों को देश के विभिन्न राजनैतिक दल अपने पक्ष में करने में जुटे है। हरियाणा की राजनीति में लगभग 35 फीसद भागीदारी रखने वाले जाट वोट बैंक को अपने कब्जें में करने के लिए हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला,, कांग्रेस के नवीन जिंदल जैसे दिग्गज नेता खाप पंचायतों को अपने पक्ष में लेने और खाप पंचायतों के साथ उनके समर्थकों की सहानुभुति लेने की होड़ मची गयी है। ठीक ऐसा ही राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में हो रहा है। खाप पंचायतों को रिझाने के लिए देश की राजनैतिक पार्टियां इन्हें प्रलोभन दे रही है कि वह उनकी मांगों को पूरा करवाने में उनकी सहायता करेंगे। इस मामले पर अगर हाल के राजनेताओं के दौरों पर नजर डाली जाये तो खाप पंचायतों के हिंदू मैरिज एक्ट सहित अन्य मांगों को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन में सांसद नवीन जिंदल ने खाप पंचायतों से उनकी मांगों का ज्ञापन लिया है जिसे उन्होंने केन्द्र की सरकार व कांग्रेस हाईकमान तक पहुंचाने का वायदा किया है। उन्होंने कहा है कि खाप पंचायत की भावनाओं को आलाकामन तक पहुंचाना उनका कर्तव्य है। हालांकि अब केन्द्रीय कानून मंत्री और गृह मंत्रालय से आयी टिप्पडि़यों के बाद नवीन जिंदल अपने वायदों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं। वहीं खाप पंचायतों और उनके समर्थकों का कहना है कि कुछ भ्रमित युवक युवतियां पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरित होकर सामाजिक परंपराओं के खिलाफ जा रहे हैं। रीति रिवाजों की सुरक्षा करना हमारा धर्म है। इसके लिए पूरे हरियाणा के सभी सांसदों, विधायकों एवं अन्य राजनीतिज्ञों से भी सहयोग की अपील की जाएगी। इस मांग को पूरा करवाने के लिए गांव स्तर पर इकाइयों का गठन होगा। खाप पंचायत के समर्थकों का ये भी कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन, समगोत्र में विवाह पर प्रतिबंध, मां के गोत्र में विवाह एवं सीमा के साथ लगते गांव में विवाह प्रतिबंध लगाना चाहिए। नवीन जिंदल ने सहमति जताते हुए कहा है, वे उनकी मांगों को सरकार और हाईकमान तक पहुंचाएंगे। खापों ने जो संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया है वह प्रशंसनीय है। वह कानून के दायरे में रहकर खाप प्रतिनिधियों की हर संभव मदद करेंगे। उन्होंने खापों का आह्वान किया कि वे दहेज एवं भ्रूण हत्या के खिलाफ भी आवाज उठाएं तथा समाज का मार्गदर्शन करें। खाप प्रतिनिधियों ने राज्य के अन्य नौ सांसदों एवं दो राज्यसभा सदस्यों को 25 मई तक का अल्टीमेटम भी दिया है। जिसमें खापों ने कहा है कि अगर वह उनका समर्थन नहीं देंगे तो वह उनके खिलाफ आंदोलन छेड़ देंगे। दूसरी ओर भाजपा विधायक दल के नेता अनिल बिज ने कहा, आज नवीन जिंदल खाप पंचायतों की राजनीति में उतर आये हैं। वह पहले कहां थे ? चौटाला की राजनीति पर फिरा पानी खापों के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी हाथ अजमाने में लगे हैं और खापों का समर्थन लेने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। खाप पंचायातों के समर्थन में खड़े होकर हरियाणा की राजनीति में जाटों को साथ लेने का दांव चलने वाले चौटाला को उस समय करारा झटका लगा जब केन्द्रिय गृह मंत्रालय ने पानी दिया। गृह मंत्रालय ने चौटाला की इस बात का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि गृह मंत्री पी. चिंदबरम से मुलाकात के दौरान चौटाला ने गोत्र के अंदर विवाह पर रोक लगाने के बारे में किसी प्रकार का कोई विचार- विमार्श किया था। गृह मंत्रालय के अनुसार ऐसी कोई भी चर्चा चिदंबरम और चौटाला के बीच नहीं हुई। जबकि हरियाणा में चौटाला ने खुलकर ये ऐलान किया था कि चिदंबरम से मुलाकात के दौरान उन्होंने खाप पंचायतों और गोत्र विवाह का मामला उठाया था। असल में चौटाला ये अच्छी तरह से जानते हैं कि हरियाणा में जाटों का वोट बैंक कितना बड़ा है। चौटाला के इस दांव से कांग्रेस में भी हलचल मची हुई थी। चौटाला ने यह भी कहा था कि जो लोग गोत्र विवाह औऱ खाप पंचायतों के मुद्दे का समर्थन कर रहे हैं उन सभी को एक साथ आना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि गोत्र विवाह के संबंध में हरियाणा और कांग्रेस सरकार को एक विधेयक लाना चाहिए और उसका समर्थन इनेलो भी करेगा। एक प्रकार से चौटाला ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को जाटों के बीच कटघरे में खड़ा करने की चाल चली थी। लेकिन कांग्रेस ने चौटाला की चाल को भांपकर उनकी चाल पर पानी फेरने में देर नहीं लगाई और साफ शब्दों में कहा कि चौटाला ने इस तरह की कोई भी बात गृह मंत्रालय से नहीं की है। इस संबंध में गृह मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस बात का खंडन किया कि चौटाला और गृह मंत्री के बीच गोत्र के अंदर विवाह करने और खाप पंचायातों के द्वारा लिए गए आंदोलन का फैसले पर उनकी कोई बात हुई है। इस पत्र में कहा गया है कि चौटाला और चिदंबरम के बीच 10 मई को जो मुलाकात हुई है वह हरियाणा के गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा से संबंधित है। चिदंबरम और चौटाला की मुलाकात में किसी भी अन्य मुद्दे पर बातचीत नहीं हुई।

Friday, April 16, 2010

सोशल नेटवर्किंग -2

आज मैं सोशल नेटवर्किंग भाग -2 आपक सामने रखने जा रहा हूं। कल इस कहानी का पहला भाग मैंने अपने ब्लाग पर दिया था। उसपर एक मित्र की प्रतिक्रिया ने मुझे इसके दूसरे भाग को लिखने की प्रेरणा दी है। कहानी वहीं पुरानी है। ये कहानी हमारी धार्मिक पुस्तकों और अक्सर घर के बुजुर्गों के माध्यम से सुनाई जाती रही है। इसके लेखक कौन हैं इसकी जानकारी मुझे नहीं हैं, लेकिन आप इस कहानी को पढ़कर ये अवश्य समझ पायेंगे कि ये मेरी पहली कहानी का आगे का हिस्सा है और क्योंकि मेरी पहली कहानी पर कल थोड़ी बहस हुई थी तो उसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए ये दूसरी कहानी लिख रहा हूं।
हां, एक बात और मैं कहानी अपने तरह से कहने में विश्वास रखता हूं और साधारण शब्दों में कहता हूं इसलिए कहानी को थोड़ा तोड़ता मरोड़ता हूं। उम्मीद है आप मेरी इस गलती को माफ करके कहानी का आनंद अवश्य लेंगे।
बड़ा कौन ?

एक बार गणेश भगवान और उनके बड़े भाई कार्तिक खेल रहे थे। खेलते खेलते कोई बात चली और कार्तिक भगवान ने गणेश जी से कहा की तू मुझसे छोटा है, छोटे के तरह रहा कर। गणेश जी ने कहा भाई इस दुनिया में कोई बड़ा या छोटा नहीं है, जिसकी जितनी ज्यादा मांग इस दुनिया में है यानी जिसका सोशल नेटवर्क जितना बड़ा है वह उतना ही बड़ा है। यानी जिसकी ज्यादा पहुंच जिसका ज्यादा प्रचार वही महान। ये बात कार्तिक को बुरी लग गई। उन्होंने कहा अरे गणेश भाई कैसी बात करते हो। क्या आयु, शिक्षा और ज्ञान का आधार कुछ नहीं है। इसपर गणेश जी मुस्कुराये और बोले भाई में ज्ञान, आयु और शिक्षा की नहीं मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूं कि जिसकी बाजार में जितनी मांग होगी वह उतना ही बड़ा होगा। जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा होगा वह बड़ा होगा। अब धरती पर मौजूद हाल का ही उदहारण ले लीजिए। सानिया और शोहेब की शादी दंतेबाड़ा के नक्सली नरसंहार से बड़ी हो गई। हमारे यहां मौजूद यमदूत भी पहले सानिया के यहां दावत खाने पहुंचे औऱ बाद में दंतेबाड़ा पहुंचे। मीडिया ने भी जो नारद जी से भी तेज खबर देने का दावा करती है। वह भी पहले वहीं पहुंचे और दंतेबाड़ा पर चिंदबरम की बाइट चला कर अपना पल्ला झाड़ लिया। तो जो मार्किट में बिक रहा है और जिसका सोशल नेटवर्क ज्यादा है वह बड़ा हुआ या नहीं। इस पर कार्तिक का चेहरा तम तमा गया। वह गुस्सें में गये और जा पहुंचे सीधे हाई कमान भगवान शिव के पास और बोले पिता जी ये गणेश मुझसे कहता है कि मैं बड़ा नहीं ये बड़ा है। ऊपर से धरती के उल्टे सीधे तर्क दे रहा है। भोले नाथ ये बात सुनकर पहले चुप्पी साध गये, लेकिन कार्तिक कहा मानने वाले थे। उन्होंने उनकी बाजू पकड़ कर हिलाया और कहा पिता जी आप आंखे मत मूंदो और मुझे जवाब दो। भोले नाथ ने आंखे खोली और धीरे से कहा पुत्र आप लोगों का आपसी मामला है आप ही निपटा लो काहे मुझ योगी को इस लफड़े में डालते हो। कार्तिक फिर बोले पिता जी आप क्यों अपना पल्ला झाड़ रहे हो। मुझे जवाब चाहिए नहीं तो मैं आपका पीछा नहीं छोड़ने वाला। अब भोले नाथ समझ गये कि मामला कुछ ज्यादा ही सनसेटिव हो गया है। उन्होंने नंदी को आवाज देकर बुलाया और कहा जाओं गणेश को ले आओं। गणेश जी हाथ में अपना मोदक लिए भगवान शिव के दरवार में उपस्थित हो गये। भगवान शिव ने पूछा बेटा ये कार्तिक से आपका किस बात पर झगड़ा हो रहा है। इस पर गणेश पहले थोड़ा मुस्कुराये और फिर बोले। बाबा कार्तिक भाई को मैं समझा रहा था कि इस दुनिया में वही बडा़ है जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा है। लेकिन ये भाई है कि मानते ही नहीं और कह रहे हैं मैं बड़ा हूं, क्योंकि मैं आयु में बड़ा हूं। अब मैंने इन्हें समझाया की आयु में तो बह्रमा भी बड़े हैं लेकिन उनका सोशल नेटवर्क स्ट्रोंग नहीं है तो उनका कोई नाम नहीं लेता और चाचा जी यानी विष्णु जी का सोशल नेटवर्क बड़ा है तो उनका नाम बड़ा हो गया उनकी डिमांड ज्यादा हो गयी। लेकिन ये मेरी बात को मानने के लिए ही तैयार नहीं है। इस पर फिर से कार्तिक भन्ना गये, उन्होंने आव देखा ना ताव औऱ गणेश को चैलेंज दे कर कहा। अच्छा तू बहुत देर से बक बक कर रहा है। चल तू मुझसे दौड़ लगा और साबित कर की तू मुझसे बड़ा है। जो जितेगा वही बड़ा होगा। ये सुनकर भगवान शिव के दरबार में मौजूद सभी देवतागण चुप हो गये। इस पर वहां मौजूद नंदी ने कहा भगवन आप काहे इस छोटे बड़े के चक्कर में फंस रहे हैं। छोड़िये और अपने मोर पर बैठकर आकाश की परिक्रमा कीजिए और आनंद लिजिए। गणेश जी का क्या है ये तो ऐसे ही कहते रहते हैं। लेकिन कार्तिक जी तो जैसे अपनी बात पर अड़े बैठे थे। उन्होंने जैसे ठान ही लिया था कि आज फैसला करना है औऱ गणेश को जवाब देना है। कार्तिक ने कहा नहीं आज दौड़ होगी मतलब दौड़ होगी। इसपर गणेश जी ने कहा भाई ठीक है अगर आप नहीं मानते तो मैं दौड़ लगाने के लिए तैयार हूं लेकिन तैयारी करने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए। कार्तिक ने कहा दौड़ पूरे ब्राहमांड की लगानी होगी और जो पहले यहां वापस आयेगा वहीं विजयी होगा। गणेश जी ने बात मान ली और कहा ठीक है मुझे एक सप्ताह का समय दीजिए तैयारी के लिए। कार्तिक ने समय दे दिया। कार्तिक उसी समय से अपने मोर की सेवा में लग गये और लगे दंड मारने की अब ब्राहमांड विजयी करना है। वहीं दूसरी ओर गणेश जी सभी देवताओं से मंत्रणा करने लगे और सभी देवताओं, नर, नारी, पशु, पक्षी और इन तीनों लोको के प्राणियों को जमकर मौज करवाई, सभी के लिए मीठे मोदक और जिसकी जो पसंद थी वह पहुंचाया गया। भगवान शिव को भी भांग धत्तूरा और पार्वती जी को चंदन का खास उबटन दिया गया। एक सप्ताह तीनों लोकों में जश्न का माहौल रहा ऐसा लग रहा था कि भारत देश का लोकसभा का इलेक्शन हो रहा हो। दारू, मुर्गा, रैव पार्टी सभी कुछ हुआ। आखिर प्रतियोगिता का समय ही गया। प्रतियोगिता का निर्णय का हक भगवान शिव और पार्वती मां को दिया गया, लेकिन वोटिंग्स के आधार पर। वोट सभी देवी देवताओं औऱ तीनों लोकों के प्राणियों को करने का अधिकार दिया गया। वोट इंटरनेट औऱ मोबाइल के माध्यम या फिर एक ध्वनी मत के द्वारा दी जाने की घोषणा की गई। खैर प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। सीटी बजी और कार्तिक महाराज ने अपने मोर को ऐढ़ लगाई और चल दिये ब्राहमांड की सैर करने। जबकि गणेश जी वहीं रहे और भगवान शिव औऱ पार्वती की सेवा करते रहे और पूरे सप्ताह हर रोज उन्ही के सात सात चक्कर लगाने लगे। एक सप्ताह के बाद कार्तिक पसीना पसीना होते वापस आये और जैसे ही भगवान शिव के दरबार मे पहुंचे गणेश को वहीं पाकर जोर से हंसे और बोले देख मैं ब्राहमांड का एक चक्कर लगा कर भी गया और तू यहीं बैठा है। इतने में ही भगवान शिव के यहां मौजूद स्कोर बोर्ड़े पर डिस्प्ले हुआ कार्तिक - एक चक्कर, गणेश - 49
स्कोर देखकर कार्तिक का सर भन्ना गया और वहां मौजूद सारे दर्शकों ने अब गणेश को अपने कंधों पर उठा लिया और जोर से एक ध्वनी में कहा। हमारे विध्नहरता, कष्टहरता, दुख दूर करता कौन ? इतने में ही शिव पार्वती बोले भगवान गणेश।

Thursday, April 15, 2010

अब बाबा किसके ?


इस देश में दलित एजेंडा वोट बैंक पर कितना हावी हो सकता है यह इस बार बाबा भीमराव अंबेडकर जयंती पर देखने को मिला। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर कांग्रेस दलित महापुरूषों का सम्मान करती तो उनकी मूर्तियां और उनके नामों से बनने वाले पार्कों और स्मारकों का कार्य नहीं रूकवाती।
14 अप्रैल के दिन बाबा भीमराव अंबेडकर को याद करने पहुंचा दलित जनसमूह धूप में बैठकर ये सोच रहा था कि शायद इस बार बहन मायावती दलितों के उत्थान के लिए किसी योजना या फिर कोई ऐसा मसौदा पेश करेंगी जिससे उनका और राज्य के साथ देश का हित हो, लेकिन अब शायद मायावती जी ये भूल गयी हैं। उनका एक ही एजेंडा दिखाई देता है और वो है वोट बैंक को बनाये रखना। क्योंकि अब वह दलित और पिछड़ी नहीं हैं, बाल कटवा कर और कान, गले, नाक में हीरे के जेबर पहनकर वह दलितों को भी मुंह चिढ़ाने लगी हैं। उनके स्टाइल से ऐसा लगता है जैसे वह इंग्लैड की महारानी हैं और वह यहां देश के दलितों पर राज करने आयी हैं। ये कुछ दलितों को बुरा अवश्य लग सकता है, क्योंकि दलित उनसे बेपनाह प्रेम करता है और देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखता है। लेकिन अब दलितों के नजरिये से मायावती दलितों की कम और कुर्सी की ज्यादा सोचती हैं। ये ठीक हो सकता है क्योंकि जब तक कुर्सी रहेगी तभी तक वह दलितों के लिए कुछ कर भी सकती हैं, लेकिन अब तो वह सत्ता में हैं। केन्द्र में दलित सरकार न सही, लेकिन राज्य में तो है। राज्य में अभी तक दलितों की हत्या हो रही हैं। दलितों के घर फूंके जा रहें हैं। अभी हाल का ही उदहारण लिया जाये तो ग्रेटर नोयडा में एक दलित को घोड़ी पर चढ़कर बरात नहीं ले जाने दी गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चमी उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है। दलितों की मसीहा मायावती जी को ये बात पता नहीं कब समझ में आयेगी की दलितों को पार्क नहीं रोजगार और रोटी चाहिए। बाबा साहब ने कहा था कि जाओं जमीनों पर हल जोतो, सरकारी नौकरियां करो। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मेरी मूर्ति लगाकर मेरी पूजा करना। उन्होंने कभी नहीं कहा मेरे नाम से पार्क बनवाओं, हां ये जरूर कहा की सभी दलित एक होकर राष्ट्र निर्माण में ज्यादा से ज्यादा सहयोग दो। राजनीति में प्रवेश करो और दलितों को सहयोग प्रदान करो। जबकि बीएसपी सुप्रीमो के यहां दलित कम और स्वर्ण ज्यादा काम करते हैं। उनका सलाहकारों में इका दुक्का ही दलित है। बेचारा दलित तो बहन जी के कानों में हीरे के कुंडल देखकर ही मन ही मन ये सोचता रह जावे हैं कि भाई बहन जी म्हारी अमीर हो ली, अब तेरी बारी है। लेकिन बहन जी को नोट और वोट इतने अच्छे लगते हैं कि वह इनसे बाहर ही निकलना नहीं चाहती।
खैर इस साल हमने सोचा बहनजी कोई आवास की या फिर रोजगार की योजना दलितों के लिए लायेंगी तो कुछ काम धंधा और घर मकान का सपना दलितों का पूरा होगा। चकबंदी और रोजगार पर कुछ बहनजी कहेंगी। लेकिन बहनजी ने तो सारा भाषण ही कांग्रेस के सर दे मारा। वहीं दूसरी ओर बाबा के नाम पर राहुल बाबा ने बाबा के समर्थन में जमकर कांग्रेस के दलित हित में किये गये कार्यों की विवेचना की। एक और बहन जी दूसरी ओर बाबा बीच में दलितों के मसीहा बाबा साहब अंबेडकर और उनके दलितों जनों के सपने। दोनों राजनीति की चक्की में इस तरह से पीसे की दोनों की आत्माएं एक साथ बोली की ‘अब बाबा किसके’?

सोशल नेटवर्किंग


आपने खरगोश और कछुये की कहानी जरूर सुनी होगी। जिसमें धीरे धीरे चलने वाला कछुआ तेज दौड़ने वाले कछुए से जीत जाता है। कहानी का सार कुछ इस तरह से है कि एक दिन कछुए और खरगोश में शर्त लगती है कि इन दोनों में से कौन तेज है। कछुआ कहता है मैं तेज हूं। खरगोश अनाड़ी को ये बात हजम ही नहीं होती। वह कहता है भला धीरे धीरे चलने वाला कछुआ कैसे तेज हो सकता है। खरगोश गलतफहमी का शिकार होता है औऱ वह कछुए से शर्त लगा बैठता है। जंगल के सभी जानवरों को जब इस बात का पता चलता है तो सभी लोग कछुए और खरगोश की दौड़ देखने के लिए आते हैं। कछुए औऱ खरगोश के बीच प्रतिस्पर्धा का निर्णय लेने का हक कछुए के मुंह बोले मामा शियार को दिया जाता है। दौड़ आरंभ होती है। खरगोश औऱ कछुआ भागते हैं, खरगोश काफी आगे निकल जाता है और पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता है कि कछुआ अभी धीरे धीरे आ रहा है क्यों न थोड़ा सा आराम कर लिया जाये और वह छांव में जाकर सो जाता है। खरगोश सो जाता है लेकिन अपने निरंतर प्रयास से कछुआ चलता रहता है चलता रहता है और दौड़ जीत जाता है। ये तो थी वह कहानी जो हमने आजतक पढ़ी और सुनी अब सुनिये बाबा पोलखोल की जुबानी नयी खरगोश और कछुए की कहानी.............

कछुआ और खरगोश दो दोस्त थे। कछुए का सोशल नेटवर्क बड़ा ही स्ट्रोंग था वही खरगोश को ये लगता था कि वह काम करने और मेहनत करने में तेज है इसलिए वह सारी दुनिया में सबसे अच्छा औऱ गुणवान व्यक्ति है। खरगोश को अपनी मेहनत करने औऱ तेजी पर गलत फहमी हो जाती है। जबकि खरगोश उसे बार बार समझता था कि भाई तेजी से नहीं समझदारी, जुगा़ड़ और सोशल नेटवर्किंग कामयाबी का रास्ता हैं। इसपर एक दिन दोनों दोस्तों में ठन गई। खरगोश को आ गया ताब उसने कछुए को चैलेंज करते हुए दौड़ लगाने के लिए कह दिया साथ ही कहा जो इस जंगल का एक चक्कर सबसे पहले लगा देगा वहीं तेज औऱ मेहनतकश होगा। कछुए ने खरगोश को बहुत समझाया कि भाई आप नहीं जीत पायेंगे इस जंगल में मुझसे, लेकिन खरगोश नहीं माना और लगा ली शर्त।
खरगोश ने एक सप्ताह का समय कछुए को तैयारी का भी दे दिया। कछुए ने शर्त स्वीकार कर ली। यहां तो खरगोश दिन रात एक करके दौड़ की तैयारी करने लगा जबकि दूसरी ओर कछुआ जंगल के हर जानवार और अपने मामा शियार से मीटिंग्स में व्यस्त रहा। कछुए ने एक सप्ताह जंगल में दावते दी जानवारों को उनकी पसंद का भोजन करवाया शराब पिलवाई और मुम्बई से बार बालाओं को बुलवा कर रैव पार्टी का आयोजन भी किया। जंगल के सारे जानवर खुश जबकि खरगोश पूरे सप्ताह दंड पैलने में लगा रहा औऱ अपनी टांगों को मजबूत करने में लगा रहा। दौड़ का समय आ गया। शियार भाई आंखों पर काला चश्मा लगा कर झंडी लिये ट्रेक पर आ गया। खरगोश ने अपने नाईकी के स्पाइक शू कस लिये और अपना स्पोर्टर कसकर अपनी कमर कस ली। वहीं दूसरी ओर खरगोश सफेद कुर्तें पयजामा पहन कर साधारण चप्पल में ट्रेक पर उतरे। कछुए को इन कपड़ों में देखकर खरगोश बोला भाई दौड़ लगाने आये हो या राजनीति करने। कछुआ बोला भाई कुछ भी समझों अपुन ऐसे ही दौड़ेगे। खैर खरगोश ने एक बार कछुए को देखा और अपनी मंजिल की ओर देखकर ट्रैक की ओर देखने लगा। शियार ने गोली दागी औऱ दोनों प्रतियोगियों के बीच दौड़ होने लगी। खरगोश जंगल में नदी नाले पेड़ पौधे सभी को कूदता फांदता भागा जा रहा था। जबकि खरगोश अपनी मस्त होकर चल रहा था। जब खरगोश ने आधे से ज्यादा जंगल पार कर लिया तो उसने सोचा कि देखा जाये कछुआ भाई कहा हैं उसने इधर उधर देखा लेकिन दूर दूर तक कहीं कछुआ दिखाई नहीं दिया। खरगोश ने सोचा शायद भाई पीछे रह गये हैं। वह अपनी मंजिल की ओर चलता गया और न तो कही रूका और न ही कही सोया वह तेज दौड़ा और मंजिल तक पहुंच गया। लेकिन उसने देखा की उससे पहले वहां कछुआ मौजूद है और जंगल के सभी जानवार उसका स्वागत फूल मालाओं से कर रहे हैं। खरगोश ने जब ये देखा तो उसका सर भन्ना गया उसे चक्कर आ गये। वह कछुए के पास गया और बोला अबे साले न तो तू मेरे साथ दौड़ा न ही तू भागा फिर मुझसे पहले यहां कैसे पहुंच गया। इस पर कछुआ धीरे से मुस्कुराया और अपने कुर्तें के आस्तीनों को ऊपर करते हुए बोला अबे मैंने तुझसे कहा था न की इस दुनिया की कोई भी दौड़ दौड़ने से नहीं सोशल नेटवर्किंग से जीती जाती है। इतना सुनते ही खरगोश सन्न रह गया और जंगल के सारे जानवर कछुए की जयघोष करते उसे अपनी पीठपर बैठाकर उसकी जय जयकर करते जंगल में चले गये। अब कछुआ उनका नया चैंपियन था।

Tuesday, April 13, 2010

क्या हमारे बुजुर्गों ने हमें नहीं पढ़ाया


आपने टोपी वाले की कहानी अवश्य सुनी होगी जिसमें एक आदमी टोपियों का कारोबार किया करता था। एक दिन वह शहर से टोपियां बेच कर अपने घर वापस आ रहा था। दोपहर का समय था टोपी वाले ने सोचा अभी गांव थोड़ा दूर है और दोपहर हो चली है। क्यों न किसी पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाया जाये इस बहाने थोड़ा सुस्ता भी लिया जायेगा। ये सोचकर टोपीवाला एक घने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया और खाना खाने के बाद टोपियों का झोला एक ओर ऱखकर सुस्ताने के लिए लेट गया। पेड़ की ठंडी छांव में व्यापारी को नींद आ गयी। वह सो गया। एक घंटे के बाद उसकी आंख कुछ शोर सुनकर खुली। वह उठकर बैठ गया। उसने देखा की उसके झोले से टोपियां गायब थी। इधर उधर देखने पर भी उसे अपनी टोपियों का पता नही चला, लेकिन पेड़ पर ऊपर देखने से उसे पता चला कि ऊपर मौजूद बंदरों ने उसकी टोपियां उठा ली हैं। वह उन्हें देखकर चिल्लाया और अपनी टोपियां वापस करने के लिए इशारा किया लेकिन बंदर तो बंदर थे नहीं समझे। तभी व्यापारी को एक उपाय सुझा उसने अपनी टोपी जमीन पर दे मारी। ये देखकर नकलची बंदरों ने भी ऐसा ही किया औऱ इस तरह से व्यापारी को अपनी सारी टोपियां वापस मिल गई। ये वो कहानी थी जो आज तक हमने पढ़ी और समझी की बंदर नकलची होते हैं, और परेशानी में संयम और बुद्धिमता से हर परेशानी का हल निकल आता है।

लेकिन अब आगे सुनिये.............

एक लंबे अंतराल के बाद इसी व्यापारी का पोता फिर से इसी रास्ते से गुजरा। क्योंकि वह भी टोपियों के कारोबार में था। सभी कुछ वैसा ही हुआ जैसा उसके दादा जी के साथ हुआ। शहर से वापसी में दोपहर हुई, पेड़ आया उसने खाना खाया आराम के लिए आंखें बंद की औऱ सो गया। वह किसी आवाज की वजह से जागा देखा टोपियां गायब।
इधर उधर देखा टोपियां नहीं मिली। फिर उसे अपने दादा जी की बात याद आयी।
सर उठा कर ऊपर पेड़ पर देखा.... बंदर के सर टोपी देखकर युवक मुस्कुराया और पहले टोपी वापस देने की गुजारिश सी की। बंदर फिर बंदर कहां कहने से टोपी देने वाले थे। युवक को अपने दादा की बात याद आयी। युवक ने वही तरकीब लगाई और जोर से अपनी टोपी जमीन पर दे मारी।
फिर क्या हुआ.............
युवक ने ऊपर देखा, बंदरों की ओर से कोई रिस्पोंस नहीं आया।
युवक ने फिर अपनी टोपी जमीन पर मारी........ फिर रिस्पोंस नहीं।
एक बार, दो बार, तीन बार लगातार कई कोशिश करने के बाद भी बंदरों का कोई रिस्पोंस नहीं आया।
युवक झल्ला गया और चीखकर बोला अबे ओ बंदरों क्यों मेरी टोपियां जमीन पर नहीं फेंकते।
ये सुनकर पहले बंदर मुस्कुराये और फिर कहकहा लगाकर जोर से हंसे और बोले.... अबे मानवजात क्या कुछ सीखाने या पढ़ाने का जिम्मा तुम्हारे बुजुर्गों ने ही लिया हुआ है हमारे बुजुर्गों ने हमें कुछ नहीं सीखाया। हमें भी तो वह कुछ पढ़ा कर सीखाकर गये होंगे।
समय के साथ परिस्थितियां बदलती है।